रेटिंग के खेल में मैना दीदी आगे, बाकी सब फेल….ब्लैक डॉग, सिग्नेचर, ब्लैक एंड व्हाइट को लेकर मेडम जी दी हिदायत….नंबर एक की दौड़, न आप और न पीछे….
जलज कुमार शर्मा,
रतलाम। दो बत्ती पर इंजिन वाले ऑफिस की पहली मंजिल पर कंट्रोल रूम वाली जगह की व्यवस्था इन दिनों कंट्रोल में नहीं है। गाड़ियों के ऑपरेशन वाले विभाग में बैठे चेन्नई वाले दूसरी पंक्ति के वीर साहब लंबे समय से कंट्रोल ऑफिस में ही चेन्नई एक्सप्रेस चलाने की मंशा में लगे पड़े है। कहां तक सक्सेस होते है दूर की बात है। लेकिन उन्होंने परफॉर्मेंस
रेटिंग में एक मैना दीदी को नीचे से ऊंचे स्तर तक पहुंचा दिया।
दरअसल विभाग की परफॉर्मेंस रेटिंग रिपोर्ट तैयार कर इसे अब बड़े साहब के सामने पेश करना है। लेकिन इसकी झड़ी कर्मचारियों को बीच में ही लग गई। पोल खुली तो कानाफूसी भी शुरू हो गई। कंट्रोल वाले कहने लगे कि “काम करे कोई, इनाम पाए कोई!”
लगता है कि कंट्रोल रूम के दूसरे नंबर वाले इन साहब ने रेखा-अमिताभ बच्चन की तमिल डब फिल्म सिलसिला खूब देखी है। इसलिए इनके मन मे हीरो बनने की चाहत बढ़ने लगी। इसका असर परफॉर्मेंस।रेटिंग के वक्त दिखाई दिया। क्योंकि दिन-रात कंट्रोल में बैठकर गाड़ियों को सुचारू चलाने की माथापच्ची करने वालों को रेटिंग में केवल गुड व वेरी गुड दिया गया। लेकिन एक मैना दीदी को रेटिंग का ‘मलाईदार हिस्सा’ यानी उन्हें एक्सीलेंस की श्रेणी दे दी गई। हालांकि यह तय है कि काम के नेचर से सीरियस सीनियर यानी बड़े साहब इस मिस्टेक को आसानी से पकड़ लेंगे और चेन्नई एक्सप्रेस को भिड़ंत से पहले ही रोक देंगे।
हे प्रभु जगन्नाथम, कर्मचारियों के काम का वार्षिक मूल्यांकन केवल काम के आधार पर ही होना चाहिए। न कि ‘चहेतेपन’ या अपने खास के आधार पर।
ब्लैक डॉग, सिग्नेचर, ब्लैक एंड व्हाइट को लेकर मेडम जी दी हिदायत:- यदि हम किसी सरकारी ऑफिस से जुड़े मामले में ब्लैक डॉग।, सिग्नेचर, ब्लैक एंड व्हाइट जैसे ब्रांड शब्द का उपयोग करें तो आप इसे गलत मत समझना। क्योंकि कहने का अर्थ दूसरा है। ब्लैक डॉग यानी ऑफिस के बाहर बैठने वाला काला डॉग, सिग्नेचर यानी मस्टर (रजिस्टर) पर हस्ताक्षर करने तथा ब्लैक एंड व्हाइट को केवल काला-सफेद वाली मीनिंग से जोड़कर पढ़िएगा
