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ऑनलाइन के वर्क्स में ऑफलाइन की सीधे घर पहुंच रही कमाई…, कैटरिंग में हाफ-हाफ कमाई का खेल…, चेक पर चेक भुनाने में आगे नेताजी…

न्यूज़ जंक्शन-18
रतलाम। छुकछुक वाले विभाग में इन दिनों ऊपरी कमाई (कमीशनबाजी) का खेल जमकर चल रहा है। 2 नंबर के इस पैसे को ठिकाने लगाने कोई अपनी पत्नी के खाते में तो कोई अपने रिश्तेदारों के हाथ जाकर थमा रहा है।
दरअसल छुकछुक गाड़ी चलाने के नाम पर मोदी जी खूब पैसा दे रहे है। दो बत्ती स्थित इंजिन वाले ऑफिस के कुछ विभागों में इन पैसों की खूब बत्ती लगाई जा रही है। ये मोदी सरकार का ये फंड यहां संभल-संभल नहीं रहा है। मान लिया कि सरकारी पैसा नियम से ख़र्च करना है। इसलिए यहां तो नियमों की आड़ में भ्रष्टाचार करने की खूब जुगाड़ लगा ली गई है। धड़ाधड़ डेवलपमेंट के काम का प्रोजेक्ट बनाए जा रहे। हाथोंहाथ टेंडर भी जारी कर रहे है। और ऊपरी कमाई देने वाले ठेकेदारों को फ़ौरन ही वर्क ऑर्डर दिया जा रहा। कागजों की सेटिंग बिठाना इन विभाग के मुखियाओं के बाएं हाथ का खेल हैं। बस फिर क्या..कमीशन का लाखों रुपया आ गया जेब में…।
एक विभाग के सीनियर मुखिया आयुष जी तो दूसरे विभाग के मुखियाओं से एक कदम आगे है। ऑफ़ लाइन सिस्टम के जरिए आने वाले पैसे को कैसे ठिकाने लगाना है। इस मामले में इनसे अच्छा हुनरबाज कोई नही है। दरअसल ये हर दो-तीन माह में अपने घर केवल इसलिए जाते है कि ऑफलाइन कमाई की पोटली वहां अपने घरवालों के सुपुर्द कर सके। किसको भनक न लग सके। यहां के दूसरे खर्चे तो ठेकेदार चुटकी में ही उठा लेते है। उन्हें भी तो बदले में सेटिंग के जरिए आसानी से काम मिल रहा है। रतलाम के ही एक ठेकेदार मंत्रिमंडल के मोदी को तो डीजल इंजिन सुधारने वाले शेड तक मिट्टी, रेत, कंक्रीट व थोड़ी सीमेंट घोलकर सड़क बनाने का ठेका दिए जाने की तैयारी है। बेचारे शेड वाले लोग तो फिर भी सड़क बनने के बाद तक चुप रहेंगे। क्योंकि उन्हें बड़े-बड़े गड्डों से जैसे-तैसे मुक्ति मिलेगी। सड़क उखड़ेगी, तब की तब देखी जाएगी। कर्मचारी छोटे गड्ढें तो सहन कर ही लेंगे। कुछ दिन बाद फिर से नई सड़क का टेंडर होना ही है।
हालांकि आयुष जी के तेवर पहले फ़िल्मी चुलबुल पांडे की तरह थे। ठेकेदार मंत्रिमंडल के रतलामी मोदी से इनकी बन नही रही थी। लेकिन इन मोदी जी ने पता नी क्या घुट्टी पिलाई कि अनबन सब दूर हो गई।
हे प्रभु, जगन्नाथम खुद की जेब से साइन करने वाला बॉलपेन न खरीद सकने वाले इन मुखियाओं को जनता के पैसे को धूल-मिट्टी करने से पहले सोचना चाहिए। इन्हें ये पता नहीं कि ऐसा समय भी आता है। जब गांधीछाप की गड्डियों पर फफूंद हटाने वाला कोई नहीं मिलता।

हाफ-हाफ कमाई का खेल जारी:- रेल की आय को खर्च करने वाले विभाग की काली करतूतें तो हमने शब्दों के खेल में दिखा दी। लेकिन इन दिनों राजस्व कमाई वाले इंकामार्शियल विभाग के कैटरिंग सेक्शन वालों को लेकर भी खूब बयानबाजी हो रही है। एक गोल टोपी तथा एक चश्मे वाले बाबुओं पर काली कमाई के आरोपों की एक ठेकेदार ने झड़ी लगा दी। मामला अभी भले ही शांत है लेकिन आग फिर से भभकना लगभग तय है।

