रेल राजनीति के दोनों गुटों में रहमान डकैत और हमज़ा अली मज़ारी, मेडम के आदेश पर हो गया झांकी मंडप, विजिलेंस वाले दुखी हो गए, आदेश भी दब गए,

जलज शर्मा, न्यूज़ जंक्शन-18
रेलवे कर्मचारियों को कर्जदार बनाने वाले सरदारों के चुनाव से पहले और बाद में रेल राजनीति के संगठनों में पात्र धुरंधर मूवी के कलाकारों की तर्ज पर अपरा किरदार निभाने में जुट गए है।
सतही स्तर पर भले ही दिखावा, लेकिन आंतरिक तौर पर साफ नहीं है कि संगठनों में कौन किसका सपोर्ट कर रहा। यानी कौन रहमान डकैत है, कौन सियासी नेता जमील जमाली या कौन हमज़ा अली मज़ारी की भूमिका निभाकर आंतरिक सूचनाएं दूसरे खेमें में पहुंचा रहा है। हालांकि मजदूरों के संगठन का पूर्व ओहदेदार रहमान डकैत के पात्र जैसा खुलकर सामने आ गया है। इसने लाल झंडे वाले गुट को लाभ पहुंचाने के बाद सड़कों पर रहमानी डांस स्टेप्स कर दूसरे खेमें को खूब चिढ़ाया।
लेकिन अभी भी दोनों संगठनों में मौजूद हमज़ा अली मज़ारी जैसे पात्र के पदाधिकारी आंतरिक रूप से छुपी भूमिका में अपना रोल अदा कर रहे है। ऐसे माहौल से उपजे नए परिदृश्य में फिल्मी जमील जमाली किरदार जैसे एक संगठन के नेता जरूर परेशानी में पड़ गए है। वो समझ नहीं पा रहे कि मेरे खेमें में ‘कौन अपना व कौन पराया’ है..। बस फ़िल्म के किरदार व असली नेता में अंतर सिर के बालों का है। असल में जमील के किरदार राकेश बेदी ने विग लगाई है।

हे प्रभु पद पाने के बाद चेहरे बदलने की असली तस्वीरों का दीदार करना हो तो इसकी झलक रतलाम रेल मंडल के संगठनों में जरूर देखने को मिल जाएगी। कभी गिंडोले (केंचुए) की तरह अलसाकर चलने वाले अब सांप की तरह तेजी से रेंगने की कोशिश के जुट गए है। फन भी फैलाने लगे है। इन्हें पता होना चाहिए कि समयचक्र कभी भी इनके फन कुचल सकता है।
मेडम के आदेश पर हो गया झांकी मंडप:- रेलवे एरिया की सड़कों पर छुट्टी के दिन धावकों की रेल दौड़ी तो देखने वाले सभी चोंक गए। क्योंकि यह बड़े साहब की मेडम की महिलाओं की समिति से जुड़ी दौड़ थी। इसकी तैयारियां तो एक सप्ताह पहले ही शुरू कर दी गई थी। गुटनों की परेशानी से जूझने वाले निरीक्षक व कानों के कच्चे सचिव साहब ने ताबड़तोड़ तैयारियां की। धड़ाधड़ 500 रजिस्ट्रेशन कर लिए। ऐसा लग रहा था कि रेल एरिया में उखड़ी व पेंचवर्क वाली नई सड़कों पर दौड़ने वालों को जगह ही नहीं मिलेगी। रेलवे ठेकेदारों को भी इस बार से राहत की संभावना थी कि भीड़ होने से उनके द्वारा बनाई भ्रष्टाचार की सड़क के गड्ढे छिप जाएंगे।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दरअसल 500 रजिस्ट्रेशन में से केवल 100 धावक ही दौड़ने पहुंचे। वो भी इस लालसा में सुबह उठकर आ गए कि उन्हें नई टीशर्ट मिलेगी और बाद में नाश्ता। साहब के सामने झांकी अलग हो जाएगी…।
खेर, फिटनेस व पर्यावरण के संदेश के लिहाज से आयोजित यह दौड़ मेडम की सकारात्मक सोच का बेहतर उदाहरण है।
इसके बावजूद प्रभु जगन्नाथ से विनती है कि दौड़ने वालों में कई कर्मचारी काम के अतिरिक्त बोझ से परेशान है। उनके स्वास्थ्य की चिंता कर उनके तनाव को मुक्त करने के भी उपाय खोजा जाएं।

