कैटरिंग वाले बाबू का कमाल, मेडम ने बनाया फुटबॉल….राष्ट्रीय पर्व पर इस बार खूब ध्यान रखा, कोई कमी नहीं छोड़ी…नहीं छूटा केबिन का शौक, क्या कर लेंगे विजिलेंस वाले….
न्यूज़ जंक्शन-18
रतलाम। दो बत्ती स्थित इंजिन वाले ऑफिस में कैटरिंग वाला एक बाबू बड़ा ही स्याना निकला। छोटे-मोटे खेल के बाद बाबू ने सीधा बड़ा गेम करने की सोच ली। एक ठेका देने की प्रक्रिया में फ़र्म वाले को इन बाबू ने धमका दिया। कहा कि जेब ढीली करना पड़ेगी। नहीं तो काम नहीं होगा। गोल टोपी वाले इस बाबू ने तो यहां तक कह दिया कि मेरा कुछ भी नहीं है इसमें…। यह तो बड़े-बड़े साहब के हिस्से का मामला है। इसलिए मैं कुछ नहीं कर सकता हूं। बस फिर क्या था…। ठेकेदार ने टोपीबाज बाबू की रिकार्डिंग सहित शिकायत कमर्शियल की बड़ी मेडम जी से कर दी। आग बबूला हुई मेडम जी ने बाबू को जैसे फुटबॉल ही बना दिया। उसी दिन बाबू पर तबादले की किक पड़ गई। इन्हें ‘महूवाला” स्टेशन के आसपास वाली नई साइडिंग तरफ फेंक दिया।



दो दिन पहले हुई इस कार्रवाई से विभाग में हड़कंप मच गया। लेकिन ऐसी बात कहां छुपती है। कोई न कोई बाबू का ‘अज़ीज’ तो रहा है। इसलिए ख़बर अब दूसरे विभागों तक जा पहुंची।
हे जगन्नाथ, बाबू को भी अक्कल नी है। यदि चुपचाप छोटा-मोटा गेम करते रहो तो किसी को दिक्कत नहीं होती। सब चलता है। लेकिन अगर तो ऐसी हरकत कर दो कि शिकायत में अपने बॉस को ही ले डूबने जैसा काम हो जाए। तब तो ऐसे में कौन सहन करेगा।



राष्ट्रीय पर्व पर इस बार खूब ध्यान रखा, कोई कमी नहीं छोड़ी:- इंजिन-गाड़ी वाले विभाग के पिछली बार स्वतंत्रता दिवस पर कुछ असुविधा चर्चा में आई थी। लगता है इस बार अफसरों ने इससे सबक ली है। पिछली बार तो कुर्सियां कम पड़ गई थी। हालांकि इस बार पर्याप्त कुर्सियां लगाई तो है। लेकिन रेल संगठन वाले उस पर बैठने के लिए नहीं आए। इन इंतजामों के बाद भी कोई कह रहा था कि कुर्सियां फिर भी कम थी। बच्चे तक खड़े-खड़े आजादी के उत्सव का आनंद लेने को मजबूर हुए।
खेर, जिसकी ड्यूटी थी, उन अफ़सर ने इंतजामों में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। वे इतने ‘अमीर’ भी नहीं है कि जेब से खर्च कर इंतजाम करवाए। जितना फंड मंजूर हुआ, उतना ही काम होगा न…।
आजादी के उत्सव की तैयारियों के लिए बेचारे ये साहब एक सप्ताह से डायरी व पेन लेकर बड़े साहब के पीछे-पीछे घूमते रहे। कब क्या करना और कैसा करना…पूरी प्लानिंग तैयार की। लेकिन मानना पड़ेगा, इस बार दूसरे इंतज़ामों की कोई कमी नहीं दिखाई दी। चौथी श्रेणी के सफेद कपड़े पहनने वाले कर्मचारियों को भी अवॉर्ड हाथ लगे। संचालन भी दो संचालकों से करवाया गया। ताकि एक थक जाए तो दूसरा टेका लगा दें। इतना ही नहीं राष्ट्रीय गीत व राष्ट्रगान भी दो-दो बार करवाए गए। देश के सम्मान में कोई कोताही नही बरती गई।
हे प्रभु, ऐसी बेहतरीन व्यवस्था से बेचारे भोले-भाले बड़े साहब खुश हो गए होंगे। क्योंकि वे इतने सीधे है कि इनके अंडर वाले साहब लोग कई बातों की इन्हें झड़ी तक नही लगने देते। बालो-बाल खुद ही निपटा देते है। कुछ बचता भी है तो दूसरे नंबर वाले साहब सुलटा लेते है। कुछ मामले भले ही इन्हें मालूम पड़ जाती है। तब कभी-कभार रौद्र रूप दिखाते है। जबकि पहले वाले एक बड़े साहब तो किसी की भी नहीं सुनते थे। टेडी-मेढे चले तो यह ‘सुनकर’ किसी का भी ‘रूप नारायण’ जैसा कर देते थे।



