जलज शर्मा,
रतलाम। गणेश चतुर्थी पर रतलाम शहर में बुरी खबर क्या फैली कि तनावभरे खेल में ख़ाकी टीम के तत्कालीन लीडर (कप्तान) के साथ ही इनके खिलाड़ियों ने सड़कों पर खूब जोर आजमाइशी कर ली। इसके बाद भी खेल में जीतते-जीतते हार नसीब हुई। खेल में हुआ क्या ये तो सभी को पता है। इसका खामियाजा सीधे से ख़ाकी टीम के लीडर को ही भुगतना पड़ा। हालांकि लीडर ने इस खेल को इस तरह से खेलना चाहा कि दर्शकों में उग्रता न रहते हुए शांति बनी रहे। लेकिन खूले मैदान में जब पटका-पटकी तथा टांगा टोली की गई। तब मैच उनके हाथ से निकलत चला गया। लीडर को सीधे मैदान से हटना पड़ा। हे प्रभु, कहावत है कि हम तो डूबे सनम…। यह भी कहावत है कि हम तो चले, अब तुम्हारा क्या होगा…। नए लीडर ने खेल में शामिल टांगा टोली करने वाले खिलाड़ी को मैदान से ही बाहर निकाल दिया। इस खेल के बाद जब पुराने लीडर राजधानी (भोपाल) गए तो वहां भी इन्हें बहुत कुछ झेलना पड़ा। ऐसा कभी सोचा भी नहीं होगा। हे प्रभु इन्हें भी सदबुद्धि दें।
छा गए सूबे के अध्यक्ष, बदल गया माहौल
शहर में तनाव के छाए काले बादल को छांटने में खाकी एकाएक क्रूंद हो गई तो वहीं सत्तारुढ पार्टी में रतलाम जिले यानी सूबे के प्रमुख (जिलाध्यक्ष) के एक्शन ने सबकुछ बदल दिया। खाकी की मनमानी के बाद जब सूबे के प्रमुख धार्मिक नेताओं के साथ जिला प्रशासन के समक्ष विरोध जताने पहुंचे। जादू ऐसा हुआ कि रातोरात राजधानी से आए आदेश ने कप्तान की कप्तानी छिन ली। दूसरे दिन तो आक्रोश रैली में सूबे के अध्यक्ष छाए ही रहे। दूसरी ओर लघु वाले लघु जी की सूक्ष्म सोच ने लोगों को हताश भी किया। क्योंकि आक्रोश दिखाने शहर का कोई नेता नहीं बचा जो रैली में कदमताल करता नहीं दिखाई दिया हो। लेकिन पूरे माहौल के दौरान मंत्री दरबार में फोटो सेशन कराने वाले लघुजी की भूमिका दूर तक कहीं भी दिखाई नहीं दी। हे प्रभु, सियासतदार ऐसे हो कि वह लोगों की भावनाओं को समझे। वरना लोग आपकी भावनाएं अच्छे से समझ जाते हैं। इस सब के बीच में शहर का भला हुआ जो आज सभी हंसी खुशी त्योहार मना रहे है।
बड़ी मेडम का चला हंटर, छोटी मेडम सिक पर
इधर, शहर से हम दो बत्ती होते हुए रेलवे स्टेशन चले तो यहां केटरिंग से जुड़ी छोटी मेडम की कुर्सी अभी अस्थाई रूप से खाली दिखाई दे रही है।
दरअसल, पिछले माह कमाई वाले विभाग की हेड यानी बड़ी मेडम के हंटर से छोटी मेडम की तबीयत नरम हो चली है। बात भले ही छोटी थी लेकिन बारिश में ट्रैक के अवरोध के बीच हजारों यात्रियों की खेरख़बर लेना अफसर सहित निचले स्तर के हर कर्मचारियों के जिम्मे थी। यहीं वजह है छोटी मेडम की रेलवे स्टेशन पर अनुपस्थिति को अनुशासनहीनता में शामिल कर लिया गया था। जब दो बत्ती से चार्जशीट रेलवे स्टेशन पहुंची तो छोटी मेडम ने सिक पर उतरना मुनासिब समझ लिया। बड़ी मेडम का तो बस यहीं कहना था कि मेरी कोई दुश्मनी नहीं बल्कि मजबूरी है।
