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छोटे मियां के बड़े ठाट: क्लास-टू बनते ही हवा में उड़े अफ़सर बाबू, ‘जेठा भाई’ अभी तक फाइलें रहे नाप!

रतलाम। कहते हैं कि सरकारी महकमे में अगर कुर्सी का पाया थोड़ा सा भी ऊंचा हो जाए, तो साहब लोगों की गर्दन का अमला अपने आप सीधा हो जाता है। ऐसा ही चटखारेदार नजारा इन दिनों दो बत्ती के इंजिन वाले ऑफिस में चर्चा का विषय बना हुआ है। जहां बाबूगिरी करते साहब बन बैठे अफसर बाबू के जलवे देखकर अच्छे-अच्छे सूरमाओं ने दांतों तले उंगली दबा ली है। लेकिन चटखारे भी ले रहे है।

कुर्सी मिलते ही आई हेकड़ी!:- अभी कल तक जो ‘छोटे मियां’ हर छोटी-बड़ी बात पर ‘जी हुजूर, जी साहब’ करते नहीं थकते थे। उनके पैर अब जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं। वजह? इनकी प्रमोशन की लॉटरी! रेलवे में जैसे ही उन्हें क्लास-टू अफसर की कुर्सी क्या मिली, मानो उन्हें साक्षात कुबेर का खजाना मिल गया हो। ग्राउंड से लेकर दूसरी मंजिल वाले केबिनों में इनकी अकड़ भी देखने लायक है।

बदले-बदले से सरकार नजर आते हैं:- पहले हम दूसरी मंजिल के कर्म करने वाले विभाग में बाबू से उन्नत हुए केबिन वाले हाइब्रिड सहायक साहब की बात करते है। अब साहब की चाल में वो पुराना ढीलापन नहीं रहा। पहले ये जिन कर्मचारियों के साथ केंटीन में चाव से चाय पीने चले जाते थे। गुड मॉर्निंग भी नियमित करते थे। उन्ही कर्मचारियों को हड़काने का मौका भर देखते है। पिछले सप्ताह ही इनके हस्ताक्षर वाला विवादित पदोन्नति आर्डर जारी हो गया था। डीआर वाले कर्मचारी का पदोन्नति आदेश दूसरे ही दिन बदलना पड़ा। ये साहब केबिन में अपने कर्मचारियों के सामने शेखिया बघारते है। जगन्नाथ के बारे में उल्टा-सीधा बोलते है। लेकिन बाहर आते आवाज़ गुम हो जाती है।

साहब को सलाम का इंतजार: ट्रेनों को ऑपरेट करने वाले विभाग के एक और नए बाबू अधिकारी की तो बात ही निराली है। ये कंट्रोल में बैठकर ट्रेनों के टाइम टेबल तैयार करते-करते सहायक अधिकारी बन गए। एक बार क्या हुआ, ये छोटे साहब बाहर से चलकर रतलाम स्टेशन आए। ट्रेन से उतरते ही मास्टर साहब को तबाक से बुलवाया। ‘शर्मा’ कर बेचारे मास्टर ने सलाम ठोका तो बाबू अफसर बोले कि मेरा लगेज उठवाना है, किसी पॉइंट्स वाले मैन को बुलाओ। लेकिन पॉइंट्स वाला मैन बेचारा इंजिन काटने चला गया। क्योंकि नौकरी पहले करना थी। ऐसे में आग बबूला हुए बाबू साहब ने कहा कि ऐसी औक़ात। पॉइंट्स वाले मैन को मेरे ऑफिस में भेजना, उसकी खैर खबर लेता हूं….!!

फाइलें कम, रौब ज्यादा, प्रसाद के चक्कर में दफ्तरों में घूमते है जेठा:-  दफ्तर में काम की रफ्तार बढ़ी हो या न बढ़ी हो, लेकिन एक और निचली मंजिल के केबिन में बैठने वाले छोटे मिया जेठा भाई एकाउंट्स की फाइलों के बदले प्रसाद पाने के लिए भटकने लगे है। निचले तल के केबिन के ये सहायक अधिकारी की भले ही ‘हेकड़ी’ और डांट-डपट के ग्राफ रॉकेट की रफ्तार धीमी है। लेकिन ठेकेदारों की फाइलों को सूंघने की कला में ये माहिर है। ये अपना केबिन छोड़कर बार-बार इलेक्ट्रिक करंट, इंजीनियरिंग व सिंग्नल वाले विभागों में जेठमल की तरह रेंगते दिखाई देते है। इनका रोगर और रंगत देखकर हर कोई हैरान है। जब से साहब बने, बालों को नियमित डाई कर दफ्तर आते है। जेठा भाई के विभागों में ‘रेंगने’ के किस्से पर पूरा दफ्तर चटखारे ले-लेकर मजे उठा रहा है!
हे प्रभु, जगन्नाथम रेलवे का ट्रैक जितना लंबा होता है। उतनी ही जल्दी यहां सीनियरिटी के सिग्नल भी बदलते हैं। कुछ तो सरकारी कार में ऐसे मोबाइल देखते अकड़ कर निकलने है, जैसे वे सीनियर अधिकारी बन गए। बल्कि रेलवे बोर्ड अध्यक्ष ही बन बैठे। जबकि कुछ महिनों पहले रिटायर हुए एक सीनियर अधिकारी तो बेचारे सरकारी गाड़ी होने के बाद भी रोज बाइक से घर से दफ्तर आते-जाते रहे। उन्होंने सरकारी सुविधाओं के बिना ‘अजय’ पारी खेली।

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