रोम रोम में बसे वे राम है…तन मन में बसे वे राम है…। राम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहा जाता है। क्योंकि वह एक आदर्श पुरुष, भाई तथा राजा थे। राम पितृभक्त, धैर्यवान, साहसी, न्यायी, पराक्रमी, त्यागी तथा उदार थे। पवित्रता का पर्याय है राम। आदर्श, सम्मान, सत्कार का परिदृश्य इसी नाम में समाहित है। इसी विषय को लेकर हमारे पास रचनाएं आ रहीं है। रचनाकारों ने दीगर कविताएं भी मंच पर प्रकाशनार्थ प्रेषित की है।
जलज शर्मा
संपादक, न्यूज़ जंक्शन-18
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रचनाओं के चयनकर्ता
संजय परसाई ‘सरल’
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राम

पवित्र पावन नाम जिनका ,
“राम” नाम जपते ही सारे दुख मिटता।
लेकर मानव अवतार धरा को तारने आये जो।
महान आर्दश और त्याग की बेमिशाल राह दिखा गए जो।
वचन और न्याय की अद्धभूत मिशाल छोड़ गए जो।
कौशल्या नंदन मनभावन छवि ,
दशरथ के प्राणप्रिय राजदुलारे ,
समस्त अयोध्या के ऑंखों के तारे॥
जिनके अवतार से सारी धरा पाप मुक्त होने लगी।
जिनके स्पर्श मात्र से शिला से अहिल्या,
नारी में पुनः तब्दील हुई॥
खाकर झुठे बेर जो सबरी के प्रेम का मान बढ़ाया।
शिव धनुष तोड़ आपने ही जनक की प्रतिज्ञा का रख ,
जनकनंदनी सीता को अपनी जीवन संगिनी बनाया॥
पिता के वचन का ररव मान सीता लक्षमण,
वन गमन कर चौदह वर्ष तपस्वी जीवन अपनाया।
करके दानवों का संहार सारी धरा को हर्षाया।
सीताहरण कर जब रावण लंका ले गया,
तब हाय सीते -हाय सीते विलाप करते,
मिल हनुमान,सुग्रीव संग सीता का पता लगाया।
करके रावन का संहार श्रापमुक्त कराया।
अवधि कर पूरी चौदह वर्ष वनवास की,
समस्त जनों के आग्रह पर राज्य अपनाया।
समस्त अयोध्यावासी ने भी आपके आगमन पर,
हर्ष -उल्लास से दीप पर्व मनाया।
मर्यादा पुरूषोतम की रखते मिशाल।
करके परित्याग सीता का,
अपना राजधर्म निभाया।
जन-कल्याण हेतु आपने तमाम ,
उत्तम मार्ग अपनाया।
रघुकुल रीत सदा चली आई।
प्राण जाय पर वचन न जाई।
वंश की रख लाज हर हाल में ,
अपना वचन निभाया॥
सियावर राम चन्द्र की जय
-निवेदिता सिन्हा
भागलपुर
बिहार।
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त्रेता सा होगा अयोध्या धाम

कई वर्ष इंतजार में
यूं ही हमने खोये हैं।
महलों में रहने वाले राजा
टीन शेड में सोये हैं।।
तप तपस्या वनवास काल
अब जाकर के पूर्ण हुआ।
जोश जूनून और बल के आगे
पत्थर भी पीसकर चूर्ण हुआ।।
उम्मीद की प्यास अधूरी
वह घट अब तक रिते हैं।
शुभ दिन की आशा में रहते
कितने ही बसंत बीते हैं।।
सरयू के तट अब छलक गए
रौनक घाटों पर आई है।
दुल्हन सी संवरी साकेत नगरी
घर-घर ध्वजा लहराई है।।
मिलकर के दीपदान करें
पावन यह शुभ दिन आया है।
रोम रोम में राम बसे हैं
सब में राम समाया है।।
रामलाल के आने से
धन्य हुआ हे पावन धाम।
रामराज फिर से आएगा
त्रेता सा होगा अयोध्या धाम।।
-दिनेश बारोठ ‘दिनेश ॔
शीतला कॉलोनी सरवन रतलाम।
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रिश्तों की परछाइयां

जीवन हमें मिलता है
रिश्ते साथ ही लाता है
कर्मों का फल है या
पापों को काटना है ।
रिश्तों की परछाइयों से
जीवन घिरा रहता है
खुशियां पाने के लिए
छटपटाता रहता है ।
दुखों की धूप है और
उसी की परछाई
कैसे बाहर निकले कोई
रास्ता नहीं मिल पाता है ।
रिश्तों की परछाईयां
उलझी हुई रहती है
सुलझाने की कोशिशें
अन्त तक पहुंचाती है ।
रिश्तों की अहमियत
वो ही लोग जानते हैं
जिनके इर्द गिर्द
रिश्तेदार ।नहीं होते हैं ।
रिश्तों की परछाइयां
दुःख दर्द से घिरी न हो
रिश्तों की परछाईयों में
ठंडी बयांर सा एहसास हो ।
-अर्चना पंडित
इन्दौर (मप्र)।
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जो मिला वो खत नहीं

उस दिन
अचानक लायब्रेरी की उस किताब में
पन्ने पलटते हुए
जो मिला वह खत नहीं
एक सूखा मुरझाया हुआ फूल था
जो कह रहा था एक कहानी
किसी असफल प्रेम की
चलते हुए रास्ते पर
अचानक हवा में उड़ता हुआ
पैरों से आकर लिपट गया
किसी बच्चे की कापी का वह
फटा हुआ पन्ना
पेंसिल से जिस पर उकेरी हुई थी
एक तितली
उस सूने मकान में
जो अब करीब करीब खंडहर था
बची हुई दीवार पर
मौजूद थीं कीलें
और कुछ खाली आकार जहां कभी
टंगी होगी कोई तस्वीर
कोई आईना
जहां कभी नदी थी
उसकी रेत पर चलते हुए
महसूस होते रहे
चप्पूओं की छपाछप
बहते पानी की कलकल
और केवट के तराने
स्कूलों प्रार्थनागृहों और
तमाम उन जगहों से गुजरते
जो कभी रहें होंगे जन संकूल
बमों की गंध से गंधाते
शहर की बर्बादी की दास्तान सुनाई दी
और मैं याद करता रहा
शांति प्रेम और करुणा के
अब तक के रटे हुए सबक
-जनेश्वर
मंदसौर (मप्र)।
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जीवन एक गणित है

जीवन एक गणित है
“सांसे” घटती रही
“अनुभव” जुड़ते रहे ।।
अलग-अलग कोष्ठकों में बंद हम
कितने ही “समीकरण” बुनते रहे,
लगाते रहे हैं “गुणा-भाग”
हर “सुख-दुःख” का ।।
जो मिला फिर भी
कुछ शेष रह गया,
जो नहीं मिला
उसका खेद रह गया,
“जिंदगी” भागती रही
“सुकून” आस-पास भी न रहा।।
“जंग” लगी बुद्धि फिर भी
“अभिमान” को घोटते रहे
बनाते रहे है “तुलनात्मक” जाल
जबकि जीवन का अंतिम सत्य “शून्य” है।।
-नेहा शर्मा
खेड़ा, बदनावर
जिला धार (मप्र)।
