जलज शर्मा, न्यूज जंक्शन-18
हर रेलवे कर्मचारियों को लोन देकर कर्जदार बनाने वाली देसी (जेसी) बैंक के चुनाव का शंखनाद हो गया है। इसके बाद उम्मीदवारी के लिए दावेदार अपने-अपने दावे पेश करने के लिए नायाब तरीका अपना रहे है। अब हाल ही में एक संगठन के कार्यालय में एक साथ 15 कर्मचारियों को हार पहना दिए गए। हालांकि मंत्रीजी ने तो एक दावेदार को कहा था कि दो नए कर्मचारी संगठन में आ रहे है। उनके लिए दो बत्ती से दो हार तथा दो स्कार्फ ले आना। लेकिन उम्मीदवारी के लिए मुंह धोकर बैठे एक दावेदार ने जुगाड़ लगाई। वह दो के बजाय 15 हार व स्कार्फ ले आया। जब समारोह में दो नए कर्मचारियों के अलावा बाकी 13 कर्मचारियों को भी हार पहनाए। तब ये कर्मचारी बोले कि मंत्री
जी हम तो पहले से ही आपके संगठन में शामिल है। कुछ नए पकड़कर लाते तो उसका प्रमाण भी रहता। जैसे ही इन बाकी के 13 कर्मचारियों को हार पहनाए गए। वहां बैठे संगठन के ही कर्मचारियों में फौरन ही कानाफूसी शुरू हो गई। हालांकि सम्मान कराने वाले 13 कर्मचारियों ने भी चुटकी ले ली कि चुनावी मौसम के बहाने हमारा सम्मान तो हो गया। वरना मुंबई से बड़े पदाधिकारी आते है तो उनके कक्ष में घुसने भी नहीं दिया जाता है।
शरीफ उम्मीदवार शराफत के भरोसे, नैया डूबना तय है:- विजिलेंस से लौटकर अपने मूल विभाग के काम में जुटे एक रेलवे कर्मचारी को पता नहीं कहां से खबर मिल गई कि उसे लाल झंडे वाला संगठन कर्ज देने वाली बैंक के डायरेक्टर का चुनाव लड़ाना चाहती है। बस, फिर क्या था। एक माह में अपनी भावनाएं ‘अर्पित’ कर इन्होंने लोगों से मेलजोल शुरू कर दिया। इन्होंने सोचा कि हींग लगेगी, न फिटकरी और संगठन के नाम पर रंग भी चौखा हो जाएगा।
मगर, इनके मन को ठेस तब पहुंची, जब वेलफेयर वालों ने भगवान सोमनाथ का नाम लेकर दो दिन पहले मतदाता सूची चस्पा कर दी गई। इस सूची में विजिलेंस का तमगा लेकर घूमने वाले उसी कर्मचारी का नाम हीं नहीं है, जो चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटा था। अब बेचारे ये प्रशासन को अपनी आपत्ति दर्ज करवाने का मन बना चुके है।
बगैर बजट के चुनाव मैदान में भाई साहब:- देश में ऐसा कोई चुनाव नहीं है ,जिसमें उम्मीदवार को खर्च के लिए बजट निर्धारित न करना पड़े। बल्कि जो दर्शाया जाता है, उससे कही गुना अधिक खर्च होता है। स्वाभाविक है कि रेलवे की बैंक डायरेक्टर का चुनाव छोटा है। फिर भी यदि चुनाव लड़ना है तो जेब ढीली तो करना ही पड़ेगी। लेकिन कई ऐसे भाई साहब अपनी दावेदारी जता रहे, जो अपने पर्स को हमेशा फेविकोल से चिपकाकर बंद रखते है। पिछले इंस्टिट्यूट चुनावों में कुछ उम्मीदवारों ने अपनी जेब में नागिन के बच्चे बिठा रखे थे। डर के मारे स्वयं भी जेब में हाथ नहीं डाल पा रहे थे। अंततः इनसे जीत कोसो दूर चली गई।
ऐसे मामलों में बाबा जूलियस कहा करते है कि ‘जो दिखेगा, वो बिकेगा और जो बिकेगा, वो ही दिखेगा। वरना ‘ …का दंड फकीर’ को वाली कहावत चरितार्थ हो जाएगी। ऐसे उम्मीदवार अपनी गलती की वजह से अपने मंत्रियों की नाक नीची कर बैठेंगे।
अभी तो लॉलीपॉप वाली उम्मीदें:- पीछले एक माह से डायरेक्टर पद के लिए चुनाव लड़ने की मंशा रखने वाले दावेदार अपने संगठन के मंत्रीजी को छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहे है। संगठन के कार्यालयों में जो कभी शाम को फटकते भी नहीं थे। वे रात 8 बजे तक डटे रहते है। मंत्रीजी भी इन्हें जमकर पुड़िया बांट रहे है। एक संगठन के मंत्री दावेदारों को कह रहे है कि ‘अपने क्या काम’ मैं तो महामंत्री को नाम पहुंचा दूंगा। जो करेंगे, वे ही आखरी फैसला करेंगे। दूसरे संगठन के मंत्रीजी दबे स्वर में तीन से चार दावेदारों के कान फूंक चुके है कि अपनी तैयारी रखो। झांसे में आकर बेचारे ये दावेदार मंत्रीजो को छोड़ ही नहीं पा रहे है। मंत्रीजी को कही जाना हो तो चारों दावेदार अपनी-अपनी बाइक लेकर इस उम्मीद में तैयार खड़े रहते है कि मेरी गाड़ी में बैठेंगे तो मेरी जुगाड़ लग जाएंगी।
अब इन हालातों में कानाफूसी यह हो रही हैं कि दोनों संगठनों में कहीं हर बार की तरह न हो जाए। तीसरे विकल्प का चयन कर किसी और को टिकिट दे न दें। ऐसा हुआ तो बाइक वाले बेचारे दावेदार अपना लिटरों पेट्रोल फूंककर छानेमाने बैठ जाएंगे।
