गांधी जयंती गई, स्वच्छता का क्या काम..बारिश में बसेरों (क्वार्टर्स) में फ़जीहत, थप्पड़ की गूंज मुंबई व दिल्ली तक…
जलज शर्मा,
गांधी जयंती के दिन शासकीय खर्च पर टीशर्ट, टोपी व स्पोर्ट्स शूज़ पहनकर स्वच्छता का बिगुल बजाने वाले रेलवे के जिम्मेदार लगता है अब शासकीय परिसर की साफ-सफाई को भूल बैठे है। रेलवे स्टेशन से लेकर इंजिन वाले ऑफिस तक गंदगी की भरमार है। भले ही इंजिन वाले ऑफिस की लिफ्ट में थूकने वालों के खिलाफ गधे वाला स्टीकर लगा दिया गया है। लेकिन बाहर कचरे का ढेर लगा है। दो दिन पहले तक ऐसे ही नज़ारे दिखाई दे रहे थे। ऐसे ही हाल रेलवे स्टेशन से फ्रीगंज बायपास रोड पर भी है। लगता है ठेकेदार व सफाई प्रभारी अफसर की गोद में जा बैठे है। इसलिए तो कोई कार्रवाई नहीं की जा रही हैं। अब आगे शायद इन्हें डेंगू जैसी बीमारियों का इंतज़ार है।

हे प्रभु, गंदगी को देखकर लगता है कि सफाई कराने वाले जिम्मेदार सोच रहे होंगे कि गांधी जयंती तो गई। आने वाली जयंती पर दो-चार दिन काम कर फ़ोटो शूट करवा लेंगे। नए बड़े साहब तो बेचारे भोले भंडारी है। ट्रेनें समय पर आए-जाए बस…। बाकी तो लेना-देना ही नहीं है।
बारिश में घोसलें सुरक्षित, बसेरों (क्वार्टर्स) में फ़जीहत:- बारिश के दिनों में रेलवे कॉलोनियों में घने पेड़ों पर बने घोसलों में सैकड़ों पक्षी प्राकृतिक रूप से सुरक्षित है। लेकिन इन्हीं कॉलोनियों में रहने वाले रेलवे के कर्मचारी रूपी इंसान अपने-अपने बसेरों में खासे परेशानी में है। यह फ़जीहत क्वार्टर्स की छतों से पानी रिसाव सहित अन्य कमियों के चलते हो रही है। बारिश से पहले ही इनके द्वारा दरकारें की जा चुकी है। लेकिन बेचारे ये कर्मचारी न तो अफ़सर है। नहीं इनके हाथों में ठेकेदारों के बिल पास करने या रोकने के पॉवर…। वरना ठेकेदार का बिल रोककर एक अदने से साहब ने अपने क्वार्टर का बेहतर मेंटेनेंस करवा लिया था। ठेकेदार बिल के लिए ‘केके’ कर थक गया। आखिर साहब रंगरोगन व उपरतल्ली की टाईल्स लगवाकर ही माने। दूसरी ओर यहां कोई भी बड़ा साहब है तो उसकी खूब चलेगी। ये साहब तब तक अपने बंगलो में नहीं घुसेंगे, जब तक कि इसे वे अपने माफिक नहीं करवा लेते। ऐसे में इन बेचारे कर्मचारियों ने क्या बिगाड़ा। जिनके बूते पर ही रेल गाड़ियां चल रही है…। उल्टा उन्हें घर में सुकून नहीं। परेशानियां भोगना पड़ रही है।
हे प्रभु, लगता है देशभर में राज करने वाले तथा पटरियों का जाल बिछाकर ट्रेनें चलवाने वाले अंग्रेज रतलाम में ज्यादा समय तक टिक गए होंगे। इसलिए यहां के हर अफ़सर में अंग्रेजियत का असर ज़्यादा दिखाई देने लगता है।
रतलाम में चले थप्पड़, गूंज मुंबई व दिल्ली तक सुनाई दी:- पिछले दिनों रतलाम रेलवे स्टेशन पर चले थप्पड़ की गूंज ट्रेन की स्पीड से भी तेज चलकर मुंबई व दिल्ली तक जा पहुंची है। थप्पड़ की आवाज इतनी तेज थी कि उस वक्त रेलवे स्टेशन पर इंजिनों के हॉर्न तक धीमे पड़ गए। ऐसे में यह गूंज दो बत्ती स्थित इंजिन वाले ऑफिस तक पहुंचना बेहद ही आसान थी। चूंकि यह वाकिया मन-मोहन तो था नहीं। इसलिए गूंज की गाज संबंधित दो काले कोट वालों पर पड़ना भी तय थी। ड्यूटी बजाने की गड़बड़ी को लेकर हुई माथापच्ची…. सॉरी, हाथापाई में एक पक्ष ऑफिस पहुंचा तो दूसरा पुलिस के पास चला गया। लगता हैं यह बैरवा (बेर) थमेगा नहीं। मामले में तीसरा मूल पक्ष बैठे-ठाले गूंज के चपेट में आ गया। इसे लेकर जांच व सत्यता का काम विभाग के हाथ में है, सो वो जाने…।
