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ये जंगल की कहानी भी रोचक है…आका के लिए पैदा हो गए नए शेरा…कुर्सी’ बदलते ही व्यवस्था का ‘डिरेल’..गोदाम से माल नहीं उठ रहा और माल (डेमरेज) भी खाते में…छोटे साहब निवृत्त हुए तो जाप पर लगे हरेकृष्ण…हरे हरे!…

जलज शर्मा, न्यूज़ जंक्शन-18

रतलाम। जंगल कहानी में कौवा और कोयल के बीच का सर्वव्यापी क़िस्सा आप सभी को मालूम होगा। मेहनत करके कोयल घोसला बनाती है और धीरे से कौवा अंडे रखकर भाग जाता हैं। इस बात ने अनजान कोयल कौवे के अंडे और बच्चे की देखभाल करती है। बाद में कौवा घोसले पर कब्जा ही जमा लेता है।

दो बत्ती पर छुकछुक वाले ऑफिस के दूसरी मंजिल पर भी ऐसा ही वाकिया देखने को मिलने वाला है। दरअसल कमाई वाले विभाग की बड़ी अधिकारी के लिए लक्झरी चेंबर बनाया जा रहा है। इसके लिए एक साल से खूब जद्दोजहद चल रही है। पास के चेंबर से बैठे छोटे साहब को कुर्सी सहित उठाकर दूसरे केबिन में पहुंचा दिया। बाद में इन साहब के चेंबर की दीवार भी तोड़कर मिला ली गई। ताकि चेंबर का और बेहतर कार्पोरेट लुक दिखाई दें।

एक चीफ इंस्पेक्टर बाबू ने तो वफ़ादारी निभाते लक्झरी बन रहे चेंबर में लक्झरी लाइट, पंखें, ऐसी सहित अन्य इंतजामों के लिए दूसरे विभाग के बिजली अधिकारी से पंगा तक ले लिया। कार्पोरेट चेंबर का काम लगभग अब पूरा होने की कगार पर है।
इधर, एक साल से लक्झरी चेंबर के लिए चल रहे काम को आते-जाते देखा तो दूसरे अधिकारियों की लार टपकने लगी थी। मज़ेदार बात यह सामने आ रही कि दो अपर साहब में से एक कुंजी साहब ऊपर मंजिल के चेंबर में बैठ रहे थे। इन कुंजी साहब का कार्पोरेट चेंबर को देखकर मन डोल उठा। ऐसे में ये अब नीचे के कार्पोरेट चेंबर की कूची (चाबी) हथियाने के चक्कर मे जुट गए।

सितोलिया का खेल बिगाड़ने वाले ये साहब भी बड़े होशियार निकले। क्योंकि लक्झरी चेंबर का काम चलते वक्त कौवे की तरह चुपचाप सब कुछ चुपचाप देखते व निहारते रहे। जैसे ही चेंबर का काम पूरा होने को आया। उन्होंने लंगड़ डालने की तरकीब लगाते जुगाड़ जमाना शुरू कर दी। क्योंकि उन्हें भी अब ऊपर के बजाय नीचे बड़े-बड़े साहब की लाइन में आना है। अगर ये जुगाड़ लगाने में सक्सेस हुए भी तो बड़े वाले साहब को कोई ऐतराज नहीं होगा। क्योंकि उन्होंने भी पिछले साल ही अपना चेंबर लंबा-चौड़ा करवाया।
हे प्रभु, बड़ी मुश्किल से खुद का घर बनवा पाने वाले ये लोग सरकारी धन के दुरुपयोग में जरा भी नहीं हिचकते है। जबकि इन्हें पता है कि सबकुछ यहीं छोड़कर किसी दूसरे शहर में जाना है।

