ये मेरा शहर है, इसे गंदा नहीं होने दूंगा, लोग बाइक स्टंटबाजों के लिए सीसीटीवी खंगालें?, रेलवे में नए साहब के एक्शन का इंतजार है, गोवा के बाद अब ओखा का कमाई टूर, बाद में एन्जॉय
इन दिनों शहर के पहले नागरिक ने सफाई इंतजामों को लेकर रुद्र से रौद्र रूप धारण कर लिया है। ये दिनभर गली-मोहल्लों में कचरें-कूटों की खोज करने में जुटे हैं। जहां भी कचरा दिखाई दे रहा, वे इसे फैलाने वाले को छोड़ नहीं रहे। बल्कि पीछे पड़कर, हाथ से छिनकर, इसे सोरकर खुद ही कचरा गाड़ी में डाल रहे है। इतना ही नहीं रहवासी या दुकानदार को डाट डपटकर नसीहत भी दे रहे हैं। हां, जहां भी वे कचरा उठा रहे हैं, उसके वे अपने काँधेदारों से वीडियो जरूर बनवा रहे हैं। तांकि खूद का प्रचार हो सके और लोगों को इसकी जागरुकता का संदेश भी दिया जा सके। ये तो रही स्वच्छ भारत अभियान की अनुकरणीय बात। अब मेला आयोजन के टेंडर सहित लोगों के कामों के एवज में भ्रष्टाचार की गंदगी भी खूब फैली है। इसकी सफाई को लेकर उनकी बेरुखी भी समझ से परे हैं। कांच की तरह शहर को चमकाने के जुनून के बावजूद कॉलोनियों में कचरे से भरे खाली प्लॉट, कच्ची नालियों से बहती गंदगी, जाम हो रहे ड्रेनेज से उठती बदबू व शहर सीमा में बन रहे अघोषित डंपिंग यार्ड सफाई व्यवस्था का मख़ौल उड़ाते दिखाई दे रहे हैं। इस ओर भी ध्यान जरुरी है।
वही करोड़ों रुपए खर्च से उन्नत इंतजामों वाले रेलवे स्टेशन के हाल भी खूब बेहाल है। दोनों ओर के सर्कुलेडिंग एरिया किसी गाँव जैसे उखेड़े में तब्दील हो गए है। ट्रैक पर कचरा फैला है, प्लेटफॉर्म पर रखे डस्टबीन गले-गले तक भरे है। यहां पर सफाई व्यवस्था को देखने वाला कोई जिम्मेदार नहीं है।
हे प्रभु, शहर के प्रथम नागरिक कह रहे हैं कि ये मेरा शहर है। इसे गंदा नहीं होने दूंगा। खूद कचरा उठाऊंगा। लेकिन रेलवे अधिकारी कह रहे हैं हमें स्टेशन से क्या अड़ी-पड़ी है। दो साल की हुकूमियत, मौज मस्ती बस…। बाद में हम तो चले परदेस…रफुचक्कर हो जाएंगे।
हुल्लड़बाजों के वीडियो से जांगी नींद, अब लोग बाइक स्टंटबाजों के लिए सीसीटीवी खंगालें
शादी में शरीक होने आए इंदौरी हूल्लड़बाजों की राहगिरों द्वारा बनाए वीडियो से पुलिस ने धरपकड़ कर बड़ा काम कर दिखाया। क्योंकि वायरल वीडियों के बाद वाहनों की जब्ती के अलावा इन पर जुर्माना कार्रवाई भी की गई।
इन हुल्लड़बाजो की तरह ही सुबह-शाम शहर की सड़कों पर तेज रफ्तार से कानफोड़ू हॉर्न बजाकर गुजरते बाइक सवार स्टंटबाज से भी लोग परेशान है। शायद खांकी या सफेद-नीली वर्दी वालों को ये बेकाबू बाइक सवार दिखाई नहीं देते होंगे। क्योंकि इन पर प्रभावी कार्रवाई आज तक नही हुई है।
चौराहों पर खड़े यातायात अमले या अफसर की निगाहें केवल तीन सवारी बाइक या मटर, लहसून या टमाटर लदे वाहनों की खोजबीन में लगी रहती है। इनके सामने से दनदनाती फटाका साइलंसर वाली बुलेट या तेज रफ्तार व तेज हॉर्न बजाती स्पोर्ट्स बाइक गुजर जाए तो भी इनकी धरपकड़ नहीं।
हे जगन्नाथ, कार वाले इंदौरी हूल्लड़बाजों की धरपकड़ के लिए लोगों ने वीडियो बना लिए। समझ नहीं आ रहा कि अब स्टंटबाजों के लिए भी लोग सार्वजनिक सीसीटीवी कैंमरों के क्लिप निकलवाए। इसके बाद ही कार्रवाई हो सकेगी।
दोहरे आयोजन से स्थापना दिवस समारोह खेमों में बंटा