लेकिन ऐसे मामलों में बाबा जूलियस के कहानी-किस्सों का कहावती शब्द यहां भी चरितार्थ होने लगा कि ‘डी…..का दंड फ़क़ीर को’। हालांकि कहावत के अनादरित शब्द को प्रभु जगन्नाथ संकेतक ही बता सकते है। बाकी तो बाबा जूलियस के अनुयायी सब जानते ही है।
-अफ़सरों ने डिनर से पल्ला झाड़ा, केवल भोजन भट्ट गए:- मान्यता वाले रेल संगठनों की अफ़सरो के साथ होने वाली बैठकों में भोजन पार्टी की मान्यता लगता हैं अब समाप्त हो चली है। दरअसल पिछले दिनों की वार्ता बैठकों में एक दिन प्रशासन यानी अफ़सरो की ओर से खाना दिया जाता था। जबकि दूसरे दिन संगठन इसका खर्च वहन करता था। सद्भाव वाले सहभोज के दौरान गिले-शिकवे भी दूर हो जाते थे। दो दिन पहले ही एक संगठन की बैठक हुई। तब दोनों दिन के भोजन का ‘स्वाद’ एक होटल में संगठन के खर्च पर ही चखना पड़ा। हालांकि अधिकारियों को मौखिक रूप से खाने का बोला गया। लेकिन वे आते कैसे…। इस बीच दूसरा संगठन बदलकर आए नेताजी को क्या पता था। बैठक के बाद उन्होंने वित्त वाले बड़े साहब को कह दिया कि चलिए सर भोजन करने…। तब साहब ने बोल दिया कि आज हमारा व्रत है। हम घर ही ग्रहण करेंगे।
हां, बैठक के दोनों दिन भोजन भट्ट वालों की जरूर मौज रही। संगठन के नेताओं ने केवल बाहर से आने वाले प्रतिनिधियों के लिए ही भोजन के इंतजाम किए थे। लेकिन भोजन भट्ट वाले सुबह ही घर से बोलकर ऑफिस निकले थे कि खाना मत बनाना। मेरा लंच होटल में रहेगा। बैठक के बाद मन की अभिलाषा के साथ वे भी स्वाद चखने होटल जा पहुंचे।
हे प्रभु जीवन के मौज, करेगी भोले की फ़ौज। ये तो अच्छा रहा कि सावन मास के पहले ही वार्ता वाले भोजन के इंतजाम हो गए। वरना कई तो उपवास की वजह से वंचित रह जाते।
रेलवे के नए विभाग में भी शेरा तैयार, हो रही बल्ले-बल्ले:- सलमान खान के गार्ड शेरा की तर्ज पर रेल अधिकारी भी अपने-अपने शेराओं से घिरे है। अब एक नया शेरा सिग्नल एवं टेलीकॉम विभाग में उभरकर सामने आया है। जिस तरह इस विभाग के करोड़ों रुपए के ठेके एवं गुपचुप ठेका आबंटन की भनक ज्यादा किसी को नहीं रहती है। वैसे ही यहां का शेरा भी गुपचुप तरीके से अफसर की सुरक्षा व सेवा में लगा है। टेक्नीशियन केटेगिरी के इस शेरा की हाइट भले ही ‘बिग-बी’ जैसी है। लेकिन इसका काम सलमान खान के शेरा से भी तगड़ा है। ये अक्सर स्कार्पियो में अफ़सर के बच्चों के साथ ही देखा व पाया जाता है। सेवा-चाकरी में इसके भी अच्छे खासे दिन बीत रहे है।
फिर भी…. ये कुछ भी कर ले, ऑपरेटिंग के शेरा को मात नहीं दे सकता है। क्योंकि मोहन जोधड़ों की खुदाई से निकला यह अति प्रतिभावान शख्स है।
हे प्रभु, ये सब क्या हो गया। अपने छोटे स्वार्थ के लिए ऐसे लोग अपना ज़मीर कैसे बेच सकते है।
