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एक मंत्री के अगल-बगल में सिपहसालर, दूसरे की बगल खाली, दूसरे नंबर के साहब ने दूसरे चेंबर में छोटी कुर्सी संभाली, नटवारी खेल जारी, भयवश साथियों ने ही छोड़ा साथ

जलज शर्मा, 

रेलवे के मान्‍यता वाले प्रमुख संगठनों के खेमों में इन दिनों अजीब वीरानी और अलग कहानी बयां होती दिखाई दे रही है। मंडल के एक मंत्री से अगल हुए सिपहसालार कूदकर दूसरे मंत्री के बगल में चले गए। ऐसे में पहले मंत्री के ह्दय वाली बगल ही खाली हो गई। कभी मनोहर लगने वाले माहौल में जैसे ग्रहण ही लग गया। हालात यह बन गए कि इंजिन वाले ऑफ‍िस से मंडल के मंत्री जी एक गेट से प्रवेश करते है। इन्हे देख इन्हीं के छोटे-मोटे सिपहसालार इधर-उधर हो जाते है। 

ऐसे में घुम फिरकर दूसरे गेट से बाहर आकर सीधे रेलवे स्टेशन की ओर गाड़ी का एक्सीलेटर दबा कर ठिकाने पहुंच जाते हैं। 

इधर दूसरे मंत्री के बन चुके मुख्य सिपेसालार भी कहां चुप रहने वाले है। जब से ये दूसरे खेमे में पहुंचे है। उन्‍होंने भूरे स्मार्ट चेहरे के बावजूद लाल शर्ट ही पहनना बंद कर दी है। इनके द्वारा तिरंगा झंडा थाम लेने के बाद इस संगठन के खेमें में हलचल तेज हो गई।वहां के पुराने सिपहसालारों के पैर के नीचे से जमीन खिसकते दिखाई देने लगी। क्‍योंकि आने वाले दिनों में लोन वाली बैंक के भी चुनाव है। चुनाव लड़ने वालों में रामदेवजी के नमाज़ी भक्त सहित अन्य दावेदारों की भी चिंताएं बढ़ गई है। तेज प्रताप वाले भोले की भी मुस्कान हल्की हो गई। लेकिन लाल शर्ट खूंटी पर टांगकर आए प्रमुख सिपहसालार का कहना है कि मुझे तो केवल कर्मचारियों के हित काम चाहिए, पर-वद से मुझे कोई लेना-देना नहीं है….। 

हे प्रभु, कर्मचारियों की सेवा में उतरे संगठन व उनके नेता जनसेवा के बजाय स्वयं को बड़े राजनीतिज्ञ समझ बैठे है। उन्हें यह भी पता नहीं कि यह संवैधानिक सिस्टम की राजनीति का प्लेटफॉर्म या अखाड़ा नहीं है। बल्कि केवल व केवल कर्मचारियों की आवाज़ व समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाने की वे कड़ी भर मात्र है। 

दूसरे नंबर के साहब ने दूसरे चेंबर में छोटी कुर्सी संभाली:- मानसून के साथ ही इंजिन वाले ऑफ‍ि‍स में आखिर दूसरे नंबर के साहब ने तबादले के बाद अपनी आमद दिखाते हुए दस्‍तक दे दी है। हालांकि इन साहब को आशा के मुताबिक फिलहाल चैंबर नहीं मिला है। क्‍योंकि इनके चैंबर में पहले से ही बड़े साहब का कब्जा है।

हुआ यूं कि बड़े साहब के चैंबर को और भी बड़ा बनाया जा रहा है। पिछले एक माह से बेचारे पुराने साहब भी मन मसोजकर विचार-विमर्श व मंथन वाले कक्ष में घिरे-बैठे रहते थे। 10 बाय 15 के इस कक्ष में बैठकर वे काम की फाइलों को छाट-छाटकर आगे बढ़ाते रहे। ऐसा लगता है कि छोटे नए साहब को भी अपना चैंबर पाने के लिए  कुछ इंतजार करना पड़ेगा। 

हे प्रभु, रतलामी आवभगत के आनंद की बात ही निराली है। छोटे साहब को इसका आनंद तो मिलेगा, साथ ही यहां की जी-हुजूरी का भी ये बखूबी लुफ्त उठा सकेंगे। इसके लिए कई अरदली उनके संपर्क में आ गए होंगे। 

नटवारी का खेल जारी, भयवश साथियों ने ही छोड़ा साथ:- रेल मंडल के छोटे साहब के दिव्‍यांग माली से ट्रेन के दिव्‍यांग कोच में भिड़ने वाले टिकिट जांचने वाले नटवारीलाल का अब उसके साथियों ने भी साथ छोड़ना शुरू कर दिया है। वह तो गनीमत है कि नटवारी ने दिव्‍यांग माली के साथ दिव्‍यांग कोच में अभद्रता की। विभाग की बड़ी मेडम उस समय छुट्टी पर चल रही थी। नहीं तो, नटवारी के दिमाग के सभी नट-बोल्ड टाइट हो जाते। 

अब सुनने में आ रहा है कि नटवारी ने कोचों में दोबारा अपना खोचड़पना शुरू कर दिया है। इनकी गरब जेबों से कहीं साथी न जल जाए। इसलिए स्‍केल की सीध में चलने वाला एक साथी तो फौरन ही इनसे दूर चला गया। दूसरे साथियों ने भी दूरियां बना ली है। 

हे प्रभु, ‘बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी’। जिस दिन नटवारी खेल हाथ लगा, भगवान जगन्नाथ छोड़ेंगे नहीं। बल्कि खूब रगड़ेंगे। 

काउंटर व टेबलों की बिछात में उलझे नियम:- रेलवे स्टेशन पर लगता है नियमों को पालन कराने में जिम्मेदारों की रुचि नहीं रही है। बल्कि सभी ने आँखें मूंद ली है। प्रमुख स्टालों का आबंटन शर्तों के मुताबिक किया जाता है। रेलवे के केटरिंग पॉलिसी के नियम भी है। आकार-प्रकार के मान से यूनिट की जगह का इस्तेमाल करना होता है। वहां आलम यह है कि इन यूनिट के आसपास अस्थायी तौर पर टेबल, कुर्सियां, डीप फ्रिज खड़े कर पृथक ही यूनिट बना ली गई है। इससे यात्रियों को उठने-बैठने व निकलने में खासी समस्या आने लगी है। यात्रियों की शिकायतों पर छोटी मोटी कार्रवाई कर ली जाती है। लेकिन टेबल कुर्सी की छोटी यूनिट को हटाने के लिए कभी जांच पड़ताल नहीं की जाती। 

हे प्रभु, रेलवे अफसर को लगता है कि स्टालों की जांच करने रेलवे के जज साहब पहुंच जाते है। अफसरों का काम हल्का हो जाता है। टेबल-कुर्सी उठाने भी शायद इन्हें नगर निगम वालों का इंतजार है। 

हे प्रभु, जगन्नाथम ये सब क्या हो गया।

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