चाह यहीं है कि मैं ही चुनाव लड़ जाऊ, गाँधीजी की पुकार व सीआरबी की फटकार भूले जिम्मेदार, काली डेम की काली प्लानिंग फेल, ठाकुर की जगह नई सरकार का अभिषेक
जलज शर्मा,
रतलाम। रेलवे के कामगारों को कर्जदार बनाने वाली देसी (जेसी) बैंक में डायरेक्टर के चुनाव का बुखार फ़िलहाल उम्मीदवारों की दावेदारी को लेकर चढ़ने लगा है। संगठनों के नेता अपनी लीडरशिप निखारने के लिए हर हाल एड़ी-चोटी का जोर लगाने को आमादा है। टिकिट दिलाने की बिचवाली करने वाले एक संगठन के मंत्री जी चुनाव मैदान में उतरने के इच्छुक लीडर्स को केवल इतना ही कह रहे कि ‘जो करेंगे, महामंत्री जी ही करेंगे… और जो भी महामंत्री कहेंगे, वो ही मैं करूंगा’।

वहीं दूसरे संगठन के मंत्री जी का सभी भावी डायरेक्टर्स को आश्वासन है कि तैयारी करो। कुछ को तो वोटर लिस्ट भी थमा दी कि अपने वोटर्स का गणित जमाओं। लेकिन डायरेक्टर्स की चाह वालों को कहीं से यह झड़ी लग गई कि मंत्री जी खुद भी उम्मीदवारी की होड़ में दौड़ लगाने को तैयार बैठे है। तांकि एक पद और भी हाथ लग जाए और खींचतान को भी विराम मिले।
ये तो बात राजनीति की रही। बावजूद मंत्री जी कवि माखनलाल चतुर्वेदी की कविता पुष्प की ‘अभिलाषा’ कविता को आदर्श पंक्ति मान रहे है। ‘चाह नहीं मैं सुर बाला के गहनों में गूँधा जाऊं.. . चाह नहीं प्रेमी माला में बंध प्यारी को ललचाऊं’..।।
हे प्रभु जगन्नाथम मंत्री जी की अंतरात्मा की अब पहली आवाज़ है कि चाह यहीं है कि मैं ही चुनाव लड़ जाऊ, चाह यह भी है कि मैं ही डायरेक्टर बन जाऊं….।
गाँधीजी की पुकार व सीआरबी की फटकार भूले जिम्मेदार
इन दिनों रेलवे एरिया में साफ- सफाई को लेकर दो महत्वपूर्ण अवसरों के बाद जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी से दूर हो चले है। 2 अक्टूबर गांधी जयंती के 2 दिन पहले तक सफाई का खूब ढिंथोरा पीटा गया। इससे पहले सीआरबी की फ़टकार का भी कुछ दिनों असर रहा। अब ‘ढाक के तीन पात’ वाली कहावत चरितार्थ होने लगी है।

स्टेशन पर डस्टबिन से कचरा यात्रियों को बार-बार झांकता दिखाई दे रहा है। वहीं गंदगी से भरे बड़े-बड़े पॉलीथिन बैग जहां-तहां रखकर ठेकेदार आँखों में धूल झोंक रहे है। हालांकि रेलवे स्टेशन पर माह के इसी पखवाड़े में बड़े आयोजन की तैयारियां की जा रही है। कहने को अधिकारी सरकारी कारों से सवार होकर स्टेशन के खूब दौरे कर रहे है। लेकिन उन्हें सीआरबी की फ़टकार व गंदगी के दबे छिपे कचरे के ढेर नहीं दिखाई दे रहे है।
हे प्रभु जगन्नाथम, चाहे कुछ भी कर लों, गांधी जी के स्वच्छ भारत के सपना हो या सीआरबी की फ़टकार। ये रतलाम है जनाब। यहां ऑफिसर की नहीं, बल्कि ठेकेदार की चलती है। वैसे भी अभी दीपावली गई है। ठेकेदारों के दिए गिफ्ट खुले भी नहीं होंगे। मजबूरी है, ठेकेदार को चमका-धमका भी सकते है।
गोवा के गुबार चक्कर में काली डेम की काली प्लानिंग फेल
पिछले माह रेलवे एसबीएफ के तहत गोवा टूर की करतूतें उजागर क्या हुई, काली डेम की प्लानिंग भी खटाई में पड़ गई है। पिछले महीने की 31 अक्टूबर को एसबीएफ की मीटिंग में भले ही सभी सदस्य मुंह पर उंगली दबाकर मन ही मन भगवान सोमनाथ का नाम जपते रहे। लेकिन सदस्यों ने इंचार्ज ब्लेक प्लानिंग को जरूर सिरे से खारिज करवा दिया।

दरअसल एसबीएफ में महिला कर्मचारी के कौशल गतिविधियों के लिए जमा 2 लाख रुपए को ठिकाने लगाने की पूरी तैयारी कर ली गई थी। प्लानिंग थी कि दाहोद के पास कालीडेम का महिला टूर निकालकर बेहतरीन खर्च को पॉकेट में समायोजित कर लिया जाए।
विरोध के चलते अंततः इस योजना को अमलीजामा पहनाने में कामयाबी नहीं मिल सकी। इतना ही नहीं, समिति सदस्यों ने मांग कर डाली कि उज्जैन हॉलीडे होम के खर्च रजिस्टर को अवंतिका नगरी से रत्नपुरी लाया जाए। तांकि सामग्री खरीदी का रिकॉर्ड भगवान सोमनाथ के शरण में रखा जा सके।
हे प्रभु जगन्नाथम, रेल यात्रियों से मिल रही आय की कमाई को चपत लगाने के कितने भ्रष्ट तरीके अपनाए जा रहे है। इसका नज़ारा केवल यहां आकर देखा जा सकता है।
ठाकुर की जगह नई सरकार का अभिषेक
रेलवे के ऑपरेटिंग विभाग में ठाकुर सरकार जाने के बाद कुर्सी पर नए अफ़सर का अभिषेक हो गया हैं। कुर्सी बदलते व नए साहब के आते ही विभाग के कर्मचारी व अधीनस्थ कर्मचारी सेल्यूट करने पहुंचे। यह एक स्वाभाविक प्रकिया भी है। इसलिए शेरा भी अपने अंदाज के सलामी ठोकने गया।

हालांकि सभी कर्मचारी बारी-बारी से चेम्बर के बाहर आते गए। लेकिन शेरा भाई अपने नए सलमान को कहां छोड़ने वाला था। उसी दिन से हाजरी व घेराबंदी शुरू हो गई। आखिर इस अधिकारी की क्या बिसात कि शेरा के सिक्योरिटी चंगुल से बच पाए।
हे प्रभु, अंग्रेज भले ही चले गए, लेकिन सिपेसलार यहां छोड़ गए। इनकी स्वामिभक्ति को नमन है। जय श्री कृष्ण, राधे-राधे…।
हे प्रभु जगन्नाथम, ये सब क्या हो गया है।
