मैदान में दौड़ रही रेल, पिच से यात्रियों को कर रहे बॉय-बॉय…, शेड के तोता-मैना की मौज…, बाहर हल्लाबोल, केबिन में शांतिवार्ता, मामला रफा-दफा…, ऑपरेटिंग का शेरा भी कुंभ में डूबकी लगा आया…।
जलज शर्मा,
इन दिनों रेलवे में क्रिकेट टूर्नामेंट की जैसे होड़ लगी है। पटरियों पर ट्रेन दौड़ाने वाला अमला अब खेल मैदानों में छुक छुक दौड़ाकर पिच से ही यात्रियों को बॉय-बॉय कर रहा है। हालांकि रेलवे में मानसिक तनाव से छुटकारे के लिए जो व्यवस्था अंग्रेजों ने बनाई थी। 100 साल बाद इसे बढ़ावा दिया जाने लगा है। कुछ हद तक सिस्टम ठीक है। लेकिन अब असली पिच यानी ट्रैक पर परिचालन के हालात बेहतर नहीं रहे है। ऐसे में काम ही अहम माना जाने लगा है।
मैदानों की बात करें तो यह अब खाली नहीं रहने लगे हैं। भले ही पटरियों पर इंजन खराब हो रहे, कपलर टूटने से रैक के कोच अलग हो रही है। मगर मैदानों में टूर्नामेंट आयोजकों के कपलर एक के बाद एक जुड़ते जा रहे हैं।
पिछले दिनों लाल झंडे वाले संगठन ने विभागों की टीमों को मैदान में उतार दिया। तब तीरंगे झंडे वाले कहां पीछे रहने वाले थे। उन्होंने इस बार भी पीछे नंबर लगाते हुए अपने टूर्नामेंट की घोषणा कर दी। बीच में बड़े साहब के नाम से एक और टूर्नामेंट फंसा दिया गया। रतलाम मंडल खेलकूद संघ के जिम्मेदारों की तो जैसे बांछे खिल गई है। जी जान से इसे पूरा करने में जुट गए। क्योंकि बड़े साहब का आयोजन है तो नंबर तो बढ़ना ही है।
भला हो कि इस टूर्नामेंट का उद्घाटन हुआ तो शॉट मारने के लिए बड़े साहब ने पहले ही बल्ला पकड़ लिया था। वरना संघ के जिम्मेदार वहां भी बड़े साहब के हाथों से बल्ला खूद उठाकर वे ही शॉट लगवा देते।
हे जगन्नाथ, पटरी रूपी पिच पर गाड़ियां फास्ट लेकिन सुरक्षित चलती रहे, यहीं कामना है। वरना किसी भी किलोमीटर पर स्पीन आई तो विकेट उड़ना तय है।
डीजल शेड के तोता मैना की मौज
हमेशा ललकारभरे नारों से गूंजने वाला डीजल शेड इन दिनों तोता-मैना की जुगलबंदी से खासा चर्चा में है। इसे देखने वाला ‘मैनेजमेंट’ सुस्त है तो ‘इंफॉरमेंशन’ भी बाहर नहीं जा रही है। तोता-मैना के खेल की भनक जिम्मेदारों को तब लगेगी, जब इसकी शिकायत कोई सीधे दो बत्ती वाले बड़े साहब को करेंगा। कहा तो यह भी जा रहा है कि शेड के कई सेक्शनों है, जहां वर्किंग पर्सन्स की संख्या एक-एक है। कर्मचारियों का पर्याप्त संतुलन नहीं है।
हे जगन्नाथ, जुगलबंदी के चुनिंदा मामले ही बाहर निकलकर आ रहे हैं। सतर्कता जरुरी है। क्योंकि ऐसे छोटे सेक्शनों में कई और भी सिरफिरे तोते है। जो किसी दूसरे की मैना को डोरे डालने की जुगत भिड़ाने में जुटे रहते है।
बाहर हल्लाबोल, केबिन में शांतिवार्ता, मामला रफा-दफा
