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व्यवस्था बेजार, अब बड़ी मेडम का इंतजार..गाज गिरेगी, नीले झंडे वालों ने बाजी मारी, ये बेचारा बहना की बक-बक का मारा, घंटी वाली बहना बनी मेडम

जलज शर्मा,

दो बत्ती पर इंजिन वाले ऑफिस का कमाई वाला सेक्शन छह-आठ रोज से बेलगाम है। इंजिन के धुएं की तरह नियम हवा में उड़ते दिखाई दे रहे है। इसकी वजह इस सेक्शन को चलाने वाली बड़ी मेडम के छुट्टी पर चले जाना है। मेडम बाहर क्या गई, सबके मजे पट गए। स्टेशन पर खानपान की दुकानों पर देखने-भालने वाला कोई है ही नही। स्टेशन पर केटरिंग वाली छोटी मेडम का ठौर-ठिकाना ही नहीं। स्टॉलों पर जिधर से जो बेचना हो, बगैर नियम खुलेआम बेचों। आईडी, मेडिकल, ड्रेसकोड न हो तो भी चलेगा। रेलवे से ही जुड़े जज साहब ने निरीक्षण किया तो सैकड़ों कमियां निकालकर हाथ में दे दी। तब स्टेशन से लेकर इंजिन वाले ऑफिस तक खलबली मच गई। छोटी मेडम ने रिपोर्ट बनाकर विभाग में जरूर दी। अब देखते है, छुट्टी से लौटकर बड़ी मेडम क्या प्रसाद खिलाती है।
बड़ी मेडम के न रहने पर कुछ रेल टिकिटों की जांच करने वाले भी यात्रियों से गाली-गलौच पर उतर आए। दो नंबर वाले साहब के दिव्यांग माली तक को नही छोड़ा। कोच में हुए वाक़िये के ऋषिमुनि भी साक्षी रहे। मामला दो नंबर वाले साहब के पास गया तो नटवारीलाल का नाकरगडू नाटक भी देखने लायक था। उनके तो पसीने ही छूट गए। माफी मांगते-मांगते गला ही सुख गया।
हे प्रभु, जगन्नाथम, बड़ी मेडम के आने का इंतजार है। नटवारी का राजस्थानी नट खेल हमेशा खत्म होने की उम्मीद है। इनके साथ वाले साथी भी यही चाह रहे है।

 

विभागीय क्रिकेट टूर्नामेंट में नीले झंडे वालों ने बाजी मारी:- रेल संगठनों में इन दिनों टेनिस बॉल क्रिकेट टूर्नामेंट की होड़ मची है। लाल झंडे के बाद तिरंगे व भगवा झंडे वाले संगठन ने तपती गर्मी में खिलाड़ियों से खूब चौके-छक्के जड़वाकर छकाया। ऐसे में नीले झंडे वाले कहां पीछे रहने वाले थे। इस संगठन वाले नेताओं ने व्यवस्थाओं में बीसीसीआई को भी पीछे छोड़ दिया। दूधिया रोशनी में हरे मैदान पर शॉट मारने में खिलाड़ियों को भी मजा आ गया। संगठन के नेता बीसीसीआई पदाधिकारियों की तर्ज पर कांच के केबिन से मैच का नजारा देखते रहे। वही अतिथियों को भी वीआईपी केबिन से ही हार मालाएं पहनाई गई। सभी केबिन के अंदर से बाहर मैदान का नज़ारा देखते रहे। लेकिन मैदान से केबिन में कोई दिखाई नहीं दिया कि किसने किसका स्वागत किया।
प्रभु जगन्नाथम, यह तो मानना पड़ेगा कि नीले झंडे वाले नेताओं ने दूसरे नेताओं से बढ़कर बीसीसीआई की तरह ही पैसा खर्च किया। हरे मैदान, दुधिया रोशनी का खर्च उठाया। स्वागत के लिए एक-दो नही कई हार मंगवाए।

सय्याँ भए कोतवाल अब डर काहे का:- यह कहावत इंजिन वाले ऑफिस के सिस्टम में हूबहू फ़ीट बैठती दिखाई दे रही है। क्योंकि हर विभाग में कोतवालों की कोतवाली में भैया-बहना को कोई कहने-सुनाने वाला नही है। जमिनी तल वाले ऑफिस में कई पप्पू, पप्पा व पिंटा, पिंटू सालों से एक ही टेबल पर कुंडली मारे बैठे है। जैसी बिन बजाई जा रही, विषधर वैसा नाच दिखा रहे है।
हां, अदला-बदली में एक भैया का दूसरी मंजिल से पहली मंजिल जरूर तबादला किया गया। वे अपनी टेबल की सामग्री लेकर नीचे वाणिज्य लेखा-जोखा में आ जाएंगे। लेकिन एक बहना की सामग्री जहां के तहां यानी उसी टेबल पर पड़ी है।
दूसरी मंजिल पर ही गोपनीय टेबल की फाइलें भी सालों से एक ही हाथों में थमी है। वहीं महाभारत की तरह रेलवे के संजय कम्प्यूटर कक्ष से बाहरी दृश्य देखकर मजे ले रहे है। अंदर ही किशन जी भी हरि नाम जप रहे है।
हे प्रभु, मुनि नारद की निगाहें हर संदेश व हर खबर पर टिकी है। असरदारी से जरूर असर करेंगे।

ये बेचारा, बहना की बक-बक का मारा:- इंजिन वाले ऑफिस की दूसरी मंजिल पर काम करने वाली एक छोटी मेडम के बोल-बच्चन खुलेआम बल्कि खुल्लम-खुल्ला हो चले है। पिछले दिनों तो एक कल्याणी इनकी चपेट में ख़ामोखा आ गया। इस पर यह मेडम जमकर बरस पड़ी। इनके मुंह से निकले मंत्र सुनकर कल्याणी के होश उड़ गए।
हे प्रभु, उदास कल्याणी ने सोचा कि बड़ी मेडम तो बहना का ही सपोर्ट करेगी। कुछ होना जाना नही है। इसलिए मंडल के दूसरे नंबर वाले बड़े साहब के पास अपनी पीड़ा सुनाने पहुंचा।

घंटी वाली बहना बनी मेडम:- रेल अफसरों के केबिन के बाहर घंटी वाली टेबल पर बैठने वाली बहना इन दिनों टेबल कुर्सी वाली मेडम बनकर घूम फिर रही है। इन पर वरद कृपा बनी हुई है। जबकि शिकायत करने वाली एक छोटी से छोटी बहना को निचले तल पर भेज दिया।
हे प्रभु, माहौल देखकर हम तो केवल यह गीत गुनगुना सकते है कि’ बाबूजी धीरे चलना…, जरा संभलना”।

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