दूसरी ओर कैटरिंग से जुड़े एक अदने से ठेकेदार के बड़े-बड़े खेल सामने आ रहे है। इसे कैटरिंग के प्लेट सिस्टम के ऑर्डर लेने का गौरव हासिल है। बल्कि यह हर अफ़सर का चमचाभिषेक करने में माहिर है। इस नन्हें ठेकेदार को बड़ी से बड़ी मेडम से लेकर बाबुओं तक को साधने की बड़ी महारथ है। बताया जा रहा कि विभाग से जुड़े कैटरिंग के काम भले ही इसे दिए जा रहे हैं। लेकिन मिटिंगों सहित आयोजनों व पार्टियों के आर्डर में विभाग में ही पार्टनरशिप करना पड़ रही है। हालांकि इसे क्या फर्क पड़ना है। बिल फटेगा तो आपस में बंटेगा ही…। ऑर्डर की 100 रुपए की प्लेट 240 व 150 की प्लेट के 320 रुपए मांड देंगे। मेम जी सब देख लेंगे। सरकारी खजाने से सब बिल पास करवा लेंगे।

प्रभु जगन्नाथम ये सब कुछ सेटिंग व चापलूसी से ही संभव है। इसमें मान-मर्यादा सबकुछ त्यागना पड़ती है। यह हर किसी के बस की बात नहीं गुरु…।

तोता-मैना का खेल थामने वाला कोई नहीं:- रेल एरिया में जहां-तहां तोता-मैना का खेल जारी है। लेकिन इसे थामने वाला कोई नहीं है। बताया जा रहा कि रविवार को ही रेल कॉलोनी वाले खेल मैदान में जिम एरिया में पहले एक तोता गया, बाद में मैना पहुंची। थोड़ी देर बाद दोनों अलग रास्तों से चलते बने। ग़नीमत रही कि देखने वाले ने वीडियो नहीं बनाया। वरना मैदान के केयरटेकर की तो वाट ही लग जाती। 7 नंबर वाली ओल्ड कॉलोनी की घटना तो जगन्नाथ पहले भी बता चुके है। इन मामलों में दो बत्ती वाला ऑफिस भी अछूता कहां है। उड़ी-उड़ी बात आई है कि शनिवार को नीचे तल पर ऐसा की माजरा देखा गया। छुट्टी थी, लेकिन देखने वालों ने बात बाहर तक पहुंचा दी। कंट्रोल से गाड़ियों को ऑपरेट करने वाले विभाग के साहब भी इन दिनों कंट्रोल में नहीं है। इनके चेम्बर में एक मैना दीदी ठसी रहती है। हंसी-ठिठौली में रेल का समय बर्बाद हो रहा है। लेकिन इसकी किसको पड़ी। साहब ने तो दीदी को ड्रेसकोड में न आने तक की छूट दे डाली है।

हे प्रभु, पहले बड़े केबिन वाले बड़े साहब समय-समय पर सेक्शनों व चेम्बर्स में दौरा करते थे। अब तो इंजन सरकार पूरी तरह राम भरोसे चल रही है।

चेक पर चेक भुनाने में आगे नेताजी:- चंदे के धंधे से अपनी दुकान चलाने वाले रेल के एक नेता पैसा उड़ाने की होड़ में अव्वल है। जबकि दूसरे खेमें के नेता खर्च में मुट्ठीमिच बने हुए है। जो नेताजी खर्च में अव्वल है, वे अपनी अभिलाषा के मुताबिक साइन किए हुए चेक धड़ाधड़ बैंक जाकर भुनवा रहे है। यह पैसा कहां उपयोग हो रहा है। इसकी इनके खेमें वालों को अच्छे से झड़ी है। अब तो खुलेआम कानाफूसी भी होने लगी है। इनका कहना है कि बेचारे इनके चेयरपर्सन भोले-भाले है। इन्हें केवल अपनी कुर्सी बचानी है। इसलिए ‘जय भोले’ बोलकर काम चल रहे है। बल्कि कुंडली मारे ये चुपचाप मौन भी बैठे रहते है। जबकि कोष के सरदार को डर है कि उन्हें नेताजी कहीं पद से न हटा दें। ये भी चुपचाप गौतम ऋषि की तरह ध्यान में लीन है। चेक पर इकट्ठे एडवांस में साइन कर डायरी सौंप देते है।

हे प्रभु, इसे मगरूरी कहेंगे कि ‘संघ’ (साथ) चलने वालों की वजह से वे नेता बने है। लेकिन अब वे इनकी मनमानी सहने को ‘मजदूर’ जैसे मजबूर है। हालांकि कुछ इनके ही लोग उंगली टेडी करने की तैयारी में है। मुंबई में बड़े नेताजी तक बात पहुंचाने की कह रहे है। बड़े नेताजी टेडी आँख से सबकुछ देख लेंगे। जब भी खुलासा होगा तो जगन्नाथ सीधे आईना दिखाएंगे।

है प्रभु जगन्नाथम, प्रेमानंद ये सब क्या हो गया।

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