यू ही हर माह खाली कर रहे सरकारी खजाना…. पूरा देश ट्रेनों से ले जा रहा लगेज, ये चार कुर्सी भी लोडिंग वाहन में भेज रहे, कोई देखने वाला नहीं
-रेलवे ट्रैफिक वर्कशॉप में जिम्मेदार आम जनता के धन का जमकर कर रहे दुरुपयोग।
-50 हजार रुपए तक रतलाम में ही नीलाम करने के नियम, बावजूद सामग्री दाहोद भेज रहे।
न्यूज जंक्शन-18
रतलाम। रेलवे में शासकीय धन की कैसे चपत लगानी है, यदि ये सीखना है तो सीधे रेल मंडल में आना होगा। यहां सामग्री आबंटन तथा वितरण की प्रमुख यूनिट ट्रैफिक वर्कशॉप में जिम्मेदारों ने कुछ इस तरह ही कमाई की जुगत भीड़ा रखी है। जिससे हर माह हजारों रुपए शासकीय धन को चपत लगाई जा रही है। जहां करोड़ों लोग अपने ट्रेनों से बुक करवाकर लगेज देशभर में परिवहन करवा रहे हैं। वहीं ट्रैफिक वर्कशॉप में निजी रूप से अनुबंधित बुलेरो (कैंपर) से सामग्री दाहोद सहित अन्य स्थान पर भेजकर माह में इसका भुगतान कर रहे है। बल्कि इस अनियमितता में दो से तीन कर्मचारियों के टीए अलग से रेलवे को वहन करना पड़ रहा है।
बता दें कि डीआरएम रजनीश कुमार के सख्त निर्देश है कि किसी कर्मचारी के शासकीय काम से आने-आने पर माह में केवल पांच से आठ दिन का ही टीए बनाया जाए। बल्कि टीए बिल के पहले इसकी पर्याप्त जांच भी की जाए। इससे कि रेलवे को आर्थिक बोझ का दबाव न पड़े। इसके उलट विभाग के आला अधिकारियों की अनदेखी व यूनिट इंचार्ज की मिलीभगत के चलते रेलवे को हर माह हजारों रुपए माह की चपत लगाई जा रही है।
50 हजार रुपए तक मंडल स्तर पर नष्ट एवं नीलामी के नियम
रेलवे में तय नियमों के मुताबिक जो भी अनुपयोगी सामग्री है, उनमें यदि 50 हजार रुपए लागत तक की सामग्री है। तब इसकी नष्टीकरण एवं नीलामी की प्रक्रिया मंडल स्तर पर ही की जाए। बावजूद ऐसी सभी सामग्री दाहोद वर्कशॉप में भेजी जा रही है।
दरअसल ट्रैफिक वर्कशॉप में 45 हजार रुपए हर के लिए लोडिंग वाहन बोलेरो (एमपी-43-जी 5275) अनुबंधित है। इसका धड़़ल्ले से अनुचित उपयोग कर रेलवे धन का दुरुपयोग कर रहे है।
कुर्सी, टेबल व सोफे ट्रेन के बजाय वाहन में
कार्यालयों सहित रेलवे स्टेशन उपयोग के बाद जो सामग्री अनुपयोगी मान ली जाती है। इसे नष्ट करने या नीलाम करने के लिए दाहोद भेज देते है। मनमानी के हालात यह है कि कुर्सियां, टेबल, पलंग, तकिए, चादर जैसी छोटी सामग्री के लिए भी लोडिंग वाहन का उपयोग किया जा रहा है। चार कुर्सी भी यदि ले जाना है तो लोडिंग वाहन का उपयोग किया जा रहा है। जबकि ये सामग्री आसानी से ट्रेनों से ले जाई जा सकती है। यदि ट्रेन में ले जाने के नियम न भी है तो ये सभी इकट्ठा सामग्री के लिए बड़े वाहन का उपयोग किया जा सकता है।
यहां यह भी बता दें कि अन्य विभागों के अधिकांश सामान ट्रेनों से ही परिवहन किया जा रहा है। यहां तक कि मेहनतकश ट्रैकमैन अपने कामकाजी सामग्री एक से दूसरे सेक्शनों में ट्रेनों से ही पहुंचाते हैं। मामले में रेलवे जनसंपर्क अधिकारी खेमराज मीणा का कहना है कि रेलवे में नियमों से काम करने के निर्देश है। विभागों में इन नियमों का पालन किया जाता है।
टीए बना कमाई का जरिया
रेलवे में डीआरएम के सख्त निर्देश है कि कम से कम टीए स्वीकार किया जाए, इससे कि रेलवे को आर्थिक बोझ न हो। इसके विपरित जिम्मेदारों ने टीए को कमाई का जरिया बना लिया है। यहां बात ट्रैफिक वर्कशॉप की ही हो रही है। लोडिंग वाहन से सामग्री परिवहन के लिए तीन कर्मचारियों को साथ भेजते है। लोडिंग वाहन के अलावा टीए का बोझ भी रेलवे पर डालकर चांदी काट रहे है। आरोप तो यहां तक है कि एसएसई द्वारा खुशामद करने वाले चुनिंदा कर्मचारी को ही टीए का लाभ दिया जा रहा है।
