लेखन संसार:-
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बिटियाँ से माँ का सफर

बिटियाँ से माँ का सफर ।
जीवन के कई पड़ाव से गुजर कर ,
पूरा होता ये सफर ।
आसान नहीं होता ये सफर ।
खुद को परिपक्व कर ,
अपनी चंचलता पीछे छोड़,
जिम्मेवारी की चादर ओढ़ ,
रिश्तों की परिपाटी पर खरा उतर ,
शुरू होता बिटियाँ से माँ का सफर ।
हर माँ चाहती उसकी बिटियाँ स्वावलम्बी बने ।
शिक्षा संग बनाना चाहती है उसे मजबूत ।
उसकी तरह उसकी सीमा घर की चारदीवारी न हो ।
वो उड़े अपने पंख से खुले आसमान में ।
उसकी पहचान खुद के नाम से हो ।
रिश्तों के बीच प्यार से रहे ।
पर पग- पग की पाबंदी से परे ,
उसका अपना सुखद संसार हो ।
साथ निभाये हर रिश्ते का ,
पर किसी रिश्ते से उसकी पहचान न हो।
अपना वजूद खुद बनाये ।
घर के आँगन में बँधी गाय नहीं ।
बल्कि सागर,धरती, आकाश नापने की क्षमता खुद मेंं हो ।
शक्ति की ऐसी ज्वाला बने कि
कोई न अग्नि परीक्षा माँगे , न ही धरती में समाये ।
अपनी क्षमता की ऐसी मिसाल पेश करे कि ,
उसके पंख कतरने का किसी को साहस न हो ।
ममता संग शक्ति और साहस की ज्वाला हो ।
आपस में हर रिश्ते में प्यार हो ।
एक -दूजे के टाँग खीचनें की जगह ,
हर मुश्किल में हाथ थामने वाली सखी हो ।
जिस दिन हर नारी को ये बात समझ में आ जायेगी ,
यक़ीन मानो उस दिन हर नारी घर की चारदीवारी में ही ,
अपना पूरा खुला आकाश पायेंगी ।
-निवेदिता सिन्हा
भागलपुर, (बिहार)
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दो बात

दो बात न कह पाया
तुमसे दूर जाते-जाते……….
था पास मैं तुम्हारे
पर पास ना पाया।
था गर्दिशों में खूद
और वक्त का सताया।।
साहिल भी चल पड़ा
मेरे पास आते-आते……. दो बात न कह पाया……
ये नजरे तुम्हें तलाशती
भटकी है दर बदर।
टूटने लगी है आशा
प्यासा है समंदर।।
चंद लम्हों का फासला
तुम्हें पास पाते पाते…… दो बात न कह पाया….…
थी दीवानगी पाने की
जिसे भूल न पाया।
तन्हाइयों के सायो ने भी
मुझे कम ना सताया।।
निकाला है दम तड़प के
तेरी गली में आते जाते……. दो बात न कह पाया…..
बने पलकों पे निशा
सुखकर आंख के मोती ।
हे दर्द कितना गहरा
बताती आंख ये रोती ।।
जागी है नींद मेरी
यादों में सोते-सोते…… दो बात न कह पाया..
-दिनेश बारोठ ‘दिनेश’
शीतला कॉलोनी
सरवन,जिला रतलाम (मप्र)
