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मैं और मेरी कविता

लेखन संसार:-

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फागुन

पहाडों पर टेसू ने रंग बिखेरे फागुन में
हर कदम पर बज रहे ढोल फागुन में
ढोल की थाप पे थिरकते पैर फागुन में
महुआ लगे झुमने गीत सुनाये फागुन में।

बिन पानी खिल जाते टेसू फागुन में
पानी संग मिल रंग लाते टेसू फागुन में
रंगों के त्यौहार हो जाते शुरू फागुन में
दुश्मनी छोड़ दोस्ती के मेल होते फागुन में।

शरमाते जाते है सब मौसम फागुन में
फागुन में मांग ले जाते प्यार फागुन में
हर चेहरे पर आ जाती खुशहाली फागुन में
भगोरिया के नृत्य लुभा जाते फागुन में।

बांसुरी ,घुंघरू के संग गीत सुनती फागुन में
ताड़ों के पेड़ों से बन जाते रिश्ते फागुन में
शक्कर के हार -कंगन बन जाते मेहमां फागुन में
पहाड़ों की सचाई हमसे होती रूबरू फागुन में।

संजय वर्मा “दृष्टि ”
125, बलिदानी भगतसिंह मार्ग

मनावर ,जिला -धार (म. प्र.)

मोबा. 9893070756

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हायकू

हे मातृभाषा
म्हारी मालवी माता
घणों गरब।

सबके लागे
मातृभाषा अपणी
हे प्यारी घणी।

मातृ भाषा से
प्रेम भाव हे बढ़े
जाणे हे सब।

मालवी भाषा
हे सुणवा में चोखी
लागे हे मीठी।

दे हे संस्कार
अपणी मातृभाषा
बणे आधार।

बोलोगा जदे
अपणी मातृभाषा
बची सकेगा।

मातृभाषा में
मिळे लोक साहित्य
नरी विधा में।

-डॉ. शशि निगम
इन्दौर (मप्र)।

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हार मत प्रतिकार कर

नारी जीवन हार कर भी
हिम्मत नहीं हारती है
मौन रहे या प्रतिकार करे
निरंतर आगे बढ़ रही है ।
हौसला ख़ुद में रखकर
सबको थामे रख रही है
एक बार गर ठान लें तो
प्रेम से बांधकर रख रही है ।
ऐसा नहीं की आज
बेटियां ही जूझ रही है
नज़र घुमाओं चहुं ओर
बेटे भी हिम्मत हार रहे है।
कईं नशे में चूर हो रहे
गलत रास्ते पर चल रहे
ना अदब ना सम्मान
सीखना है उन्हे प्रतिकार ।
सीखे आज के नेताओं से
एक राम और एक लक्ष्मण है
जो इतिहास ख़ुद गढ़ रहे है
वैश्विक क्रांति ला रहे है ।
हिम्मत कोई ना हारे
सभी करे गर प्रतिकार
सम्मान ख़ुद का भी करे
देश तुम पर नाज़ करे ।

-अर्चना पंडित
इंदौर (मप्र)।

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परेशान


सागर भी लांघना है
अपनों को भी बांधना है
कच्चे-पक्के, ताने-बाने
बुनती रहती हूं……
हां कुछ परेशान रहती हूं

सब जीतते रहते हैं
मैं हरदम हारती रही
किस्मत को दोष
देती रहती हूं….
हां कुछ परेशान रहती हूं

दुनिया भाग रही है
मैं पीछे ही सही
अपनी हसरतों को
पन्नों पर उतारती रहती हूं ….
हां कुछ परेशान रहती हूं

हसंती मुस्कुराती
जिंदगी के रंगों में
रंगती रहती हूं,
सजती रहती हूं….
पर हां कुछ परेशान रहती हूं

मृत्यु ही जीवन का सत्य है
इस बात को सरोकार
करती रहती हूं
चलती रहती हूं …….
हां पर कुछ परेशान भी रहती हूं

हां कुछ परेशान भी रहती हूं।

 

-नेहा भूपेंद्र शर्मा
खेड़ा, बदनावर।
मो. 7441104967


रचनाधर्मिता ( लघुकथा )

तीन रचनाकारों का वार्तालाप

पहला – मैं लिखता हूंँ ताकि मशहूर हो पाऊं। दुनिया मुझे मेरे नाम से पहचाने।

दूसरा – मैं लिखता हूंँ ताकि पैसा कमा पाऊं। कलम के जरिए अपनी और परिवार की ज़रूरतें पूरी कर पाऊं।

तीसरा – यारों ! मैं लिखता हूंँ ताकि लोगों के दिलों में उतर पाऊं। अपनी कलम के जादू से उनके हृदय को छू पाऊं। उनकी उलझनें दूर कर पाऊं। मेरी कलम की सार्थकता तभी है जब पाठकों को उसमें कुछ सार्थक नज़र आएं।

– यशपाल तंँवर
( फ़िल्म गीतकार,कवि,लघुकथा लेखक और मालवी रचनाकार ) अलकापुरी,रतलाम ( म.प्र )

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