फरवरी माह का आखरी सप्ताह शेड में हल्लाबोल व नारों से गूंजता रहा। झंडे वाले एक-एककर अंदर गए और अपने लाल चेहरों के फोटो खिंचवाकर चले आए। कर्मचारियों को लगा कि इस बार आर या पार की लड़ाई तुनकमिजाज अफसरशाही पर पूरी तरह से लगाम कस देगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दो बत्ती वाली बिल्डिंग में दूसरे नंबर के साहब ने फरमान जारी किया कि तुनकमिजाजी बंद कर वार्ता शुरू की जाएं। बाहर फिर भी नारेबाजी चलती रही और केबिन में शांति वार्ता आयोजित कर ली गई। कुछ बातें मौखिक सहमती दी और कर दिया चलता। आश्वासन के मारे..बेचारे कर्मचारियों ने माइक नीचे उतार लिया। झंडे भी घड़ी कर रख लिए।
हे प्रभु, झंडे वाले तो स्टेशन तरफ अपने ठिकानों पर आ गए। लेकिन कर्मचारियों को फिर से तालाब में मगरमच्छ के बीच छोड़ दिया। जहां मगरमच्छ मूंह खोले निवाले के लिए मौके की तलाश में रहेगा। दूसरी ओर शेड के केंटीन में पोहा-कचौरी के भाव बढ़ाने की कवायद के विरोध में हल्ला बोल दिया गया। कुछ नाराज कर्मचारी बोले कि केंटीन के चुनाव नहीं होने से मनमानी हो रही है। कुछ ने कहा कि वहां के साहब लोगों को मुफ़्त में चाय-नाश्ता मिलता है। ऐसे में वे स्वयं भी चुनाव कराने के मुड़ में नहीं है।
हे जगन्नाथ मुफ्त की बॉलपेन लेने वाले अब मुफ्त में चाय-नाश्ता भी करने लगे है। जवाब मिल रहा कि ये कलयुग है प्रभु, कलयुग..यहां सब कुछ हजम होने लगा है।
ऑपरेटिंग का शेरा भी कुंभ में डूबकी लगा आया
सिंहस्थ के प्रोजेक्ट को कुंभ के मान से समझने के लिए रतलाम मंडल के रेल अधिकारियों का दल पिछले दिनों प्रयागराज पहुंचा। अधिकारियों के हुजूम के साथ ऑपरेटिंग के शेरा की भी पौ बारह हो गई। वह भी कुंभ में डूबकी लगाने साथ में पहुंच गया। ऑपरेटिंग का यह वहीं शेरा है जिसे कंट्रोल में कब्जाएं केबिन से छुटकारा दिलाया गया था। हुआ यूं कि शेरा ने अपनी चाकरी मजबूत करने नए सीनियर साहब को पकड़ लिया है। हालांकि नए साहब को चापलूसी रास नहीं आ रही है। लेकिन शेरा तो शेरा ठहरा…साहब सीढी के रास्ते जब नीचे आते हैं, तब तक तो शेरा फाटाफट लिफ्ट से ग्राउंड फ्लोर पर उतर आता है। यदि साहब की गाड़ी का ड्राइवर इधर-उधर हो तो उसकी खोजबीन के बहाने शेरा साहब के उनके नजदीक चला आता है। फिर शेरा भाई साहब को कुंभ में कहां छोड़ने वाला था। असफसरों के साथ वह भी ट्रेन में बैठकर चला गया प्रयागराज। अब आने के बाद सभी को डूबकी के वीडियो शेयर कर रहा है।
हे प्रभु, ऑपरेटिंग के लिहाज से शेरा का प्रयागराज में कोई काम नहीं था। लेकिन देखना है कि इसकी यह डूबकी निजी दौरे में शामिल होगी या शासकीय टूर के टीए की जुगल भिड़ा ली जाएगी।
