गुरूदेव अंत में नहीं दिला सके स्पेशल लीव, अंतिम स्थल तक नहीं पहुंचे चेले, सोमनाथ अब सोमरस पिलाएंगे?, रेल मदद का पावर सिस्टम, बांट दी रेवड़ी, शेरा अब आया सड़क पर
जलज शर्मा,
गुरुदेव के नाम पर सालों साल स्पेशल लीव के बहाने मौज-मस्ती करने वाले कई चेले उन्हें अंतिम बिदाई देने की बेला को भी भूल बैठे। लगता हैं इन चेले-चपाटों को अंतिम यात्रा में जाने के लिए भी स्पेशल लीव का इंतज़ार था। वरना वह समय ज्यादा पुराना नहीं है, जब यहीं चेले उनकी परछाई तक नहीं लांघते थे। बल्कि जरूरत पड़ने पर गुरूदेव का नाम लेकर या उनकी परछाई के सहारे ही अधिकारियों पर रौब जमाकर चुपचाप अपना काम निकाल लेते थे। ताउम्र लाल सलाम का नारा बुलंद करने वाले गुरुदेव को अंतिम बिदाई देने में जो भी वास्तविक जनसमूह था। उनमें अधिकांश सफेद बाल (रिटायर) वाले ही थे। बल्कि जो काले बाल वाले पहुंचे, वे दूसरे संगठन या दूसरी फील्ड के ज्यादा दिखाई दिए। देखा जाए तो गमभरी सूचना उस दिन शाम तक तो सभी के पास पहुंच गई थी। ऐसे में मंडल के ब्रांच में वे सभी लोग पहुंच सकते थे, जो एक स्पेशल लीव पाने की हरसंभव जुगत लगा लेते है। गुरुदेव के पुण्य प्रताप को देखते अपनी अभिलाषा प्रकट करने तिरंगे झंडे वाले भी उपस्थित हुए। यहां तक कि लाल शर्ट को घर की खूंटी पर टांग चुके एक युवा नेता अपने राजनीतिक गुरू के परिजनों के साथ खड़ा रहे। ये तो एक दिन पहले भी सलामी देने पहुंच गए थे।
हे प्रभु, रेल वाले विभाग में ही ऐसा क्यों हैं कि ‘उगते सूरज को सलाम’, ‘शाम ढली कि बात गली’ जैसी कहावत को इन्होंने सूत्रवाक्य मान लिया। ये गुरुदेव वाले भैया तो क्या अच्छे-अच्छे भैयाओं को रिटायरमेंट के बाद घर छोड़कर आए तो दूसरी बार हालचाल तक नहीं पूछने गए। संगठनों के भी कई ऐसे दिग्गज रहे, जिन्हें नौकरी व पद जाने के बाद भुला दिया गया। कुछ तो ऐसे हैं कि यदि स्पेशल लीव न मिले, इनके अटके काम पूरे न हो या ऑफिस टाइम में संगठन के नाम से मौज-मस्ती का मौका न मिले। तो वे कभी उस संगठन के ‘स’ का भी नाम न लें।
लाड़ दुलार में पलने वालों को सोमनाथ अब सोमरस पिलाएंगे?
दो बत्ती स्थित इंजिन वाले ऑफिस में इन दिनों तबादलों वाले अधिकारियों की आमद के बाद कयासों का सिलसिला शुरू हो गया हैं। कर्मचारी अभी इन्हें समझ ही नहीं पा रहे हैं। दूसरे नंबर वाले नए बड़े साहब को लेकर भी ऐसा ही आंकलन हो रहा है। इनका भी होटल कक्ष सॉरी… चेम्बर तैयार हो रहा है। ऐसे में ये ऑफिस के ही विचार-विमर्श वाले कक्ष में बैठे रहते है। इन्हें भी धीरे-धीरे समझा जा रहा है। हालांकि उनकी बैठने की स्टाइल से लोगों को अपने स्कूल प्रिंसिपल की याद ताज़ा होने लगी। जो चश्मा लगाकर स्कूल चेम्बर में बैठे ही रहते थे।
एक और नए साहब दूसरी वाली मंजिल पर बड़ी मेडम की जगह आए है। उन्हें लेकर यह कयास लगाए जा रहे है कि लाड़-दुलार में पले कुछ चहेते कर्मचारियों को सोमनाथ के बाबा की तरह जरूर सोमरस पिलायेंगे। दरअसल स्थापना शाखा में तो कुछ ऐसे बाबू हैं जो 10 से 15 साल से जमे हुए है। वे अब तक अपनी कुर्सी का कुशन व गादी बदल आए है। लेकिन इन्हें बदलने वाला कोई अधिकारी अभी तक नहीं आया है। जबकि नीति है कि हर 4 से 5 साल में इन्हें कुर्सी से हिलाकर, उठाकर दूसरी कुर्सी पर बिठाया जाए।
हालांकि बाबा सोमनाथ ने हर शाखा की पोस्टिंग रिपोर्ट मंगवाई है। स्थापना शाखा में विशेष रूप से कुछ नाम भी सामने आए है। जो 10 वर्षों से एक ही सेक्शन व एक ही स्थान पर रोकड़ाभिषेक कर अपनी भेंटराशि वसूल रहे हैं। कई तो पल्लवित भी हो चुके है। बाकी तो बाबा सोमनाथ अंतर्यामी है। इन्हें खुद-ब-खुद पता चल जाएगा।
