केबिन की कहानी का ऐसा अंत, “झगड़ा झूठा, कब्जा सच्चा”, बाबा सोमनाथ का ऐसा महाराष्ट्र प्रेम…चंदा उगाही के दौर में छुपाछाई का खेल…
जलज कुमार शर्मा, रतलाम।
पिछले दिनों दो बत्ती पर इंजिन वाले ऑफिस में लगता है केबिन पर कब्जे की कहानी का अंत हो गया है। और खींचतान की नाकाम कोशिशों पर भी विराम लग गया है। इससे जुड़ी एक कहावत भी है कि “झगड़ा झूठा, कब्जा सच्चा”…। ऐसा हो गया और कर भी दिखाया गया।
दरअसल कमाई वाले विभाग की बड़ी मेडम के ऑफिस चेंबर अब हाथों की हिना जैसा दमक रहा है। इसको नवश्रृंगारित करने के लिए पिछले 6-8 माह से सभी सिपहसालार जी जान से भिड़े हुए थे। इसे खूबसूरत बनाने के लिए खूब-खूब तैयारियां की गई। दो कमरों के आकार वाला एक ही बड़ा चेंबर बनाया है। इसलिए लक्झरी सुविधा तो होना ही थी। उड़ती-उड़ती ख़बर आई थी कि चेंबर की लक्झिरियास देख-देखकर दूसरी मंजिल पर बैठने वाले दूसरे नंबर के मुखिया यानी कुंजी साहब का मन इसे पाने के लिए मन ही मन डोलने लगा था। लेकिन कमाई के सेक्शन वाले कहा कम पड़ने वाले थे। आखिर नेचर से पूरे के पूरे कमर्शियल जो ठहरे। ये कुंजी साहब के इरादे जल्दी से भांप गए। जल्दी से कब्जा नहीं किया तो ये साहब कभी भी लंगड़ डालकर अपनी कुर्सी नए केबिन में सेट कर सकते है। इसलिए इस सेक्शन के सिपहसालार दौड़कर गए और झकाझक नेमप्लेट बनवाकर रातोरात ले आए। और इसे डोर पर चिकवा दी। साथ ही बड़ी मेडम के बैठते ही चेंबर के बाहर की बत्ती लाल कर दी गई। ताकि कोई दूसरा भी कुर्सी लेकर नहीं घुस पाए। ऐसा सच्चा कब्जा देखकर शायद कुंजी साहब भी दंग रह गए होंगे। क्योंकि उनको पता नहीं कि इस सेक्शन में सिपहसालारों की एक वैभवशाली डॉमिस परंपरा है। एक बार किसी भी नए साहब का आते ही खूंटा पकड़ लें तो फिर छोड़ते नहीं है। क़ायदा भी यही है। अपने अफ़सर को खुश कर लो। इसके बाद चांदी काटो और आपस में मिल बाटों…।
हे प्रभु जगन्नाथ, सिपहसालार यू ही नहीं बनते है। इसका फायदा भी खूब है। एक ही टेबल पर सालों से जमे रहने के अपने मज़े है। तबादला तो केवल आदेश लिखा केवल काग़ज़ का होता है। टेबलों पर बैठे सिपहसालारों का तबादला कहां होता है?
बाबा सोमनाथ का महाराष्ट्र प्रेम:- त्रिकालदर्शी बाबा सोमनाथ की सभी भक्तों पर समान रूप से कृपा बनी रहती है। लेकिन इंजिन वाले ऑफिस के बाबा सोमनाथ की कृपा इन दिनों केवल विशेष लोगों पर ही बरस रही है। यह हमारे भी समझ से परे है। हम गुजरात वाले त्रिकालदर्शी की बात नहीं कर रहे है। बल्कि यहां बात हो रही है महाराष्ट्र वाले बाबा सोमनाथ की…। बाबा जी को केवल इतने ही लोग भा रहे है, जिनका मूल केवल इसी राज्य से जुड़ा है। इन्हीं से मिलना-जुलना। उन्हीं के साथ उठना-बैठना, बस…। इतना ही नहीं पिछले दिनों मुंबई से कर्म वाले विभाग के एक बड़े साहब उज्जैन आए थे। बताया गया कि तब ये बाबा इसी मूल के हरेकृष्ण को महाकाल दर्शन कराने अपने साथ ले गए। यह भी सुना है कि तीसरे नंबर वाले साहब के केबिन को हरेकृष्ण से अभी तक खाली नहीं करवा पाए। यह भी तो विशेष प्रेम ही है न…। बताया तो यह भी गया कि इसी प्रेम के चलते सतर्कता विभाग की कार्रवाई के बाद भी बाबा जी का एक बारगे (एक बार) भी हरेकृष्ण के जाप से मोह खत्म नहीं किया हुआ।
हे प्रभु जगन्नाथ, ये कैसा मूल वाला प्रेम है। ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ। जब जगन्नाथ वाली खबरें सच्चाई उगलती है। तब बाबा जी इसमें लिखे हर संकेतों को अच्छे से समझ भी जाते है। फिर भी सभी से कहते है कि हम फालतू की ख़बर देखते तक नहीं है।
