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सरकारी खर्च से ऐसा ऐशोआराम… लिफ़ाफ़ा खोला तो निकली चार्जशीट…बंजली हवाई पट्टी पर क्रिकेट प्रशिक्षण…डेढ़ करोड़ रुपए का भांडाफोड़, आखिर किसने किया..

जलज शर्मा, (न्यूज़ जंक्शन-18)।
रतलाम। ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेजी हुकूमत द्वारा रेल सिस्टम का विस्तार करने के साथ ही स्वयं के ऐशोआराम के लिए भी भरपूर फंड के इंतजाम किए थे। तब मनोरंजन के लिए स्ट्रक्चर तैयार किया तो कही गेम्स की सुविधाएं जुटाई। अंग्रेज भले ही चले गए। लेकिन अपने पीछे वे कुटुंब छोड़ गए। अभी यात्रियों से प्राप्त राजस्व से लक्झरी स्विमिंग पूल, आलीशान गार्डन, ऐसी हॉल तथा बेहतरीन स्पोर्ट्स कोर्ट का निर्माण कर लिया गया। इन्हें महंगे किराए पर देकर इसे खूब पैसा वसूला जा रहा है। चलो यह ठीक है। लेकिन इससे प्राप्त आय को पार्टी सहित ऐशोआराम में क्यों खर्च कर रहे, यह समझ से परे है। होना यह चाहिए कि रेलवे कमाई की आय भी रेलवे राजस्व में जमा की जाए।
इसके उलट इंदौर में सरकारी पैसे से सामुदायिक भवन का निर्माण किया। लेकिन इसका किराया मात्र 1 हजार दिन के मान से रुपए है। वहां जमकर दुरुपयोग हो रहा है। कोई देखने वाला नहीं है। नियम बना दिए कि कोई भी कर्मचारी वेतन रसीद दिखाकर भवन को बुक करवा सकता है। रसीद के खेल में बाहरी लोग खूब मजे मार रहे है। रतलाम में बैठे साहब लोगों को इसकी पड़ताल की फुर्सत नहीं है।
हे प्रभु जगन्नाथम मुझे भी रेलवे मेंअफ़सर बनना था। सेवा चाकरी के अलावा परिवार को घुमाने सरकारी कार मिलती, खेलकूद के लिए फ्री जगह मिल जाती, खाने के लिए केटरिंग ठेकेदार हाथ जोड़कर सेवा में तत्पर रहते। तबादला होने तक खूब रौबदार रहती।

कल डाक बटी, लिफ़ाफ़ा खोला तो निकली एसएफ-11चार्जशीट:- हिंदी फ़िल्म ‘पलकों की छांव में’ का एक गाना था कि ‘डाकिया डाक लाया’… किशोर कुमार का यह गाना उस दौर में खूब चला। एक दिन पहले रेल कर्मचारियों को गाने ने दोबारा दौर की याद दिला दी।
वाकिया यह है कि दो बत्ती पर इंजिन वाले ऑफिस की दूसरी मंजिल पर किसी के मोबाइल में यह गाना चल रहा था कि डाकिया डाक लाया, डाकिया डाक लाया…। तभी कुछ रेल कर्मचारियों को बुलावा आया कि तुम्हारी डाक आई है। लेकिन जब लिफाफे को कर्मचारियों ने बारी-बारी से खोला तो अंदर एसएफ-11 चार्जशीट निकली। माथा पीट लिया..!!
दरअसल इस विभाग में बड़े साहब ने गुरुवार को जमकर चार्जशीट-डे मनाया। वे रोज की तरह सभी सेक्शनों में घूम-फिरकर आए। किसी सेक्शन में आधा घंटा बैठे तो कही एक घंटा टिके रहे। इसके बाद इनकी चार्जशीट तैयार कर बंटवा दी।
इससे पहले बोस ने सभी को बुलाकर क्लॉस भी ली थी। कुछ नारी शक्ति इंदौर से भी आई थी। इन्हें प्रोत्साहित कर साहब बोले-आप रेलवे का काम ईमानदारी से करिए। अपने कामों को बाहर भी सांझा भी कीजिए…। कुछ को तो गूढ़ मंत्र दिए कि गलत कामों के चक्करों में मत पड़ जाना। क्लॉस में बैठे सभी एक-दूसरे का मुंह देखने लगे।
हे प्रभु, कर्मचारी समझ नहीं पा रहे थे कि वे सरकारी ऑफिस में बैठे है या किसी प्राइमरी स्कूल की क्लॉस में…।

बंजली हवाई पट्टी पर क्रिकेट प्रशिक्षण:- रेलवे में भले ही खेल कोटे में भर्ती की प्रकिया की स्पीड स्लो है। लेकिन यहां क्रिकेट सहित अन्य खेलों के आयोजन हाई स्पीड में होने लगे है। क्रिकेट का तो ऐसा बुखार चढ़ा कि तीन संगठनों ने बारी-बारी से चीफ गेस्ट बुलाकर क्रिकेट टूर्नामेंट करवा लिए। एक संगठन के पास टूर्नामेंट आयोजन के पैसे नही है। इसलिए पदाधिकारी खुद को ‘अजय’ मानकर चुपचाप बैठ गए। क्रिकेट बुखार के वायरल कीटाणु रेल ऑफिस के निचली मंजिल में बैठने वाले एक साहब तक पहुंच गए। प्रेक्टिस का पावर दिखाने के लिए इन्होंने बंजली हवाई पट्टी जाना शुरू कर दिया। वे रोज अपने विभाग के अट्ठो-पट्ठों को लेकर सीधे हवाई पट्टी पहुंच रहे है। हालांकि आखा तीज (अक्षय तृतीया) पर राम मंदिर एरिया में साहब की गाड़ी को रुकना पड़ा। क्योंकि वहां प्रजापति समाज के सामूहिक विवाह की सेल (प्रोसेशन) निकल रही थी। इसलिए बंजली पहुंचने में देर हो गई।
साहब ने शायद सोचा होगा कि ऑफिस में पहले ही बैठे-ठाले बुराइयां मोल आ रही है। लोगों की निगाहें केबिन से अंदर-बाहर आने-जाने वालों पर लगी रहती है। दूसरी मंजिल वाले नए साहब भी मेरे सेक्शन में बार-बार झांक-झांककर जा रहे हैं। इसलिए अपन तो सीधे दो बत्ती से पांच किलोमीटर दूर हवाई पट्टी की ओर चल लो। वहां फिल्डिंग, बेटिंग और डाई लगाकर बॉल पकड़ने की प्रैक्टिस अच्छे से हो जाएगी।

