हमारा रतलाम, इतिहास के पन्नों में…नगर के संस्थापक राजा साहब द्वारा भी 400 वर्ष पूर्व प्रयाग त्रिवेणी में किया गया था गंगा स्नान
न्यूज़ जंक्शन-18।
रतलाम। यह जानकारी इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए है….। मालवा के नागरिकों के लिए, अपने शहर की स्थापना दिवस को एक पर्व के रूप में हर्षोल्लास मनाने वाले रतलाम वासियों के लिए भी है। साथ ही यह जानकारी प्रयाग स्नान के महत्व को जानने वाले सनातनियों के लिए। उन जिज्ञासुओं के लिए भी, जो जानना चाहते हैं कि मुगल शासन काल में हिंदू राजाओं को धार्मिक आस्था का पालन करने की कितनी स्वतंत्रता थी। उनका मुगल बादशाह के साथ किस प्रकार का संबंध था..!
बता दें कि विगत दिवस 23 जनवरी के दिन बसंत पंचमी के पर्व पर रतलाम राज्य के संस्थापक राजा रतन सिंह जी का स्मरण किया गया।
इस संदर्भ में इतिहास के पन्नों में आए उनके द्वारा प्रयाग में किए गए स्नान के वर्णन से हिंदू धर्म में गंगा स्नान की महत्ता भी ज्ञात होती है। यह ऐतिहासिक वर्णन इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि फ़िलहाल बद्रिकाश्रम ज्योंतिर्मठ पीठ के जगतगुरु शंकराचार्य श्री अविमुक्तेश्वरानंदजी के प्रयाग में पिछले माह के माघ माह की मौनी अमावस्या के दिन स्नान को लेकर देश भर में विवाद की चर्चाएं जोरों पर चल रही है। दोनों ही प्रसंग लगभग एक ही साथ आए। जिससे जुड़ी एक कहानी रतलाम वासियों के साथ-साथ मालवा क्षेत्र में भी इस लिहाज़ से जानने योग्य है।

(लेख संग्रहण पूर्व बैंकर्स (एसबीआई) तरनी व्यास की कलम से)
दरअसल राजा रतनसिंह के पिता राजा महेशदास के राजवंश का अधिकार ऐतिहासिक नगर आगर से लगाकर अलीराजपुर तक रहा। मालवा के विभिन्न नगरों के राजघराने इन्हीं के वंशज से जुड़े रहे हैं। इस अंचल में किसी समय उन्ही का अधिकार रहा है।
राजा महेशदास के ऐसे ही एक वंशज मंदसौर जिले के सीतामऊ ठिकाने के राज परिवार के प्रमुख व देश के प्रख्यात इतिहासविद राजा रघुवीर सिंह रहे है। जिन्होंने नटनागर शोध संस्था की स्थापना करके हजारों ऐतिहासिक पुस्तकों का संकलन एकत्र किया है। उनके द्वारा लिखित पुस्तक रतलाम का प्रथम राज्य में जो वर्णन आया है, उसे यहां यथावत उद्धृत किया जा रहा है…।
रणनीति के तहत शाहजहां के साथ रहे, लेकिन गंगा स्नान से नहीं चूके:-महाराज रतलाम सिंह के पिता राजा महेशदास राज्य रणनीति के तहत शाहजहां के साथ तो रहे। लेकिन साथ रहते भी वे गंगा स्नान के महत्व को जानते इसके लाभ से नहीं चुके।
ऐतिहासिक विवरण के मुताबिक मार्च 1637ई. में आगरा पहुंचने पर राजा महेशदास कोई डेढ़ साल आगरा में ही रहे। शाहजहां उससे प्रसन्न था एवं उसका मनसब भी बढ़ने लगा। मार्च 11.1638 ई. को नौरोज दरबार के अवसर पर राजा महेशदास का मनसब बढ़ाकर 1000 जात – 600 सवार का कर दिया गया। यह राज्य रणनीति का ही हिस्सा था।
इधर, फरवरी 1638ई. में कंधार (वर्तमान में कांधार) के ईरानी किलेदार अली मर्दान खान ने कंधार का किला मुगलों को सौंपकर वह स्वयं मुगल मनसबदार बन गया। तब से आगामी 15 वर्ष तक शाहजहां उत्तर पश्चिमी सरहद के ही मामले में उलझा रहा। कंधार के किले को सुदृढ़ बनाने एवं उसे ईरानियों के आक्रमण से बचाने के लिए शाहजहां की उत्सुकता बढ़ती चली गई। मध्य एशिया में बल्ख और बदकशा की राजनीतिक परिस्थितियों से भी शाहजहां पूरी तरह परिचित होना चाहता था। अलबत्ता अगस्त 18.1638 ई. को शाहजहां आगरा से रवाना होकर नवंबर 12 को लाहौर पहुंचा। तीन माह तक लाहौर में ही ठहरा रहा। राजा महेशदास भी इस यात्रा में शाहजहां के साथ आगरा से आए और रणनीतिवश फरवरी 1640 ई. तक लगातार शाहजहां के साथ ही बने रहे।

