चापलूसी करो, सेटिंग जमाओ, मिल जाएगा प्रमोशन, जीत गए तो बैंक में नौकरी पक्की, एक पाउच की पन्नी पर पहना दी चार्जशीट
जलज शर्मा, न्यूज़ जंक्शन-18
इससे पहले भी इंजिन-डिब्बे वाले विभाग में कई प्रमोशन के मौके देखने में आए। जब छुट्टी पर रहते, गाड़ी की ड्राइविंग करते या उंगलियों की दिव्यांगता के बावजूद रेलवे की विभागीय या टायपिंग परीक्षा कर्मचारियों ने फर्स्टक्लास अंकों से उत्तीर्ण कर ली। बल्कि प्रमोशन का उपहार मिलने से कोई चौथी श्रेणी कर्मचारी से बाबू बन गया तो कोई बड़ा बाबू बन बैठा था। बस साहब की ठीक से चाकरी भर हो जानी चाहिए। अब एक पटरियों की रिपेरिंग करने वाले चौथी श्रेणी के कर्मचारी पर साहब की ऐसी मेहरबानी हो रही कि लोग सालों याद रखेंगे। कर्मचारी के दोनों हाथ में पट्टी बंदी थी। फ्रेक्चर होने के बावजूद इस कर्मचारी ने ट्रेन इंजिन चलाने की प्रारंभिक लिखित परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। इस सिस्टम में सिफारिशों के आलम यह है कि आप कैसा भी गंभीर गुनाह कर लो। साहब सबकुछ निपट लेंगे। चिंता मत कीजिए, न तो उस कर्मचारी को नोटिस मिलेगा। नहीं कोई चार्जशीट दी जाएगी। बल्कि अपराध यदि और संगीन रहा तो पीठ थपथपाकर ऊपर से प्रमोशन भी दे दिया जाएगा। हालांकि नियमों में जरूर लिखा है कि चुलबुल पांडे की कचहरी में गुनाह करना पाप है। मगर नियमों का ट्रैक तो कभी भी ऊखाड़कर फिर से नई लाइन डाल दी जाएंगी। किसी को कानों कान भनक तक नहीं लगेगी।
हे प्रभु, जगन्नाथम कलयुग में इंसान ये भी भूल बैठा कि उसकी काली करतूतों को भगवान जगन्नाथ सीधे से देख रहे है। वहां सिफारिश नहीं बल्कि सफाए का सिस्टम है।
जीत गए एलाउंस में अव्वल व नौकरी भी पक्की, ऊपर से झांकी भी:- इन दिनों रेलवे कर्मचारियों को पतली गली से कर्जदार बनाने वाली देसी बैंक के चुनाव में डायरेक्टर पद का टिकिट पाने की होड़ लगी है। टिकिट के लिए हर कोई दावेदार मुंह धोकर बैठा है। मन में जीत की लार जो टपक रही है। लालायित होना स्वाभाविक भी है। क्योंकि सभी के बच्चे बड़े जो हो रहे है। इनको अपनी संतानों के रोजगार का भय भी सताने लगा है।
यह इसलिए भी कि रेलवे की नौकरी तो अनुकंपा के अलावा संभव नहीं है। ऐसे में देसी बैंक ही बेहतरीन विकल्प है। सेटिंग के मैदान में बेटिंग कर नौकरी पाने का छक्का आसानी से मारा जा सकता है। बाकी अत्ते-भत्ते तो खूब मिल ही जाएंगे।
ऐसे में फिलहाल रेल संगठनों के ऑफिस में घुसो तो अंदर कुर्सियां व सौफा खाली ही नहीं दिखते। सभी की निगाहें मंत्री जी की ओर टकटकी लगाए रहती है। हालांकि दावेदारों को पता ही नहीं कि नाम तो पहले ही तय कर लिए है। केवल मुट्ठी खोंलने भर की देर है। कहीं ऐसा न हो कि किसी संगठन में अध्यक्ष या मंत्री जी ही टिकिट कबाड़ ले जाए। हालांकि हर कोई कह रहा है कि एक नाम तो लगभग तय है। दूसरे पद के लिए पिटारे में कई दावेदार अपनी गर्दन डाले बैठे है। इस पिटारे से कई को बाहर कर दिया जाएगा। यह तो सोमवार तक पता चल जाएगा।