डेढ़ करोड़ रुपए का भांडाफोड़ आखिर किसने किया:- पश्चिम रेलवे के मुंबई में जोनल बॉडी के एक ऑफिस में डेढ़ करोड़ (1.40 करोड़ रुपए) के घपले की बात सामने आने पर नेतानगरी सकते में आ गई। नेताओं का दिमाग वहां लग रहा कि आखिर घपले की भनक जगन्नाथ को कैसे लग गई। जगन्नाथ के पास मामला आते ही ये ख़बर मुंडेमुण्ड वायरल हो गई। हालांकि कुछ नेता स्वभाव से भोले है। ये अपने गणों (पदाधिकारी दोस्तों) को फोन लगते रहे कि आखिर ये पॉइंट जगन्नाथ को किसने दिया। हमें भी इसकी झड़ी नही लगी। वहीं तारक मेहता के एकमेव सेकेट्री भिड़े मास्टर (आत्माराम-तुकाराम) ने अपनी ही सोसायटी वालों से खूब पूछताछ की।
हे प्रभु, डेढ़ करोड़ रुपए के गबन में किसी एक व्यक्ति की भूमिका नहीं लगती है। एक बार में ही पैसा निकाला गया, यह भी मुमकिन नहीं है। जगन्नाथ को किसी ने कहा कि इसमें कोई नेताओं की तिकड़ी इन्वॉल्व है। दादा दादूदयाल के कार्यकाल में भले ही दाल-चावल, नमकीन व गेंहू के कट्टे मुंबई भेजे जाते रहे। रतलाम आते तो सतीश के पानी पताशे व दहीबड़े दादा चाव से खाते थे। लेकिन तब कभी ऐसे बड़े गबन सुनने को नहीं मिले। उनके सहपाठी पठान लोग भी बेचारे शरीफ थे।

रेलवे स्टेशन पर दो-दो हजार रुपए की बोली, छांटों-बीनों और बेचो:- रेलवे स्टेशन पर भले ही लाखों रुपए सालाना फीस की केटरिंग स्टॉले है। लेकिन इसके बाद भी स्टालें यदि व्यवस्थित चलानी है तो दो-दो हजार रुपए का चूंगी टेक्स चुकाना पड़ेगा। दो हजार रुपए दो और छांटों-बीनों और माल बेचो…। कुछ दिन पहले तो एक केटरिंग ट्रॉली वाले ने यह कहते हुए विवाद खड़ा कर दिया कि इंस्पेक्टर साहब, मैं जब मासिक चूंगी टैक्स जमा कर रहा हूं। तो, फिर बर्गर क्यों नहीं बेच सकता…हुज्जत हुई, खूब हंगामा भी हुआ।
हे प्रभु, शहर का नगर निगम कार्यालय और डीआरएम ऑफिस में ज्यादा फर्क नहीं रहा है। निगम के ऑफिस के ठीक बगल में कालिका माता मेला लगता है। जहां दुकानदारों की खूब कमाई होती है। वहीं डीआरएम ऑफिस के बगल में रेलवे स्टेशन है। यहां भी रोज यात्रियों का मेला लगता है। इसलिए स्टेशन पर भी मेले जैसा सब कुछ बिक रहा है। जिम्मेदार लोग तो वहां अग्रवाल की कुल्फी भी बिकवाने की तैयारी में जुटे है।

राधे-राधे चंदन तिलकधारी अब तस्वीरें जमाने की तैयारी में:-ऑपरेटिंग गुरू नाम से विख्यात तिलकधारी बाबा राधे-राधे को कोशिशों के बाद भी बैठने के लिए केबिन नहीं मिल रहा है। जुगाड़ तगड़ी लगाई गई। लेकिन इसका कोई फायदा नहीं मिला। राधे-राधे बाबा पिछले दिनों अपने इष्ट देव की तस्वीरें लेकर किसी सिंगल केबिन में बैठने की पूरी तैयारी कर ली थी। लेकिन मामला जमा नहीं तो फ़िलहाल बड़े साहब के चेंबर में सभी तस्वीरें रख दी है। इस बीच एक कर्मचारी ने आकर उनसे कहा कि भाई साहब यहां तो मुंबई से आ रही ईनाम वाली शील्ड रखेंगे। अपनी झांकी कही और सेट कर लो। इस पर बाबा राधे-राधे ने कहा कि जा रे जा…। शील्ड तोकने में मेरा मुकाबला तुम नहीं कर सकते हो। मुझे तोकने की जितनी प्रैक्टिस है, उतनी तुम्हारे तीन पीढ़ियों की नहीं रही होगी।
हे प्रभु जगन्नाथम। प्रेमानंद…। ये सब क्या हो गया।

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