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शिवरात्रि गई, भोले भंडारी के अभी नहीं खुले नेत्र, सुविधा के लिए दुविधा, तबादलों की रोकटोक के लिए ऐसे जुट गए, मसूरी का मोह भी नहीं छुटा

जलज शर्मा,
भोले भंडारी कहे जाने वाले इंजिन वाले ऑफ‍िस के बड़े साहब का भोलापन जग जाहिर होने लगा है। क्योंकि इनके राज में देव-गण, सुर-असुर सभी सुखी होते दिखाई दे रहे हैं। इंदौर में खबरों वाले नारद मुनि भी आराम मुद्रा में है। यानी भोले की खेम के राज में नारद भी राजा बन बैठे है।
ऐसी चर्चा है कि शिवरात्रि के बाद होली चली गई। आराधना व मौजमस्ती हो गई। शीतला सप्‍तमी व दशा माता का त्‍योहार भी निकल गया है। भेंट-पूजा भी जमकर चली। लेकिन अभी भी भोले के नेत्र नहीं खुले हैं। हां, इन्‍हें अलग-अलग देवी-देवताओं से ब्रह्मांड की रमूज जरूर मिल रही है। हो सकता है कि आगे चलकर कभी धरा संकट में आए। भोलेनाथ बाद में बंम भोले का नाद सुनाकर तांडव दिखा सकते है। मगर चार-छह माह तो ऐसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। इतने समय में कई देवता अपना देवलोक छोड़कर पाताल लोक (दूसरा मंडल या झोन) में चले जाएंगे… अंर्तध्‍यान हो जाएंगे।

सुविधा के लिए दिव्‍यांग कर्मचारियों की दुविधा:- तीन पहिया गाड़ी से भन्‍नाभोट आने-जाने वाले रेलवे के दिव्‍यांग कर्मचारी इन दिनों अपने ही ऑफ‍िस से आने-जाने में खासे परेशान होने लगे हैं। वे भी नीचले तल पर काम करने वाले दिव्‍यांग ज्यादा….।
इसकी वजह बड़े साहब के चैबर को चौबारा बनाने के लिए चल रहे निर्माण का काम है। पहले नीचले तल के अधिकांश दिव्‍यांग पिछले भाग से सीधे आते-जाते थे। कुछ दिनों से निर्माण के चलते पिछला गेट बंद कर दिया गया। ऊपरी मंजिल वाले दिव्‍यांग तो लिफ्ट से आ-जा रहे हैं। लेकिन नीचते तल वाले दिव्‍यागों को अगले भाग की दो-चार सीढ़ी उतरने में ही खासी मशक्‍कत करना पड़ रही है। हालांकि वे किसी अन्‍य कर्मचारी के कांधे का सहारा ले लेते हैं। लेकिन कांधे का उपयोग वे सोच-समझकर करने लगे हैं। क्‍योंकि हर तीसरा कर्मचारी किसी न किसी संगठन से जुड़ा है। इनसे सहायता लेने पर वे दूसरे दिन ही चंदे के लिए फॉर्म पर साइन कराने टेबल पर जा पहुंचते हैं।
हे प्रभु जगन्‍नाथ, इन दिव्‍यांग कर्मचारियों के लिए एक गेट बंद किया। तब इनके लिए अस्‍थाई रैंप के इंतजाम क्‍यों नहीं किए गए। दूसरा चैंबर में किसी को ज्‍यादा बिठाया नहीं जाता है। तो इसे चौबारा क्‍यों बनाया जा रहा है। यह भी समझ से परे हैं।

तबादलों की रोकटोक के लिए ऐसे जुट गए:- इंजिन वाले ऑफिस में तबादलों के लिए गरमाए माहौल को ठंडा करने के लिए एड़ी से चोटी का जोर लगाया जा रहा है। पिछले दिनों आवधिक तबादलों की खबरें क्‍या आ गई। सब ऊंचे-नीचे हो गए, सांसे थम गई। डर है कि कही बड़े साहब या मेडम वास्तव में एक्‍शन न ले लें। ऐसे में मरता क्‍या न करता…. अपने-अपने बीचवानों के कानों में मंत्रर फूंककर उन्‍हें सक्रिया किया। फ‍िर क्या था, सीधे दो नंबर वाले साहब तक सूचनाएं भिजवाई गई। विभागों के साहब-मेडम से भी अरज लगवाई गई। इस बीच सैर-सपाटे से लौटे एक साहब ने तो फोन पर यहां तक कह दिया था-मैं आ रहा हूं…। तुम फ‍िकर मत करों, सब कुछ निपट लूंगा…। कोई भी हिला नहीं सकता है।
हे जगन्‍नाथ, आवधिक तबादलें का समय लांघने के बाद कुर्सी पर जमने का ऐसा क्‍या मोह है..। हमारे तो समझ से परे है। दाल में काला या फ‍िर पूरी दाल ही काली है। यह उस वक्‍त पता चलेगा जब दाल ढूलकर बिखरेगी। तब जगन्‍नाथ असली टेस्‍ट पता कर पाएंगे।

कुर्सी के बाद मसूरी का मोह भी नहीं छुटा:- दो दिन पूर्व कर्मचारियों का दल मसूरी के लिए रवाना हुआ। काम का बोझ जरुरत से ज्‍यादा रहता है। इसलिए नए कपड़े पहनकर सभी तरोताजा होने निकले है। बेचारे वे कर्मचारी जिनके सिर काम का असली बोझ है। वे यहां से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।
जो कर्मचारियों गए है, उनमें शामिल ऐसे कल्‍याणी भी मसूरी पहुंच गए। जिनका कम्‍प्‍यूटर के केबिन में बैठे-बैठे कर्मचारियों को महज टल्‍ले देने का काम है।
हे जगन्‍नाथ, मुंबई मुख्‍यालय से मिले जोड़तोड़ वाले बजट को पूरा करना है तो अपने-अपनों को रेवड़ी तो देना जरुरी है। बाकी हिसाब-किताब, जोड़-घटाव का मिलान तो बाद में सब कर लिया जाएगा।

मार्च एंडिंग के नाम पर छुट्टियां पेंडिंग- कभी मौज से ड्यूटी करने वाले चेकिंग कर्मचारी इन दिनों खासे परेशानी में पड़ गए है। इसकी वजह है मार्च में यात्रियों से मिलने वाली सब तरह की आय बढ़ाने का तनाव है। ऐसे में नियमित ड्यूटी टिकिट चेकिंग कर्मचारियों के लिए भारी सिरदर्द साबित होने लगी है। मामले को सीधा समझे तो इन कर्मचारियों के रेस्‍ट व छुट्टी पर पूरी तरह से लगाम कस दी गई है। किसी की छुट्टी मंजूर नहीं की जा रही है। रोस्‍टर के मान से नियमित ड्यूटी करना पड़ रही, यह समस्‍या पृथक है ही।
हे प्रभु जगन्‍नाथ, ये सब क्या हो गया। एक तो रोस्टर की ड्यूटी का शिकंजा, दूसरा रेस्ट भी कैंसल…। फिर भी लगे रहो, अर्निंग अव्वल आई तो नाम सभी का होना ही है।

 

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