एक संगठन के कार्यालय उद्घाटन में यादगार रहा दो भोले का मिलन…, चेंबर में दुकान, इकट्ठा हो रहे हर कंपनी के मोबाइल…, कर्मचारी माथा पीटते रह गए और ताबड़तोड़ ट्रेनिंग के इंतज़ाम…, कंट्रोल ऑफिस में राधे-राधे का सिक्का, केबिन पर हाथ मारा…
जलज शर्मा, न्यूज़ जंक्शन-18
रतलाम। भगवान भोलेनाथ इसलिए भोले कहलाते रहे है कि वे सभी की मनोकामना पूरी करते आए। लेकिन भगवान अनिष्ट से बचाने के लिए समय पर तांडव दिखाकर नटराज का रूप भी धरते रहे है। लेकिन ऑल इंडिया एसोसिएशन के कार्यालय के उद्घाटन में मानवीय दो भोले का मिलन भी यादगार रहा। एक भोले ने कांधे पर हाथ रखकर खूब गुफ्तगू की तो दूसरे भोले गदगद हो गए। उनके चेहरे पर एक घंटे तक खुशी ही खुशी दिखाई देती रही।
दरअसल ज्योतिबा फुले जयंती पर रेलवे वालों की कॉलोनी में विशेष आमंत्रित हुए चुलबुल पांडे, अक्षय कुमार जैसे फ़िल्मी पात्र फुले नहीं समा रहे थे। केवल नेचर के गरीब व दिल के अमीर साहब बेहद ही सहज रहे। ये ‘ओबीसी’ कार्यालय के हाल में बैठे-बैठे वहां लगे ‘एबीसी’ मटेरियल को निहारते रहे। इस बीच अफसरों में भोले की छवि वाले बड़े साहब और दूसरे हंसी की गोली बांटने वाले रेल नेता भोले आपस में मिले तो सभी निगाहें उन पर ही ठहर गई। लोग इस चर्चा के कयास लगा रहे थे कि दोनों भोले आख़िर आपस के क्या बतिया रहे होंगे? क्या यह कह रहे होंगे कि मुझे जैसे-तैसे 2 साल पूरे करने है। वहीं संगठन के भोले उन्हें बता रहे होंगे कि साहब मैं तो चेयरमैन की चेयर पर बैठने के बाद ही हार्डवेयर की दुकान पर जाकर 10 लीटर फेविकोल की पूरी बाल्टी बाजार से लेकर आ गया था। अब तो चेयर अच्छे से जम गई है। साहब- तेरी-मेरी में क्या रखा है। हंसते-हंसते ही समय निकाल जाएगा।
हे प्रभु, ये तो जगन्नाथ वाली बात हुई।फिर भी बड़े साहब ने छोटे-छोटे अफ़सर को समय-समय पर तांडव दिखाना पड़ेगा। वरना जाने कहा छोड़कर आ जाएंगे। हालांकि साहब ने तांडव दिखाया तो है। लेकिन इसकी चपेट में छोटे कर्मचारी आ गए। जिनका अब ‘आलम’ यह है कि उनकी फ़िखर करने वाला कोई नहीं है।

ऐसा भी होता है, जब बागड़ ही चरने लगती है खेत:- सरकारी नौकरी के दौरान हितों और उत्थान के लिए बने संगठनों को डरे-सहमे कर्मचारी सालाना चंदा केवल इसलिए देते है कि उनका दिया पैसा उनके लिए आवाज़ उठाने में आने वाले खर्च के उपयोग में आ सके। लेकिन रतलाम से रेल मार्ग की 650 किमी दूरी पर स्थित मुंबई में संगठन के एक बड़े ऑफिस में करीब डेढ़ करोड़ रुपए के घपले ने सभी को चिंता में डाल दिया। दरअसल हमारे रतलाम में विभागों से जुड़े कर्मचारियों के जितने भी संगठन है। उनके नेताओं की छबि बेहद ही ईमानदारी की रही है। जितने रुपए का खर्च आता है। केवल उतने ही खर्च का बिल बनवाते है। इसका हिसाब-किताब तैयार कर बेलेंस शीट बड़े ऑफिसों में भेजते है। चाहे वह आंदोलनों या अन्य आयोजनों में लगने वाले टेंट का हों या फिर चाय, नाश्ता का रहा हो। खाने-पीने का हो या स्वागत के हार-फूल की खरीदी के खर्च का हो…। जितने का बिल बनता है। इसमें एक रुपया भी ज्यादा या बढ़ाकर बिल नहीं बनवाते है। इनकी ईमानदारी के भी खूब चर्चे है। लेकिन बड़ी शाखाओं या मुख्यालयों में जमा करोड़ों रुपए खर्च का हिसाब-किताब भला कौन पूछे। और आखिर ऐसी किसकी हिम्मत है। इसलिए करीब डेढ़ करोड़ रुपए के घपले की बातें चलकर सुर्खियों में आई। तब मामला दबाने के लिए खूब प्रयास कर लिए गए। अब चाहें कर्मचारी हो या मजदूर बोले भले ही नहीं…। लेकिन इसकी कानाफूसी तो अभी भी रही है। अब भला बोलने वाले को कौन रोक सकता है।
हे प्रभु, जगन्नाथम संगठन हो या कोई एसोसिएशन…। लीडर लोग रुपया कैसे खर्च करते है। किस-मद में यह उड़ाया जाता है। मजदूर, कर्मचारी सब जानते है। मगर बोले कौन। किसी को पद बचाना है तो किसी को अपनी नौकरी।