राजनीतिक गुटबाजी की तरह ही रतलाम के स्थापना दिवस का समारोह भी अब दोहरे (दो गुटीय) आयोजन को लेकर चर्चा में है। इसे लेकर शहर में गुटबाजी का माहौल है। दोनों गुटों ने अपने फ्लेक्स और बैनर लगाकर अपने-अपने आयोजन में लोगों के शारीक होने की जैसे मुनादी करवा दी है। बड़ी बात यह है कि इस आयोजन के मुख्य संस्थापक छोटी-मोटी राजनीति से व्यवसाय के मुकाम तक पहुंचे। जबकि दूसरा गुट प्रदेश की पूर्व सरकार के मंत्री से जुड़ा हुआ है। चर्चा इसलिए भी है कि वर्तमान मंत्री के समतुल्य आभामंडल वाले पूर्व मंत्री राजनीतिक में कभी अत्यल्प (अदना) रहने वाले से बराबरी की होड़ में उतरे है।
रेलवे में नए साहब के एक्शन का इंतजार है
रतलाम रेल मंडल के मुख्यालय में तबादला होकर आए नए लीडर (बड़े साहब) के एक्शन मोड में आने का सभी को बेसब्री से इंतजार है। पूर्व के मंडल मुखिया की मुहचड़ी सूरत से सभी वाकिफ थे। कर्मचारी सहमे-सहमे रहते थे। वही बैठक कक्ष से तमाम अधिकारी भी सिर पकड़कर बाहर निकलते दिखाई देते थे। खेर…।
अब सभी नए मंडल मुखिया की ओर टकटकी लगाए हुए है। कर्मचारी कानाफूसी कर रहे कि तबादला होकर आए नए साहब को अपने अधीनस्थों व सिपेसालारों से सेल्यूट देखने का नया अनुभव है। इसलिए वे सहमें, हंसते, दौड़ते, मुस्कराते छोटे-बड़ों से हाथ मिला लेते हैं। एक माह बाद अब इनके हाथ के इशारों से हूक्म देने का लोग इंतजार कर रहे है।
कयास यह भी लगाया जा रहा कि जल्दी ही दिल्ली व मुंबई के बड़े अफसरों के कड़े आदेश आना शुरू होंगे। इसके बाद नए साहब का यहां भी लहजा कड़क होना तय है।
नए साहब से हटकर अब रेलवे कर्मचारियों के नेताओं की बात कर ली जाए। लाल सलाम वाले एक संगठन में नियुक्त किए नए छोटे लीडर भी ह्रदय से एक्शन में नहीं है। अभी वे बड़े लीडर के पीछे-पीछे कदमताल सीखकर मंडल कार्यालय के गलियारों में घूम रहे है। हालांकि पहले महू रोड कॉलोनी निवासी पूर्व के लीडर मिलनसार माने जाते थे। कभी अफसरों के बीच मुंह ‘भूरा’ तो कभी नीला व लाल हो जाता था। ये अपनी फ़ौज के साथ चलते तो आगे से आदेश आता था- ‘आधे इधर जाओ, आधे उधर जाओ, बाकी सब मेरे पीछे आओ’…। ऐसे आदेश लाल सलाम वाले संगठन के बड़े लीडर को लगता सुहाया नहीं और हो गया खेला….।
हे प्रभु ये तो मुंबई व रतलाम वाले इनके बड़े लीडर ही जाने की खेला क्या हुआ है।
गोवा के बाद अब ओखा का कमाई टूर, बाद में एन्जॉय
रेलवे में निहायती अनुपयोगी माने जाने वाले सिविल डिफेंस जैसी संस्था में इस साल भी कमाई के साथ ही एन्जॉय के टूर निकले जाने की तैयारी है। इसमे कमाई केवल लीडर की और एन्जॉय सभी का होगा, वह भी खुद की जेब से। जानकारी मिली कि गोवा के बाद अब 8 फरवरी को ओखा का टूर निकाला जाएगा। साढ़े तीन हजार के बाद इस बार ओखा के लिए साढ़े आठ हजार रुपए प्रति सदस्य से खर्च वसूली होगी। अब इसके विरोध के स्वर भी उठने लगे है। सिविल डिफेंस से जुड़े कर्मचारियों का कहना है कि कमाई वाले टूर में वसूली की कोई रसीद (एमआर) नहीं दी जाती है। खर्च का ब्यौरा भी सार्वजनिक नहीं होता है। बचा हुआ पैसा कहां जाता है इसकी किसी को भनक तक नही लगती।
हे प्रभु, डिफेंस के ताला चाबी वाले बाबू के साथी-संगी कुछ और ही बया कर रहे है। खेर, नशीली लाल आंखें व होठों से निकलकर हवा में उड़ते धुएं के छल्ले टूर के कमाई की कहानी बयां करने के लिए काफी है।
हे प्रभु, जगन्नाथम…ये सब क्या हो गया।