हे प्रभु, पिछले दो से तीन साल तक मज़े में रहने वालों को घबराहट होना लाज़मी भी है। लेकिन अब उन्हें मज़े आएंगे जिन्हें उनकी मर्जी के खिलाफ दूसरी मंजिल से सीढ़ी उतारकर निचले तल वाले पास ऑफिस भेज दिया था। हालांकि पास बनाने वाले कक्ष से शिवजी को पहले ही ऊपर भेज दिया था। अब पूर्व पीड़ित पंडित ‘भार्गव’ सहित ‘बापूगण’ भी सोम दरबार की छत्रछाया में दोबारा ऊपर बुलाए जा सकते है।
रेल मदद का पावर सिस्टम, बांट दी रेवड़ी
रेल इंजिन ऑफिस के ही पावर विभाग वाले इन दिनों खासे पावर में दिखाई दे रहे हैं। तभी तो आरोप लगे कि पिछले दिनों अपने चहेतों को सम्मान व प्रशंसा-पत्र की रेवड़ी बांट दी गई हैं। यह बात रेल मदद पर शिकायतों में पिछले वर्ष अप्रैल से जुलाई की तुलना 85% की कमी को लेकर हो रही हैं। अब भला किसी का मुंह बंद कर सकते है…? आरोप में कहा गया कि जिन्हें ऑफिस में बिठा रखा है। उनकी पीठ थपथपा कर प्रमाण-पत्र दे दिए गए। लेकिन जो बेचारा टेस्टर, पिंचिस लेकर सैनिक की तरह फील्ड या स्टेशन पर दौड़ता रहा। उन पर कर्नल की निगाहें नहीं पड़ी। लिस्ट में उसका नामो-निशान तक नहीं था।
खेर, प्रभु को क्या पड़ी है। टेक्नीशियन को बाबू बनाए या बाबू को सिपेसालर बना दें। वो जाने और उनका काम जाने।
संगठन से निकलकर अब होगा जेक्शन का भूत सवार
कर्ज के शौकीनों के शौक पूरे करने वाली रेलवे की जेसी बैंक में डायरेक्टर पद के चुनाव की जल्दी ही घोषणा होने वाली है। संगठनों के संभावित उम्मीदवारों ने मंडल के अपने-अपने आकाओं की फील्डिंग भरना शुरू कर दी हैं। हालात यह है कि संगठन के ऑफिस से रेल ऑफिस आने की सूचना पर ये टिकिट चाहने वाले अपने आकाओं को घेरे रखते है। लाल सलाम वाले संगठन में तो किसी के इतने हौसलें नहीं कि भौसले को साध सके। लेकिन तिरंगे झंडे वाले संगठन में तो कई युवा अपनी चुनावी अभिलाषा लिए घूम रहे है। इसमें ऐसे लोग भी शामिल है जो चाहते हैं कि जेब की चवन्नी खर्च न हो और अपना चयन हो जाए। हम डायरेक्टर का गौरव हासिल कर लें। इधर, मुख्य डायरेक्टर भी अपने बड़े आकाओं के संपर्क में जुड़ गए है। इस बीच इसी संगठन में एक राठौरी स्टाइल के आईटी एक्सपर्ट युवा पर सभी बड़े पदाधिकारी की निगाहें बनी हुई है।
एसएंडटी का शेरा अब आया अफसर की गाड़ी से सड़क पर
दो बत्ती वाले ऑफिस में शेराओं ने धूम मचा रखी हैं। सिंग्नल व टेलीकॉम (एसएंडटी) वाले शेरा की बात करें तो यह अब अफसर की गाड़ी से बाहर सड़कों पर भी दिखाई देने लगा है। पहले तो इसे अफ़सर के बच्चों को लाने-ले जाने की फुर्सत ही नहीं मिलती थी। दरअसल रेल अफसर अपनी कदकाठी के मुताबिक ही शेराओं के चयन कर इन्हें पालकर अपने इर्द-गिर्द रखते आए है। चाहे यह ऑपरेटिंग, स्थापना, टीआरओ, सिंग्नल या अन्य विभाग का मामला हो। इससे कि बच्चों के स्कूल एडमिशन से लेकर उन्हें लाने-छोड़ने, लोकल दस्तावेज बनवाने से लेकर कभी गेहूं के कट्टे भी उठवाने के काम हो, तो वे आसानी से कर सके। सिंग्नल विभाग वाले ऊंचे-पूरे अफ़सर ने भी यहीं सोचकर अपने कदकाठी वाले शेरा को अपने लिए तैयार किया था। लेकिन समय रहते इनकी पोल भी खुल पड़ी। इधर, ऑपरेटिंग वाले शेरा तो पूरे भक्ति भाव में लीन हो गए है। सिर पर चंदन लेप व मुंह में राधे-राधे जाप। मथुरा, वृंदावन के भक्तों की याद ताज़ा करने लगे है।
है प्रभु ये सब क्या हो गया। कुछ समझ नही आ रहा है।