हे, प्रभु कर्मचारियों के संगठन के चुनाव केवल बतौर व्यवस्था संचालन के लिए थी। लेकिन दशक में माहौल ऐसा हो गया जैसे लोकसभा या विधानसभा के चुनाव लड़े जा रहे हो। कई कर्मचारी संगठन की मीटिंग में शामिल होकर या नारेबाज़ी कर खुद को रास्ट्रीय राजनीति का बड़ा नेता या चाणक्य मान बैठे है।
रेलवे स्टेशन पर गंदगी पर कार्रवाई नहीं, एक पाउच की पन्नी पर पहना दी चार्जशीट:- रेलवे स्टेशन पर अधिकारी बेहतरीन सफाई के दावे कर रहे है। लेकिन शाम होते अभी डस्टबीन उफ़ान पर आ रहे है। इन्हें खाली करने की घंटों ज़हमत नहीं उठाई जा रही है। इसे देखने वाला कोई नहीं है। इनसे पनप रही मख्खी-मच्छर की समस्या का असर सीधा केंटीन की खुली खानपान सामग्री पर दिखाई दे रहा है। यात्रियों की सेहत से खिलवाड़ के बावजूद ठेकेदार पर पुख्ता कार्रवाई नहीं।
वहीं इंदौर में बड़े साहब को रेलवे के हॉस्टल में निरीक्षण के दौरान केवल पाउच का खाली पैकेट दिखाई देने पर इंचार्ज पर चार्जशीट की ऐसी कार्रवाई कर दी। जैसे मानो बहुत बड़ा गुनाह कर दिया। बेचारे इंचार्ज के फ़िकर का आलम यह है कि अफ़सरों के धोग लगलगा कर थक गया। लेकिन साहब पर रहम की जूं तक नहीं रेंग रही है।
हे प्रभु, जगन्नाथ। रेल मंत्रालय के करोड़ों रुपए डकारने वाले या नुकसान करने वालों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। फ़िकर करने वाले का आलम यह है कि बेचारा वह बार-बार फ़िल्म ‘जनता हवलदार’ का गाना गा रहा कि ‘हमसे का भूल हुई, जो ये सज़ा हकमा मिली’।
शेरा भाइयों की गाड़ियों के मज़े:- उधर फ़िल्मी शेरा के मज़े है कि वह सिक्योरिटी बहाने दिनभर सलमान के साथ मौज मस्ती में घूमता है। हालांकि उस पर सलमान की सुरक्षा का बड़ा जिम्मा है। लेकिन रेलवे के शेराओ को किसकी सुरक्षा करना है, यह समझ से परे है। अब रेलवे में सिग्नल वाले शेरा को ही देख लीजिए। इस पर इसी विभाग वाले साहब खूब मेहरबान है। ये शेरा नौकरी को ताक में रखकर दिनभर गाड़ी में साहब के बीबी-बच्चों को शहर की सैर कराने व स्कूल से बच्चे लाने-छोड़ने में जुटा है। इनमें से पुराना शेरा तो इनसे भी बड़ा चतरा निकला। रेलवे के अटैच अपनी निजी कार को बड़ी मैडम के लिए लगवा दी। इतना ही नहीं, शेरा भाई की तगड़ी जुगाड़ तो देखिए। बड़ी मेडम के लिए अपनी निजी कार की ड्राइवरी के लिए रेलवे के ही सरकारी कर्मचारी की तैनाती करवा दी। कार प्राइवेट व ड्राइवर सरकारी…बहुत खूब।
हे, प्रभु। ऐसा पता नहीं था कि चापलूसी का ऐसा भी इनाम मिलता है। एक तो नौकरी मत करो, ऊपर से आपको सेटिंग की कमाई भी अच्छे से मिलती रहेगी। हे जगन्नाथम, प्रेमानंद, ये सब क्या हो गया।
