धीमी जांच के 18 दिन, ये कैसी जवाबदेही?… रेल हादसे में दो कर्मचारियों की मौत के बाद भी प्राथमिक कार्रवाई नहीं, बंगलों-दफ्तरों पर कर्मचारियों की तैनाती पर उठे सवाल
न्यूज़ जंक्शन-18
रतलाम/मक्सी। मक्सी-पीर उमरोद रेलवे सेक्शन में 16 अक्टूबर 2026 को हुए भीषण रेल हादसे की उच्चस्तरीय (एसएजी) जांच प्रक्रिया की धीमी गति से पीड़ित रेलवे कर्मचारियों के परिजनों और रेल यूनियनों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। दुर्घटना नियमावली के मुताबिक जांच रिपोर्ट 10 दिनों के भीतर सौंपी जानी चाहिए थी। हालांकि, जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट तैयार कर प्राथमिक स्तर पर प्रस्तुत कर दी है। लेकिन दो समर्पित कर्मचारियों की जान जाने के बाद भी जिम्मेदारों के खिलाफ अब तक प्राथमिक कार्रवाई तय नहीं की गई है। दूसरी ओर ऐसे दर्जनों ट्रॉलीमैन व ट्रैकमैन कर्मचारी है, जो कार्यालयों में अटैच है। इन्हें ऑफिस में बैठे भी अफ़सर ‘रिस्क एंड हार्डशिप अलाउंस’ भुगतान करवा रहे है।
इस क्रम में आगे बढ़नी है रिपोर्ट:- नियमों के अनुसार, जांच टीम द्वारा तैयार किए गए तथ्य सबसे पहले सक्षम प्राधिकारी यानी प्रिंसिपल चीफ सेफ्टी ऑफिसर (PCSO) कुशाल सिंह को सौंपे जाने हैं। उनके माध्यम से यह रिपोर्ट एडिशनल जनरल मैनेजर (AGM) प्रदीप कुमार से होते हुए जनरल मैनेजर (GM) रामाश्रय पांडे तक पहुंचेगी। रिपोर्ट पश्चिम रेलवे जीएम के पास पहुंचने के बाद ही दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई तय होगी। रिपोर्ट मंत्रालय भी भेजी जाएगी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए यह मांग भी उठ रही है कि इसमें कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (CRS) जांच भी होनी चाहिए थी। अफ़सर चाहते तो जांच अधिनियम 1952 के तहत रेल मंत्रालय द्वारा इस हादसे की न्यायिक जांच के आदेश भी दिए जा सकते थे।
16 अक्टूबर को गोवा एक्सप्रेस की चपेट में आए थे दो रेलकर्मी:- 16 अक्टूबर 2026 को मक्सी-पीर उमरोद सेक्शन के किलोमीटर 100/6-8 (डाउन लाइन) पर पुश ट्रॉली और ट्रेन संख्या 12780 (गोवा एक्सप्रेस) के बीच दर्दनाक हादसा हुआ था। इस हादसे में रेलवे के दो कर्मठ कर्मचारी भगवान सिंह बिलमा और दिलीप जायसवाल की अकाल मौत हो गई थी। घटना के बाद फैले भारी जनआक्रोश के चलते जोनल प्रशासन ने एसएजी (SAG) स्तर की उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की थी।
उच्चस्तरीय टीम ने बयानों के आधार पर तैयार की रिपोर्ट:- महाप्रबंधक (जीएम) द्वारा गठित जांच टीम में चीफ ट्रैक इंजीनियर (CTI) कन्हैया झा और चीफ इलेक्ट्रिक इंजीनियर (CEE) दिनेश कुमार जैन मुख्य रूप से शामिल हैं। इनके साथ एडीआरएम (ऑपरेशन) कुंजीलाल मीणा और वरिष्ठ मंडल इंजीनियर (सीनियर डीईएन, समन्वय) पीयूष पांडे ने घटनास्थल का मुआयना कर संबंधित कर्मचारियों के बयान दर्ज किए। जांच टीम ने मौके पर मौजूद ट्रैकमैन सद्दाम से गहन पूछताछ की। पूछताछ के दौरान सद्दाम भावुक हो गए और उन्होंने अपने सीनियर इंचार्ज (CPWI और PWI) से संबंधित कई अहम जानकारियां साझा की। रतलाम स्थित डीआरएम ऑफिस में मक्सी, बेरछा और आसपास के स्टेशनों के स्टेशन मास्टर्स को तलब कर सिलसिलेवार पूछताछ की गई और उनके बयान दर्ज किए गए।
सुरक्षा मानकों की अनदेखी: बिना ट्रॉलीमैन कैडर के कराया जा रहा था काम:- घटना की जांच के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि हादसे के वक्त जिन कर्मचारियों से ट्रॉली पुशिंग का काम लिया जा रहा था। उनमें से दो कर्मचारियों का औपचारिक कैडर ट्रॉलीमैन का था ही नहीं। मैदानी अमले की कमी और गैर-कैडर कर्मचारियों से सुरक्षा संबंधी संवेदनशील काम कराने की कार्यशैली पर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
दफ्तरों और अफसरों के बंगलों पर अटैचमेंट: रेलवे पर पड़ रहा लाखों का बोझ:- एक तरफ जहां ट्रैक सुरक्षा के लिए फ्रंटलाइन स्टाफ की भारी किल्लत है, वहीं दूसरी तरफ ट्रॉलीमैन और ट्रैकमैन कैडर के कई कर्मचारियों को दफ्तरों और बंगलों पर अटैच कर उनसे ‘बाबूगीरी’ कराई जा रही है। आरोप हैं कि सीनियर डीईएन (को-ऑर्डिनेशन) पीयूष पांडे के अधीन ऑफिस में 5 ट्रॉलीमैन/ ट्रैकमैन तैनात है। इसके दीगर विभिन्न सेक्शनों सहित एईएन ऑफिस, ड्राइंग सेक्शन, ब्रिज सेक्शन, वर्क्स एकाउंट्स, अफसर प्यून, सीटीए ऑफिस और गतिशक्ति सेक्शनों में इन मैदानी कर्मचारियों को तैनात किया गया है।
मुफ्त में बट रहा ‘रिस्क एंड हार्डशिप अलाउंस’: फील्ड में न रहते हुए भी इन अटैच कर्मचारियों को हर महीने 3,375 रुपए ‘रिस्क एंड हार्डशिप अलाउंस’ दिया जा रहा है। दफ्तरों में बैठने के कारण इन कर्मचारियों को 5-डे वर्किंग का लाभ मिल रहा है। नेशनल हॉलिडे पर भी रेलवे उनसे ट्रैक का काम नहीं ले पा रही है। जबकि जोखिम भत्ता लगातार जारी है। इससे रेलवे को हर साल लाखों रुपए का वित्तीय भार सहना पड़ रहा है।
मामले में जानकारों का स्पष्ट मानना है कि मैदानी अमले को प्रशासनिक कार्यों और अफसरों के बंगलों में अटैच करने की इस व्यवस्था से ट्रैक की सेफ्टी का मूल काम गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है और इसी लापरवाही का खौफनाक अंजाम ऐसे हादसों के रूप में सामने आ रहा है।