अपने आका के लिए पैदा हो गए नए शेरा:-  फिल्मी सलमान खान का बॉडीगार्ड शेरा अपनी स्वामिभक्ति के लिए शरमा जाएगा, यदि वह एक बार रतलाम के दो बत्ती एरिया में आ जाए। वह हमारे इंजिन वाले ऑफिस में आकर रतलामी शेरा को बस देख भर लें। वो खुद महसूस करेगा कि रतलामी शेरा मुझसे कितने बड़े वाले है। इतना ही नहीं, यहां हर छह माह में नए-नए शेरा पैदा होने लगे है। हम मोहन जोदड़ो की खुदाई से निकले पुराने शेरा की बात नहीं कर रहे है। बल्कि यहां जिक्र हो रहा है ऑफिस की दूसरी मंजिल में कर्म करने वाले विभाग से प्रकट हुए नए शेरा का…। ये शेरा पता नहीं परशुराम विहार कॉलोनी से आया या कुमावत मोहल्लें से, अभी साफ नहीं है। लेकिन बताया जा रहा है कि इसने भी मंदिर में जा-जाकर भगवान सोमनाथ को अच्छे से साध लिया है। बताया जा रहा कि ये सुलझाने वाली फाइलों को बास्केटबॉल खेल की तरह नीचे से ऊपर और बाद में सीधे बास्केट में डालने तक पूरी भूमिका निभाता है। इसमें एक इसके साथी की भी एक जैसी ही गोटी है। बस फर्क इतना है कि एक लोको पायलट से अक्षमता के सर्टिफिकेट से बाबू बन गया तो दूसरा अभी-अभी ड्राइवर से छोटा इंचार्ज बना है…।।
हे प्रभु, साहब लोगों की चाकरी करो तो फल तो पूरा के पूरा मिलता है। साहब किसकी किस्मत चमकाकर उसे क्या बना दें। इसका अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। जिसका भला हो जाता है तो बस वहीं से स्वामीभक्त नया शेरा तैयार होकर मार्केट में आ धमकता है।

‘कुर्सी’ बदलते ही व्यवस्था का ‘डिरेलमेंट’:- रेलवे वाले अक्सर कहते रहते है कि कोई भी चले जाएं लेकिन गाड़ियां थोड़ी रुकती है। कई आए और चले गए। लेकिन गाड़ियों के पहिए कभी थमे है क्या….। लेकिन यह बिल्कुल गलत तथ्य है। गाड़ियों के पहिए भले ही नहीं थमे लेकिन व्यवस्था जरूर बेपटरी हो जाती है। उदाहरण के लिए रेलवे स्टेशन पर ट्रेनों में ड्यूटी लगाने वाले ऑफिस को ही ले लीजिए। दो बत्ती वाले ऑफिस से लेकर स्टेशन के ड्यूटी लगाने वाले ऑफिस में कभी इंचार्जी से जुड़े टीम में ‘म’ नाम के तीन कर्मचारी थे। अब इसमें दो ‘म’ नाम वाले कर्मचारी को हटा दिया यानी उन्हें दूसरी ड्यूटी दे दी गई। तीसरे का नाम ‘म’ से भले शुरू नहीं है लेकिन सरनेम की शुरुआत ‘म’ से ही है। और ये अभी भी ड्यूटी वाले ऑफिस में ही इंचार्ज है।
बताया जा रहा कि बड़ी मेडम के आदेश से ‘म’ नाम वालों की तिकड़ी टूट गई। इनकी सीटें अदला-बदली कर दी गई। लेकिन व्यवस्थाओं पर असर पड़ने लगा। ड्यूटी चार्ट मोर्निंग के बजाय शाम की चाय के साथ मंगवाए जा रहे। वहीं रोस्टर के भी रोने पड़ने लगे है। हालांकि बाकी के दूसरे काम सब अच्छे से चल रहे है। जिस गाड़ी के लिए जो रॉकेट भेजे जा रहे है, वे अपना आधी-पाती का काम पूरा-पूरा करके रतलाम लौट रहे है।
हे प्रभु, जब तक गाड़ी का पहिया पटरी पर न घूमे, तब तक सफर का मजा नहीं आता। लेकिन इन दिनों  पहिया तो घूम रहा है, पर व्यवस्था ‘डिरेल’ होने लगी है।