फरवरी 24. 1639 ई. को शाहजहां लाहौर से रवाना होकर मई 18 को काबुल पहुंचा। महेशदास भी शाहजहां के साथ काबुल गए। परंतु तत्कालीन दिए हुए ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि उस समय कारवे में महेशदास ने स्वयं को पीछे रख लिया। इसलिए मई 18. 1639 ई. को उसका पड़ाव जलालाबाद में रहा था।
इधर, शाहजहां लगभग तीन माह तक काबुल में ठहरा और बाद में बंगश होता हुआ अक्टूबर 9.1639 ई. को वह लाहौर लौट आया।
मई 18.1639 ई को जब राजा महेशदास जलालाबाद में ठहरे हुए थे। तब उन्होंने वहीं से राज्य संचालन करते अपने राजगुरु को परगना तितरोद में डाबड़ी गांव दिया। साथ ही कस्बा सीतामऊ में भेरू तालाब की जमीन भी दे दी और उसका एक ताम्रपत्र लिख दिया।
इस अवसर पर राजा महेशदास ने इस डाबड़ी गांव का नाम बदलकर महेशदासपुरा रखा। इसी वर्ष राजा महेशदास ने अपने इन्हीं गुरु राजगुरु को जहाजपुर परगना में कुछ जागीर भी दी थी।
इस बार शाहजहां लाहौर में कोई चार माह ठहरा रहा। अतएव उसके साथ राजा महेशदास को भी लाहौर में ही रहना पड़ा। लाहौर में ही रहते महेशदास ने रतलाम परगना के अंतर्गत चौराना गांव अपने राजपुरोहित को जागीर में दिया।
फरवरी 8.1640 ई. को शाहजहां लाहौर से कश्मीर के लिए रवाना हो गया।

राजा को गंगा स्नान की मन मे उत्सुकता थी:-महेशदास गंगा स्नान के लिए काफी उत्सुक थे। इसलिए वह शाहजहां के साथ कश्मीर न जाते हुए उन्होंने इस बार किनारा किया। लाहौर से रवाना होकर वे संवत 1697 विक्रम के श्राद्ध पक्ष में (आश्विन कृष्ण पक्ष- अगस्त 22 से सितंबर 5, 1640 ई) वह प्रयाग पहुंचे। वहां त्रिवेणी घाट पर शास्त्रोक्त क्रियाकर्म करके उन्होंने यथाविधि गंगा स्नान किया। गंगा- यात्रा के इस अवसर पर महेशदास के साथ उसके ज्येष्ठ पुत्र ”रतन सिंह ” भी थे।
इस यात्रा से लौटकर महेशदास सीधे लाहौर पहुंचे और जब नवंबर 6.1640 ई. को शाहजहां कश्मीर से लौटकर लाहौर आए। तब महेशदास पुनः उसके समक्ष गए।
साभार-‘रतलाम का प्रथम राज्य’
आज जब देशभर में प्रयाग स्नान के विवाद को लेकर के चर्चाएं जोरो पर है। ऐसे में इन दोनों प्रसंग को एक साथ जोड़ते हुए इतिहास के पन्नों से निकाल कर लाई गई इस रोचक घटना को रतलाम की जनता के समक्ष एक ऐतिहासिक जानकारी के रूप में प्रकाशित यह उल्लेख, अधिक से अधिक लोगों विशेषकर जिज्ञासुओं तक पहुंचाने का प्रयास किया।