दरअसल हम देवी अहिल्या की नगरी (इंदौर) स्थित रेलवे स्टेशन पर ट्रेनों में ड्यूटी लगाने वाले एक अदने साहब (इंचार्ज) की बात कर रहे है। इन्हें पिछले दिनों रत्नपुरी (रतलाम) के रेल वाले ऑफिस (मंडल कार्यालय) पर मैडम जी ने एक मामले में पूछताछ के लिए तलब किया है। पहले तो इन्हें दीनदयाल की छबि जैसा माना। इनसे केवल सामान्य चर्चा की। लेकिन जब सफाई देने लगे तो इन्हें खूब खरी खोटी सुनाना शुरू कर दी। अब मेडम केवल एक ही को कैसे लपकाए। इसलिए बाबा महाकाल वाले (उज्जैन) स्टेशन के इंचार्ज को भी बुलवाया गया था। हालांकि इन इंचार्ज को तो ज्यादा कुछ बोला नहीं। लेकिन देवी अहिल्या नगरी के स्टेशन वाले इंचार्ज की ऐसी लूं उतारी कि केवल इसे सांकल से बांधा नहीं बस…। सिर पर बिंदी लगाकर आई मेडम जी ने इन्हें हिंदी में इसे समझा दिया। ब्लैक डॉग को ऑफिस से हटाओ। सिग्नेचर जैसी कोई भी गड़बड़ी हुई तो खैर नहीं है। ब्लैक एंड व्हाइट ड्रेसकोड की अनिवार्यता का जरूर ध्यान रखो। गाड़ियों में वर्किंग ड्यूटी में किसी एक कर्मचारी पर मेहरबान होने की आवश्यकता नहीं है। आगे से कोई शिकायत आई तो चलता कर दिए जाओगे।
हे प्रभु, जहां भी ऐसे ब्रांड के नाम आए तो लोग गलत ही समझ जाते है। माना कि इंदौर में इन नामों का उपयोग ज्यादा ही होता है।
नंबर एक की दौड़, न आप और न पीछे:- रेलवे कर्मचारियों का उद्धार करने की कसम खाने वाले प्रमुख दो खेमों में नंबर एक बने रहने की दौड़ को लेकर पिछले दिनों खूब हल्ला मचा। 15 से 20 दिनों पहले से नेताओं के आसपास झूमने व लटूमने वाले खांदियों ने अपने सदस्यों की लिस्ट बनाना शुरू कर दी थी। जब महीने के आखरी में वेतन बिल तैयार किए गए ल। तब।राज्यसभा चुनाव जैसी तूफानी हलचल मचना शुरू हो गई थी। रेल भाषा की बात करें तो वेतन वाले सेक्शन से फॉरवर्ड होने के बाद वेतन बिल गुणा-भाग वाले नीचे (ग्राउंड फ्लोर) के सेक्शन में भेज दिए। लेकिन खेमों में आख़री तक नाम सदस्यों के जुड़वाले की जुगाड़ चलती रही। आरोप लगाए गए कि नाम जुड़वाने के लिए इन्हें वेतन भाग के सेक्शन से बिल रिटर्न करवाए गए। शाम होते-होते जब आंकड़ें बाहर निकलकर आए तो फिर नंबर वन के दावों का दौर चला। मजा तब आया कि एक खेमा गुजरात की वर्क यूनिट को जोड़कर आंकड़ें में खुद को नंबर बता रहा था। दूसरा खेमा मंडल परिक्षेत्र को ही मुख्य आंकड़ें बता रहे है। वही आयाराम-गयाराम वाले नेता अलग नी मान रहे थे। वे अपनी-अपनी चला रहे थे। लोगों को पकड़-पकड़कर बोल रहे थे कि देखा…मैं जब से नई टीम में आया, सामने वाले की वाट ही लग गई…। इधर, बेचारे इन खेमों में प्रवक्ता से नेता और नेता से प्रवक्ता बने प्रभारी बार-बार बदले आकड़ें जारी करते-करते थक गए।
हे प्रभु जगन्नाथम, किसी भी कर्मचारी को आज तक पता नहीं चली कि नंबर वन को दौड़ में कौन सा खेमा आगे रहा। तब समझ यह नहीं आया कि फिर नंबर वन की रेस क्यों की गई।
