-इंजीनियरिंग विभाग में अभी भी नियमों के विपरित चिपके बैठे हैं कुर्सी-नशीं।
न्यूज़ जंक्शन-18
रतलाम। रेलवे डीआरएम ऑफिस में नियुक्त बाबुओं तथा अफसरों के लिए 5 दिन की वर्किंग व्यवस्था है। इसका इलेक्ट्रिक पॉवर विभाग में टेक्नीशियन भी बाबू का भेष धारण कर भरपूर लाभ ले रहे है। बल्कि नियमों की अवहेलना तथा व्यवस्था का मख़ौल भी बखूबी उड़ा रहे है। 6 दिन की ड्यूटी वाले ये टेक्नीशियन ऑफिस में अटैच होकर केवल 5 दिन उपस्थित होकर इसे अपना ड्यूटी अधिकार समझ बैठे है।
वहीं इंजीनियरिंग विभाग में अभी भी कागजी आदेशों की अदला-बदली को पिरियोडिकल तबादला मानकर मलाईदार टेबलों पर कुंडली मारे बैठे कुर्सी-नशीं दिन-रात चांदी काटने में जुटे है। बड़ी बात यह है कि शिखर से लेकर पायदान तक केवल अफसरशाही का ही आलम है। इनकी अनुभवहीनता सवैधानिक शासकीय प्रणाली पर भारी पड़ने लगी है। आउटसोर्सिंग कामों के लचर इंफ्रास्ट्रक्चर व लिफाफा प्रणाली का असर आम लोगों से प्राप्त टैक्स से राजस्व में तब्दील बड़े फंड पर पड़ रहा है।
दरअसल ताजा मामला रतलाम रेल मंडल के इलेक्ट्रिक पावर विभाग से निकलकर आया है। यहां तकनीकी कर्मचारियों की नियुक्ति और कार्य दिवसों को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगने लगे हैं। विभागीय सूत्रों की माने तो कई ऐसे तकनीकी कर्मचारी है, जिन्हें स्टेशनों और ट्रेनों में विद्युत फेलियर जैसी फील्ड ड्यूटी के लिए नियुक्त किया है। जी-हुजूरी के बूते पर वे कार्यालय (मंडल) में जा बैठे है। हालांकि सप्ताह में 6 दिन ड्यूटी का दायित्व है। बावजूद केवल 5 दिन ही कार्य कर रहे हैं। जबकि रेल प्रशासन द्वारा पूरे माह का वेतन दिया जा रहा है।
पूरे माह व साल का शासकीय नुकसान:- यह सबसे गंभीर विषय है कि मंडल कार्यालय में बाबू की शक्ल में तैनात ये टेक्नीशियन सप्ताह में एक दिन की छुट्टी अतिरिक्त ले रहे हैं, जो नियमों के विरुद्ध है। ऐसे में इनकी कार्यक्षमता के रूप में रेलवे को माह तथा साल में खासा नुकसान उठाना पड़ रहा है। रेलवे संसाधनों का दुरुपयोग है, बल्कि इससे विभाग को प्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान भी हो रहा है। इसे लेकर पावर विभाग के मेहनतकश कर्मचारियों के बीच असंतोष और रोष है।
कौन करेगा फील्ड वर्क? :- यह सांठगांठ केवल आर्थिक हानि तक सीमित नहीं है। बल्कि इसका सीधा असर फील्ड कार्यों की गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है। दरअसल तकनीकी कर्मचारियों को ट्रेनों और स्टेशनों पर विद्युत संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए नियुक्त किया है। बल्कि ये ऐसे कर्मचारी है, जिन्हें ट्रेनों में पावर फेलियर सुधारने जैसे कार्यों के लिए प्रशिक्षित भी किया गया है। अब वे दफ्तर में बैठकर गैर-तकनिकी काम कर रहे है। इनके अभाव में फील्ड पर काम के बोझ का दबाव बढ़ने लगा है। फील्ड स्टाफ की कमी के कारण स्टेशनों पर पावर सप्लाई, ट्रेन लाइटिंग सहित अन्य तकनीकी समस्याएं समय पर सुलझ नहीं पा रही हैं। जिससे यात्रियों को असुविधा होने से ट्वीट की संख्या में भी इज़ाफ़ा होने लगा है।
कुछ महिला कर्मचारी पर ही मेहरबानी? :- इस विभाग में महिला कर्मचारियों के चयन में भेदभाव के आरोप लगे है। मंडल कार्यालय में विशेष रूप से कुछ महिला कर्मचारियों को नियुक्त (अटैच) कर लिया गया। जबकि अन्य महिला तकनीकी कर्मचारी फील्ड में कठिन ड्यूटी कर रही हैं। फ़ील्ड ड्यूटी कर रही कुछ महिलाओं ने दबी आवाज में तीखे स्वर निकालने शुरू कर दिए हैं। आरोप है कि अफसर खास महिलाओं को ही मंडल कार्यालय में बैठाकर अनुग्रहित करने में दिन-रात जुटे है।
इन्हें हटाने की अफ़सर को फुर्सत नही :- इसी तरह इंजीनियरिंग विभाग में सेंसेटिव पोस्ट पर केवल कागजी तबादलें दर्शाकर कर्मचारियों को एक ही टेबल पर बिठा रखा है। विभाग में पदस्थ ओएस आरपी मीणा व सीनियर क्लर्क पिंटू जोगी ऐसी ही अनदेखी के अभी भी ज्वलंत उदाहरण बने हुए है। अफसर की विशेष मेहरबानी है। हालात यह है कि किसी अन्य कर्मचारियों के तबादले होते भी हैं तो इन्हें ज्वाइनिंग के लिए अफसरों के चेम्बर में हाजरी देना पड़ती है।
ड्राइंग सेक्शन के बजाए सालों से सीटीए (चीफ टेक्निकल असिस्टेंट) पद की शोभा बढ़ा रहे एके शुक्ला को भी बदस्तूर उपकृत किया जा रहा है। अधीनस्थ कर्मचारियों की जुबानी, मनमानी की कहानी की लंबी फेहरिस्त है। बावजूद जनसंपर्क विभाग के जिम्मेदारों का कहना है कि सबकुछ काम नियमों के मुताबिक हो रहा है।
लिफाफा मीटिंग पर विजिलेंस की पैनी नजर:- सेंसेटिव पोस्ट पर बैठकर ठेकेदारों से मलाई खाने वाले अब जगजाहिर होने लगे है। इनके नाम लोगों की जुबान पर है। बगीचे के कोने में, चाय की दुकान के पीछे या आस-पास की होटलों में ठेकेदारों के साथ लिफ़ाफ़ा मीटिंग को लेकर भी विजिलेंस की पैनी नजर बनी हुई है।