नहीं छूटा केबिन का शौक, क्या कर लेंगे विजिलेंस वाले:- कहते है कि सैया भये कोतवाल तो डर काहे का…। इंजिन वाले ऑफिस की ही बात कह रहे है हम। दूसरी मंजिल पर बाबा जगन्नाथ के चहेते एक शिष्य (कर्मचारी) पर विजिलेंस केस हुआ था। इसमें एक मुंबई तबादला होकर गए साहब निपट गए। लेकिन उसी केस में यहां शिष्य पर भगवान सोमनाथ की खूब दया वर्षा हो रही है। इन्हें बैठने को उल्टा केबिन दे दिया। बीच में खाली कराने का मामला उठा था। लेकिन कहते है न कि जब तक साहब की मेहरबानी रहें।तो फिर कौन किसका क्या बिगाड़ सकता है।
हे प्रभु, समझ में यह नहीं आ रहा कि समान केस में एक कल्याण बाबू को तो लूप लाइन कर दिया। इंदौर वाले कल्याण बाबू को सफाई में कमी दिखाते हुए 10 माह से टांग रखा है। इनके ‘आलम’ कैसे चल रहे, कोई पूछने वाला नहीं।
हे प्रभु कहते है कि बाबा सोमनाथ बड़े दयालु रहते है। किसी को बेवजह दंडित नहीं करते। लेकिन हरिकृष्ण भजन भजने वाले पर मेहरबानी और दूसरों को रौद्र रूप दिखाना समझ से परे है।


आदमी के लिए जहर, कुत्तों के लिए सब्जी:-इन दिनों रेलवे स्टेशन की व्यवस्थाओं के अजीब नज़ारे देखने को मिल रहे है। कुछ दिन पहले प्लेटफॉर्म नंबर पांच पर बैठने की चेयर के नीचे वेंडरों ने बर्तन में खुले रूप से आलू की सब्जी रखी थी। ठीक पास में कुत्तों की आराम फरमा।रहे थे। इसका वायरल वीडियो देखने को मिला। यह यात्रियों की सेहत से खिलवाड़ नहीं, तो फिर क्या है। क्या गारंटी है कि कुत्तों से सब्जी चखी नहीं होगी। कुत्तों के लिए लज़ीज़ खाना तथा कर्मचारियों के लिए ज़हर के इंतजाम हो रहे है। तीन दिन पहले एक कर्मचारी ने ड्यूटी के वक्त ही जहर घटक लिया था। ताबड़तौब इसे अस्पताल ले गए। कोई कह रहा कि ड्यूटी का तनाव था तो किसी ने कहां कि ऐसी नाटकबाजी आए दिन की बात है।
खेर, अपने क्या। लेकिन हां, प्लेटफॉर्म नंबर 5 पर खाने पीने के आइटम बेचने वालों की भरमार हो गई है। ऐसा लग रहा है कि सिंहस्थ का मेला स्टेशन पर ही लग गया है।
हे प्रभु, सरकार ने स्टेशन पर खानपान सामग्री की क्वालिटी जांचने के लिए कर्मचारी नियुक्त किए है। अवैध सामग्री बेचने वालों पर लगाम कसने के लिए पूरा विभाग बैठा है। फिर भी किसी को यात्रियों की फिकर नहीं है।