चंदा उगाही के दौर में छुपाछाई का खेल:- पिछले कुछ दिनों से इंजिन, गाड़ी चलाने वाले तथा ऑफिस में टेबलों पर आंखें फोड़ काम करने वाले कर्मचारियों का उद्धार करने की कसम खाने वाले संगठनों के खेमों में चंदा उगाही का दौर खूब चला…। लेकिन इस बार चंदे का धंधा थोड़ा मंदा ही रहा हो है। क्योंकि चंदा देने वालों ने इस बार कन्नी काटना शुरू कर दी। चंदा प्रकिया को देखते ऑफ़िस में तो बचपन के खेल जैसा छुपाछाई मच गई थी।
दरअसल सदस्यता का दौर शुरू हुआ तो संगठनों के मुंबई से लेकर रतलाम के सरदारों ने अपने सैनिकों (प्रतिनिधि) के लिए फरमान जारी किया। कहा कि अधिक से अधिक सदस्यों को पकड़ों और तोड़ों और जोड़ों। ताकि हम पहले नंबर पर पहुंच जाए। जो पकड़ में आ जाएं उन्हें तो बिल्कुल ही नहीं छोड़ना है….। फरमान के बाद बिचारे सैनिकों की फजीहत शुरू हुई। ये करे तो भी क्या करे। क्योंकि इस बार पूर्वाभास हो गया था कि ज्यादा दाव पकड़ में नहीं आने वाले है। हुआ भी यही है। इन सैनिकों को अपनी ओर आता देख जनता (कर्मचारी) इधर-उधर होने लगी। कोई पकड़ में आ भी गया तो बमुश्किल जैसे-तैसे सदस्य बनने को तैयार हुआ। उनके साथ मुसीबत यह रही कि जैसे ही एक से छुटे तो दूसरे खेमें के सैनिक उन्हें पकड़ने को तैयार खड़े थे। कल आज करते जैसे-तैसे वहां से छुटे तो तीसरे खेमें वाले संगठन के सैनिक भी ताकझांक कर रहे थे। ऑफिसों के ऐसे नजारें को देखकर दूसरे कर्मचारियों ने रास्ते बदलना शुरू कर दिए।
हे प्रभु, इन संगठनों के फ़रमानकार भी समझ गए है कि अब लोगों को बत्ती नहीं दे सकते है। उनके काम करना पड़ेंगे। अफ़सर के केबिन में हाथ जोड़कर खड़े रहने और बाहर मुर्दाबाद के नारों से अब काम नहीं चलने वाला है।
सावन लगने वाला है, मची धूम… पार्टी कर ले क्या? लेकिन अब तक पकड़ में कोई नहीं आया:- इंजिन वाले ऑफिस से जुड़े अधिकांश पार्टीबाजी केवल इनकमिंग नेचर वाले है। इनके सिस्टम में आउटगोइंग (रुपए खर्च) का ऑप्शन ही नहीं है। मज़ेदार बात यह है कि अलग-अलग ग्रुप वाले केवल एक दूसरों को मौखिक दावत देते रहते है। कुछ दिनों से कह रहे हैं कि सावन लगने वाला है। इसलिए पूनम (पूर्णिमा) से पहले पार्टी जमा लो यार। लेकिन बात खर्चे की आई तो सब इधर-उधर भागने लगे। अब बात करते-करते सावन ऊपर आ गया।
एक बाबू ने तो चार दोस्तों से डन कर लिया कि मेरा रेस्ट है। शाम को मिलते है भाई। किसी ढाबे पर चलेंगे। पार्टी मेरी ओर से, शाम को फोन लगाना…। बेचारे चार कर्मचारी भाई खुशी के मारे शाम को जल्दी काम निपटकर फ्री हो गए। अपने-अपने साहब से जुड़ी फाइलें भी जल्दी निपटा ली। एक भाई ने साहब से जल्दी जाने के लिए भलताई बोल दिया कि सर, घर गेस्ट आए है। आज।जल्दी घर निकलना है। जब सभी काम से निपटकर शाम को रेस्ट वाले पहले भाई को बारी-बारी से फोन लगाना शुरू किया। तब रेस्ट वाले भाई ने फोन ही रिसीव नहीं किया। बाद में स्विच ऑफ कर बैठ गया। अब जेब पर कौन लोड डाले। इसलिए सभी घर निकल लिए।
दूसरे दिन भाई के ऑफिस में मिले तो खूब खरी-खोटी सुनाना शुरू की। तब रेस्ट वाला भाई बोला कि नींद लग गई थी यार। ऐसा था तो घर ही आ जाते….। ऐसे है हमारे इनकमिंग वाले भाइयों के किस्से।
कुछ भाई के हिस्से में तो साहब के बंगले तक की आजन्म सेवा चाकरी लिखी है। इसलिए उनकी पार्टी का इंतजाम तो सेवा चाकरी और साहब की बची-कूची से ही हो जाता है। ऐसे लोग तो बेचारे ऑफिस के प्रचलित शेराओं से भी कही आगे है।
हे प्रभु, इंजिन वाले ऑफिस के इनकमिंग वालों के हालात बद से बत्तर बने हुए है। जो जितनी ऊंची ग्रेड का है। उसकी आउटगोइंग उतनी ही कम है। ये भी दांव ढूंढने में एड़ी चोटी का जोर लगाते रहते है।