हे प्रभु, एटीट्यूड का ऐसा खामियाजा मिलेगा, इसका अंदाजा तो छोटी मेडम को भी नहीं था। ऐसा तो कभी सपना भी नही आया होगा। क्योंकि चार-छह माह पहले भी तीसरी मंजिल की बड़ी मेडम ने स्टेशन के एक आयोजन में उन्ही छोटी मेडम की चेहरे की चमक उतार दी थी। वजह आयोजन की तैयारियों में लापरवाही बरतना थी।
छुट्टी में भी चाबी बांटकर सभी को खुश रखा बाबूजी ने
मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय में इन दिनों ताला-चाबी वाले बाबू अपनी दरियादिली के लिए बहुत फेमस होते दिखाई दे रहे है। दरअसल ये प्रेमी व नरम दिल भी है। इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि नेशनल हॉलीडे (जैसे 15 अगस्त) पर 5 कर्मचारियों की ड्यूटी होना चाहिए, उस दिन 15 कर्मचारियों को बुलाकर बकायदा उनसे मस्टर पर हस्ताक्षर करवाए। साथ ही उन्हें वेतन के अतिरिक्त का भुगतान भी करवाते रहे है। इतना ही नहीं शनिवार व रविवार (अधिकांश चेम्बर व कार्यालय में अवकाश) वाले दिन दो कर्मचारी को ड्यूटी पर बुलाना चाहिए। इसके एवज में 5 कर्मचारियों को अतिरिक्त ड्यूटी का लाभ देकर उन्हें धन्य करते है। कहते है मस्टर से छेड़छाड़ भले ही कोई कर लें, लेकिन वेतन के अतिरिक्त के भुगतान का रिकॉर्ड तो पुख्ता प्रमाण होता ही है।
हे प्रभु, अपनी ‘चेतन’ ह्रदय आत्मा से प्राणी मात्र का कल्याण कर मानव सेवा में जुटे महाप्रभु को कोटि कोटि नमन।
सलमान के ‘शेरा’ से भी वफादार है सरकारी ‘शेरा’
फ़िल्म अभिनेता सलमान खान का बॉडीगार्ड ‘शेरा’ भले ही अपने मालिक की सुरक्षा को लेकर लाख मुस्तेद, चुस्त व तंदुरुस्त है। लेकिन रतलामी ‘शेरा’ के आगे मुंबई का वह ‘शेरा’ भी फीका पड़ सकता है। यहां बात रेलवे विभागों के सरकारी ‘शेरा’ की हो रही है। विभाग के अफसरों के साथ ऐसे ही बॉडीगार्ड है, जो ऑफिस से लेकर बंगलों तक साए की तरह साथ रहते है। चाहे फिर बच्चों को स्कूल छोड़ना हो या बाजार का कोई काम हो। पीछे नहीं हटते है। गाड़ियों के परिचालन वाले विभाग में अफसर के ‘शेरा’ की बात की जाए तो वह शरीर से भले ही कमजोर है। लेकिन अपने हर अफसर की उनके कार्यकाल में खूब सेवा करता रहा है। पिछले अफसर ने तो अपने इस ‘शेरा’ को कंट्रोल में बैठने को केबिन तक आबंटित कर दिया था। इनके आलम ऐसे थे कि ये साइडिंग के ठेकेदार, अधीनस्थ कर्मचारी या यहां तक कि टीटीई हो। सभी को मौखिक या फोन पर अधिकारी के नाम से धमकाते रहे है। अभी भी इनकी चाकरी बदस्तूर जारी है।
इधर, टीआरओ विभाग का ‘शेरा’ भी अफसरों की पहली पसंद है। ये चाहे ठेकेदार हो, ट्रेन ड्राइवर हो या विभाग का कोई कर्मचारी। उनके हर अटके काम को अपने मालिक (अफसर) से मिलकर या कहकर आसानी से हल करवा देने में माहिर है। ये बॉडीगार्ड के अलावा मेल-मिलाप वाले काम में भी माहिर है। इसी तरह अन्य विभागों में भी एक-एक सरकारी ‘शेरा’ अपना काम करने में निपुणता से जुटा है।
है प्रभु, ऐसी स्वामी भक्ति आदि अनादिकाल में भी कहीं देखी नहीं होगी। यह कलिकाल में भी देखने को मिल रही। हे, प्रभु जगन्नाथम, ये सब क्या हो गया…।