विजिलेंस वाले दुखी हो गए, आदेश भी दब गए:- रेलवे के इंजिन वाले ऑफिस से जारी तमाम डेवलपमेंट से जुड़े कामों की गुणवत्ता भले ही न के बराबर हों। लेकिन इस ऑफ़िस की दोनों मंजिलों में वजनदार टेबलों की कुर्सियों पर लगे फेविकोल के मजबूत जोड़ जरूर राहत दे रहे है। जोड़ व गठबंधन इतना मजबूत है कि कुर्सियां पर बैठे-बैठे 10 से 15 साल हो गए। इन कर्मचारियों को विजिलेंस तक नहीं हिला पा रही है। पहली मंजिल के कोने में स्थित राजस्व कमाई वाले विभाग में ही देख लीजिए। यहां निरीक्षकों के सालों से कुर्सी पर टिके रहने की अनियमितता की पिछले माह विजिलेंस ने जांच की। कौन क्या काम कर रहा, इसके लिए ई-डाटा भी खंगाला गया। मामला कुछ गड़बड़ निकला तो विजिलेंस हेडक्वार्टर से लेटर जारी कर दिया कि आवधिक अवधि के मुताबिक निरीक्षकों के तबादले किए जाएं। बेचारे विजिलेंस वाले को क्या पता था कि उनके आदेश को ही फाइलों में दबा दिया जाएगा।
हे प्रभु, जब सैया भए कोतवाल, अब डर काहे का…। ‘धन’, ‘वैभव’ की चकाचौंध में सबकुछ संभव है। कुछ निरीक्षक तो यह भी दावे करने लगे कि हम पर तो मेहरबानी है। कोई हमें क्या उखाड़ सकता है।
ऐसा ही परिदृश्य दूसरी मंजिल पर स्थित बड़े विभाग का भी है। विजिलेंस की कार्रवाई के बाद भी दो से तीन कर्मचारियों को पूर्ववत काम सौंप दिया गया। इसके अलावा गोपनीय रूप से इस शाखा में भी कर्मचारी दबे छिपे सालों से एक ही टेबल पर डटे हुए है। कर्मचारी तो बोलते है-एक मेडम तो हमें गोपनीय रूप से डांटती है। बल्कि खुले रूप से गालियां तक दे डालती है…। हमने कई बार अधिकारी से याचना, ‘वंदना’ भी की। लेकिन हमारी कोई सुनवाई नहीं की जा रही है।
जांच की आंच पर ठंडे पानी का छिड़काव:-इसी महकमें में यदि किसी कर्मचारी ने अनियमितता की तो उसे दंड के बजाय उल्टा प्यार, दुलार तथा के पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाएगा। ऐसे एक हैं अनेक उदाहरण है। यदि साहब खुश है तो सभी जांचें दरकिनार, गुनाह कबूल तथा चार्जशीट भी माफ…। लेकिन यदि कोई नापसंद है तो फिर उसका जीना मुहाल है। ऐसा ही उदाहरण रेल इंजिन ऑफिस से जुड़ा देखने में आया है।

ज़मीनी सौदे के बदले नौकरी पाने के मामले में बंदे को तो अब तक पुरस्कृत कर दिया होता, यदि मुंबई में राजनीतिक दादा का हवाई एक्सीडेंट न हुआ होता। हादसे की वजह से समारोह टल गया। वहीं दूसरी ओर कल्याण कर कभी होस्टल के विद्यार्थियों की फ़िकर करने वाले फ़ख़रे की लंबी बर्खास्तगी का आलम समझ से परे है। बड़े साहब के आदेश पर सज़ा ऐसी दी जा रही है, जैसे कोई कोई बड़ा गुनाह किया हों।
हे प्रभु, मुझे तो एक ही शेर याद आ रहा है। ”फिक्र है सब को फ़ख़रे अपनी, खुद को साबित करने की…, जैसे ये मेरा काम, काम नहीं, कोई इल्ज़ाम हो गया”।