गोदाम से माल नहीं उठ रहा और माल (डेमरेज) भी खाते में नहीं आ रहा:- छुकछुक वाले विभाग में दूसरी नंबर वाली कमाई पकड़ में आ जाती या दिख जाती है। लेकिन कई ऐसी जगह भी है। जहां माल जिमना-जुटना अच्छे से हो जाता है और किसी को कानों-कान ख़बर नहीं लगती। मालगाड़ियों में रखककर माल गोदाम लाए जा रहे माल का खेल भी इसी तरह से गुपचुप चल रहा है। जिसकी झड़ी शायद किसी को नहीं है। दरअसल, नियम है कि माल उतरने (अपलोडिंग) के बाद इसे पार्टी ने समय पर नहीं उठाया। तब सरकारी खाते में जमा करने के लिए डेमरेज यानी विलंब शुल्क वसूला जाता है।
अभी बारिश के माल वाले स्टेशन (गोदाम) पर माल खचाखच भरा है। लेकिन इसे समय पर उठवाया यानी वहां से ट्रकों द्वारा अपलोडिंग करवाने की ज़हमत नही उठाई जा रही है। अब इसका डेमरेज शुल्क सरकारी खाते में जा रहा या सीधे पॉकेट में पहुंच रहा। इसकी झड़ी किसी को नहीं लग रही है।
हे प्रभु, दूसरों के लिए नियमों को हवाले सरकारी काम चलाने वाले खुद के भले के लिए नियम तोड़ दें। इसे देखने वाला भी कोई नहीं है।

छोटे साहब निवृत्त हुए तो जाप पर लगे हरेकृष्ण…हरे हरे! :- जाते-जाते कर्म वाले विभाग का एक और किस्सा ध्यान में आया है। दरअसल इन दिनों बाबूगिरी का मेलजोल सर चढ़कर बोल रहा है। बेचारे कोई अधिकारी तबादला या रिटायर होने के बाद यदि केबिन खाली करें। तब उसी विभाग के बाबू जी सीधे उनके केबिनों पर ही कब्जे जमाने की जुगाड़ में लग जाते है। दूसरी मंजिल पर कर्म वाले सेक्शन में तीसरे नंबर के सहायक अधिकारी मीणा जी हाल ही में रिटायर्ड हुए। ये घर जाने की तैयारी में थे। तब एक बाबूजी मन ही मन में जाप करने लगे कि भागराम… भागराम…!
इसके बाद इनका केबिन खाली होते ही वहां बाबू जी घंटी का बटन हाथ में लिए हरेकृष्ण-हरेकृष्ण जपते कब्जा जमाए अंदर जा बैठे। बटन इसलिए थाम लिया कि मीणा जी के समय की अटेंडर कर्मचारी को घंटी बजाकर बुलवा सके। हरेकृष्ण जी की साहबगिरी देखकर इनके ही अगल-बगल वाले कर्मचारी आग बबूला होने लगे है। कहने लगे कि बेचारे बाबा सोमनाथ कितने दयालु है। विजिलेंस केस के बावजूद बाबूजी को उस काम से एक बारगे भी हटाया नहीं, जिस काम के लिए उन पर दाग लगा था। यह केस अभी निपटा भी नहीं और बैठने के लिए उल्टा उन्हें केबिन दे दिया।
दूसरी ओर पहली मंजिल पर गाड़ियों के ऑपरेट वाले विभाग के कंट्रोल सेक्शन में बैठने वाले एक डी-ओमएम साहब का भी तबादला हो गया। दरअसल साहब के पद जैसी विभाग में तीन पोस्ट थी। इसलिए इन साहब के तबादले के बाद दूसरा अफ़सर आने वाला भी नहीं है। ऐसे में कंट्रोल वाले शेरा ने कब्जा जमाने के लिए अभी से धीरे-धीरे केबिन की तरफ खिसकना शुरू कर दिया है। ये शेरा साहब ने अपने साथ भगवान की तस्वीरें, गमले, व्हाइट नैपकिन तथा टी-केटल इकट्ठा करना शुरू कर दिए है। साथ में घंटी का बटन भी…।
हे प्रभु, जगन्नाथ। यहां सबकुछ गड़बड़झाला है। कौन बाबू या कर्मचारी साहब बन जाए। यह कहा नहीं जा सकता है। क्योंकि ऐसे कर्मचारियों पर साहब लोगों की बड़ी कृपा तथा वरदहस्त रहता है।

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