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लेखन संसार

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लघु कथा

ममता

दरवाजे की घंटी बजी .. दौड़ कर सीमा गई घंटी की ध्वनि घंटी बजाने वाले की व्यग्रता बता रही थी ।
सामने कुछ लोग घर में काम करने वाली नैना को बेहोशी की अवस्था में लेकर खड़े थे, सीमा ने पूछा ” क्या हुआ नैना को? क्या रास्ते में किसी से टकरा गई,” पूछने का आशय था गाड़ी या रिक्शा से ,नैना उड़ीसा के बालासोर जिले की रहने वाली है, और वर्ष में एक बार अपने गाँव जाती है, उसका अपने पति से तलाक हो गया है उसकी एक बेटी है जो उसके माता-पिता के साथ रहती है।
वह अपनी बेटी के अच्छे भविष्य के लिए ही कोलकाता शहर में घरेलू कामकाज करने के लिए आई है।
नैना को जो लोग पकड़ कर लाए थे उन्होंने कहा
” इसने जब से बालासोर के पास हुई ट्रेन दुर्घटना के बारे में सुना है बहुत रो रही है”।
सीमा ने पूछा “मगर यह क्यों रो रही है? ईश्वर की कृपा से इसकी गाँव जाने की टिकट 4 दिन बाद की है “।
तब उसको लाने वाले में नैना की एक सखी भी थी, उसने बताया यह रो रो कर बोल रही थी काश! उसकी टिकट भी उसी दिन की होती, और वह भी एक्सीडेंट में मर जाती, उसके मरने से उसकी बेटी को 10 लाख रुपया मिल जाता सरकार की तरफ से तो उसकी बेटी का भविष्य बन जाता। इतना रुपया तो वह है सारी उम्र काम करके भी नहीं कमा सकती है। यह सुनकर सीमा की आँखें भर आई यह कैसी ममता?।

-ऊषा जैन उर्वशी कोलकाता।

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मतदान गीत

गांव-गांव और डगर डगर
बस्ती हर भरमाई है
मतदान ज्ञान के शंखनाद से
घर घर खुशियां छाई है
लोकतंत्र के महायज्ञ की
आज यह बेला आई है
प्रजातंत्र के महापर्व की
आज यह बेला आई ….

गीत गणतंत्र के मिलकर गाएl
नर नारी मैं भेद मिटायेll
हर मतदाता पाए खुशालीl
मतदान करे तो लगे दिवालीll
तीज और त्योहार से ज्यादा
खुशियां इसमें समाई है….

मत अधिकार देगा उजियारा
खेतों और खलियानो तकl
लोकतंत्र का मान बढ़ेगा
सारी धरा के जहानों तकll
हर तबके में गूंज हो इसकी
ऐसी चली पुरवाई है…..

दुनिया के सब विधि विधाना में
पाया हमने सार यही
मतदान बिना तो तंत्र अधूराl
सपना बापू का तभी हो पूराll
लोकतंत्र की मजबूत दीवार में
मत की ही ताकत समाई है।

मजदूर

तन की अगन बुझाने सहता है दिन-रात
अत्याचारी जुल्मी कोड़े ।
परिश्रम की भट्टी में खुद को झोंक
कभी आपदाओं से मुंह ना मोड़ें।।
बदले में पाता है ब मुश्किल दो जून खुराक।
यही है उसकी नियति
या समाज का घिनोना मजाक।।
ज़मीं बिछाकर आसमान ओढ़ लेना
अब उसकी आदत सी बन गई है।
यूं ही जिंदगी जीते कई पतझड़े निकल गई है।।
वह नहीं समझता लू और लहर में मौलिक अंतर।
निष्प्रभाव हो जाती है ‘दिनेश ‘
उसके नग्न जिस्म को छूकर।।
एक हम है नाहक परेशानियां पाले
चिंतित दुखी मजबूर।
वह मुस्तैद है हवा और वक्त को बदलने संकल्पित मजदूर।।

-दिनेश बारोठ ‘दिनेश
शीतला कॉलोनी
सरवन, जिला रतलाम (मप्र)।

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लघुकथा

चौथा रास्ता


जब भी कार से बाहर जाना होता है तो पता नहीं सुनीला को क्या हो जाता है ? जो कभी भी किसी को भीख में कुछ भी नहीं देती , चिड़ती रहती है ,चौराहे पर तीन बत्ती के कारण गाड़ी जब भी रुकती है वो बाहर देखती रहती है ।चौराहे पर कोई ताली बजा कर मांगने वाले कुछ बेचते है ,तो सुनीला फुर्ती से खरीद लेती है ।वो ये नहीं देखती है की ,काम की है या नहीं ।सुरेश ने पूछा ,ये तुम क्या करती रहती हो । सुनिला ने कहा की ,जब ये लोग कुछ करके कमाने की सोचते हैं ,तो हमे इनकी मदत करनी चाहिए ।मैं तो भीख देने के खिलाफ़ हूं ।और दूसरी बात ,इन्हे कुछ भी देना भगवान की पूजा समझती हूं । ईश्वर का शुक्रिया अदा करने जैसा ही होगा ,जो हमे एक अच्छा जीवन दिया है ।ऐसा जनम मिलना कितना दुर्भाग्य की बात होगी ? इनकी कोई गलती नहीं है ,जो उन्हें समाज में अभी तक समानता का दर्जा प्राप्त नहीं हुआ ।चौथे रास्ते की शुरुआत हो गई है मगर अभी क्रांति लाना बाकी है ।

-अर्चना पंडित
इन्दौर (मप्र)।

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