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मालवा के शहर में दिल्ली के पार्टनर ने खूब रंग जमाया, संगठन में हलचल तेज़, आवाजाही का दौर शुरू, ऑफिसर्स में खींचतान, इंजिन वाले ऑफिस के गलियारों में चर्चा,

जलज शर्मा,

रिटायरमेंट के पहले रेलवे में अपनी बुलंदियों के झंडे गाढ़ चुके रेल अफसर की जमात के सीनियर रहे बड़े साहब ने रत्नपुरी में आकर खास अंदाज में अपने ही पुराने लोगों के बीच मेलमिलाप का खूब रंग जमाया। पार्टनर के मालवा की धरा पर आने की सूचना पर उनके प्रेमी संगी रत्नपुरी की परंपरा के मुताबिक उनसे मिलने पहुंचे। देखते ही देखते भीड़ जमा होती चली गई। चूंकि पार्टनर रतलाम से लेकर मुंबई व दिल्ली में बड़े ओहदे पर काम कर चुके थे। इसलिए उनके आने के मैसेज पर रेल इंजिन वाले ऑफिस के दूसरे नंबर के साहब का आगवानी के लिए पहुंचना लाज़मी था। भनक लगते ही मीडिया के कर्मी भी क्लिक करने इनसे पहले ही पहुंच गए थे। सबके बीच मंडल के दूसरे नंबर के साहब भी चुपचाप गौर से मेलमिलाप का नज़ारा देख रहे थे। यहां के लोगों के साथ बड़े साहब की प्यारभरी वार्तालाप ‘सुनकर’ तो वे हैरान रह गए। साहब राजधानी के लिए निकले तो यहां के अफ़सर्स को टिप्स जरूर देते गए। कहा कि पार्टनर मीडिया व रेल संगठन वाले से मेलजोल बनाकर रखना। ये अच्छे लोग हैं, आपको इनसे खूब सहयोग मिलेगा।
हे प्रभु, छुईमुई की तरह रहने वाले रेल अफ़सर्स यदि प्यारभरी बातें ‘सुनकर’ अमल करें तो खूब फ़ायदा होगा। क़ायदा भी यहीं कहता है। सरकारी सिस्टम में करोड़ों रुपए की सुविधा व व्यवस्था मात्र आम लोगों व यात्रियों के लिए है। यहां हर अफ़सर्स कर्मचारी के लिए व हर कर्मचारी आमजन व यात्रियों के लिए जिम्मेदार है। यह समझने के लिए काफ़ी है।

संगठन में हलचल तेज़, आवाजाही का दौर शुरू:- रेलवे से जुड़े आगामी कुछ चुनावों की सुगबुगाहट को देखते रेल संगठनों में हलचल तेज होने लगी है। इनके कार्यालयों में आवाजाही भी बढ़ने लगी है। लोग सुबह-शाम मंडल के मंत्रियों के साथ गुफ्तगू कर अपनी सेटिंग की जुगाड़ में जमे रहने की कोई कसर नहीं छोड़ रहे। कुछ पदों पर बदलाव व नियुक्ति की प्रकिया भी ताबड़तोड़ पूरी की गई। हां, अब इन संगठनों में आयाराम -गयाराम का दौर फ़िलहाल जरूर थम गया है। लेकिन यह दौर शुरू हुआ था। तब से ही पद वाली कुर्सी पर डटे कुछ पदाधिकारियों के दिमाग मे टेंशन बढ़ गया है। एक पहले नंबर के संगठन की बात करें तो वहां एक नए पदाधिकारी की सक्रियता ने अंदरूनी हलचल बढ़ा दी है। सभी अपनी-अपनी कुर्सी को कसकर पकड़े हुए है। उन्हें डर है कि नया पदाधिकारी अपने-लोग फिट कर रहा है। कहीं उनकी कुर्सी न हथिया लें। इसलिए जब तक वह पदाधिकारी संगठन के ऑफिस में रहता है। तब तक दूसरे वहां से हिलते तक नहीं।
हे प्रभु, जगन्नाथम जो व्यक्ति जहां अपनी प्रतिभा दिखायेगा, वह तो आगे जाएगा ही। चाहे उसे देखकर कोई ‘लाल’ पड़ जाए या उसका चेहरा ‘भूरा’ हो जाए।

ऑफिसर्स में खींचतान, इंजिन वाले ऑफिस के गलियारों में चर्चा:- इन दिनों पहली बार नज़ारा देखने को मिल रहा, जब इंजिन वाले ऑफिस के तमाम ऑफिसर्स के बीच खींचतान शुरू होने लगी है। यह चर्चा अब केबिनों से बाहर निकलकर कार्यालय के गलियारों तक जा पहुंची है। इसी खींचतान का बेवज़ह खामियाजा एक वीआईपी छोटे अफ़सर को भी उठाना पड़ा। मस्तमौला अफ़सर का अपने ही सीनियर से मनमुटाव क्या हुआ। पहले वीआईपी फाइल के अधिकार छीन लिए। इसके बाद इनका तबादला करवाकर सभी ने मिलकर इन्हें बड़ौदा की गाड़ी में बिठा दिया। बेचारे वीआईपी अफ़सर पर आरोप लगे कि मेलमिलाप के चलते इनके तो शहर के नेताओं से संबंध हो चले है। हालांकि वीआईपी अफ़सर का कहना है कि कर भला सो हो भला। भले ही ऑन रिक्वेस्ट का आदेश भरवाकर ही सही, कम से कम उन्हें परिवार के पास तो पहुंचा दिया।
दूसरी ओर वित्त वाले बड़े साहब के तबादले के बाद खेल सचिव बनने की जुगत में खींचतान शुरू हो गई। हालांकि कुछ अफसर इस जिम्मेदारी से पिंड भी छुड़ाते रहे। अंततः बेचारे विभागीय काम के बोझ के मारे ‘को’ साहब को जिम्मेदारी सौंप दी गई। वहीं न चाहते हुए भी ऑफिसर्स क्लब सचिव की बागडोर बड़ी मेडम के हाथों थमा दी गई। अब क्लब में इनकी देखरेख व इनके भरोसे में आयोजन होंगे। क्लब में शादी समारोह में आमदनी बढ़ने के दावे है। वहां दुल्हन के हाथों में मेहंदी लगेगी, तब गाना तो यही बजेगा ‘मैं हूं खुशरंग हीना’….।

अब अफसर के बंगले की मरम्मत में जुटा शेरा:- न चाहते-चाहते आखिर ऑपरेटिंग के नए बड़े साहब ने अपने सिपेसलार शेरा की खुशामद को अंगीकार व स्वीकार कर ही लिया है। क्योंकि साहब के सरकारी बंगले को न्यारा जो बनाया जा रहा है। बंगले को नव श्रृंगारित करने में शेरा जी जान से जुटा है। वह भले ही दोपहर 12 बजे बाद ऑफिस पहुंचे। भले ही कंट्रोल के कर्मचारियों पर अफसरशाही का रौब जमाकर गाड़ियों की पोजिशन लें या उनसे कड़ी पूछताछ करें। साहब तो सबकुछ इग्नोर करने को तैयार है।
हे प्रभु, जब भगवान को भी आरती पसंद है, पहलवान को मालिश पसंद है। तब बेचारे अफसर की क्या बिसात है जो खुशामद को अंगीकार न करें।
है प्रभु, जगन्नाथम, प्रेमानंद ये सब क्या हो गया।

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