चेंबर में मोबाइल दुकान, दिनभर में इकट्ठा हो जाते है हर कंपनी के मोबाइल:- रतलाम शहर के दो बत्ती पर इंजिन वाले ऑफिस की दूसरी मंजिल पर ऐतिहासिक नज़ारा देखने को मिल रहा है। एक अफसर के चेंबर में इन दिनों हर कंपनी के मोबाइल जमा किए जा रहे है। जैसे मोबाइल सुधारने की दुकान हो। इतने मोबाइल तो मैकेनिक के पास भी इकट्ठा नहीं होते होंगे। हालांकि नए साहब ईमानदारी की मिसाल व अनैतिकता के घोर विरोधी है। इनके इस अभियान को वे पूरी कार्मिकता से अंजाम देने में जुटे हुए है। कही कोई बातचीत में उनका वीडियो न बना लें। इसलिए जो भी कर्मचारी, संगठन का नेता या रिटायर्ड उनसे मिलने आता है। उनके मोबाइल चेंबर के बाहर ही रखवाने की नई व्यवस्था शुरू कर दी है। इसके लिए बाकायदा बाहर नियुक्त कर्मचारी द्वारा मुनादी करवाई जाती है। हालात यह है कि लंच से पहले और बाद में मोबाइल के ढेर लगने लगे। जब साहब से मिलकर लोग चेंबर के बाहर निकलते है तो उन्हें अपने मोबाइल खोजने की मशक्कत करना पड़ती है।
हालांकि किसी ने साहब को सलाह दी है कि मोबाईल काउंटर तैयार करने का प्लान भूलकर भी मत तैयार करवा लेना। वरना इसका ठेका भी रतलाम का कोई ठेकेदार सांठगांठ कर लपक लेंगा। जितनी कीमत के मोबाइल नहीं है। उससे ज्यादा इनको अवेरने में रेलवे को खर्च करना पड़ेंगा। खेर, साहब की ईमानदारी के जगन्नाथ भी कायल है। सुनने में आ रहा कि अनियमितता का अ-विनाश करने वे एक बार फिर से नीचे की ब्रांचों के मस्टर उठाकर लाने की तैयारी में हैं।

कर्मचारी माथा पीटते रह गए और ताबड़तोड़ ट्रेनिंग के इंतज़ाम करवा दिए:- पिछले दिनों पदोन्नति के लिए इंजिन में बगल की सीट पर बैठने वाले लोको पायलट की जारी लिस्ट को लेकर बवाल मच गया। इसकी भनक लगते ही अफसरों ने 150 किमी प्रतिघंटे की स्पीड से अगली प्रकिया जारी कर दी। बेचारे विभाग की परीक्षा में असफल कर्मचारी सिस्टम की गलतियों को मीडिया रिपोर्ट तक ले गए। आरोप में कहा गया कि साइको टेस्ट की सूची जारी नहीं की गई। किसको कितने अंक मिले है, यह भी गोपनीय रखा गया। कर्मचारियों के बीच-बचाव के नेता नगरी भी रफूचक्कर हो गई। आगे और बवाल मचता उससे पहले अफसरों ने चयनितों की ट्रेनिंग की जुगाड़ जमाकर तारीख तय कर ली।
हे प्रभु, यदि ऐसी अनियमितता हुई भी है तो जगन्नाथ ऐसी अनदेखी को उज़ागर करते रहेंगे। सुनने में आ रहा है कि कर्मचारी नेता ने कुछ अभ्यर्थियों से परीक्षा से पहले हाथ मिलाकर धूल में लट्ठ चलाया है। कुछ काम भी हुआ है।

कंट्रोल ऑफिस में राधे-राधे का दोबारा चला सिक्का, केबिन पर हाथ मारा:- ट्रेनों को ऑपरेट करने वाले विभाग में चलते-फिरते राधे-राधे की टोन वाले कर्मचारी के कंट्रोल ऑफिस में जलवे फिर से चर्चा में है। पिछले अफसरों ने इनकी सेवाएं स्वीकार कर कंट्रोल में बैठने के लिए केबिन दे दिया था। मीडिया की सुर्खियां बटोरने का बाद परेशान अधिकारी ने केबिन से निकालकर दूसरे नंबर के अफ़सर के केबिन में ही इनकी कुर्सी लगवा दी थी। अब एक साल के बाद सिर पर चंदन और मुंह में राधे का जाप जपना अभी साहब को पसंद आ गया। बताया जा रहा कि इनके लिए ऑपरेटिंग का मुख्य काम करने वाले कर्मचारियों को केबिन से निकालने की प्लानिंग की गई।। आखिर राधे-राधे नाम जपने वाले इन छद्म साहब ने दोबारा केबिन में अपनी ताजपोशी करने की जुगाड़ जमा ही ली है।
हे प्रभु, खाड़ी युद्ध मे भले ही कच्चे तेल की शॉर्टेज आ गई थी। लेकिन दो बत्ती वाले ऑफिस में लगता है ड्रमों से तेल आता रहा है। क्योंकि यहां केवल तेल की जरूरत थी, मालिश वालों की नहीं…।
