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टेबलों का खेल…एक मैदान में खो-खो, दूसरे में खो करना ही भूले…, दोबारा करने लगे जेब गरम…, रेलवे स्टेशन के असली हाट बाजार, नकली छाछ-दही

जलज शर्मा,

दो बत्ती पर लगे रेल इंजिन वाले ऑफिस में टेबलों की खास चाह के साथ ही इसके खेल भी अजब-गजब होने लगे हैं। दूसरी मंजिल में टेबलों में नियमों के जो खेल है, वह पहली मंजिल तक आते-आते बदल दिए जा रहे है।
क्रमवार यदि दूसरी मंजिल कार्मिकों के सेक्शन की बात करें तो बार-बार टेबलें बदले जाने से कल्याणी भाई परेशान हो चले है। कुछ खास के नाम छोड़ दें तो बाकी कल्याणी को हर माह-दो माह में अलग दिशाएं दिखाई जा रही है। वे खुद कहने लगे कि नौकरी करते-करते हम खुद ही खो-खो सीख गए। बड़ी बात कि जिस महिला कल्याणी को खेल में शामिल किया जा रहा, उन्हें चलने-फिरने में परेशानी हो रही है। मगर बेचारे ये करें तो क्या करें….। खेल तो आखिर खेल है। इस खेल के रैफरी अंबा के लाल से विसिल सुनते ही इन्हें मज़बूरन दौड़ना-भागना पड़ रहा है।
अब बात करे पहली मंजिल की तो कमाई वाले सेक्शन में कुछ लालों (इंपेक्टर) को जैसे कमाई पूत मान लिया है। धन, वैभव, संपदा सब इन्हीं से मिल रही है। इसलिए इन्हें सालों से टेबलों से हटाया नहीं जा रहा है। अब इस कमाई से रेल इंजिन का पेट भरा रहा या इन पूतों का, इसमें कौन फल-फूल रहा…। ये केवल जगन्नाथ ही नहीं, बल्कि सब जानते है।

पहली माफी से नहीं माने, दोबारा करने लगे जेब गरम

पिछले दिनों इंजिन वाले ऑफिस में दूसरे नंबर वाले बड़े साहब के बगीचों की देखरेख करने वाले दिव्यांग से दिव्यांगजनों के कोच में टिकिट जांचते नटवारीलाल ने बदसलूकी की थी। इसके एवज में भले ही साहब के सामने माफ़ी मांग ली थी। लेकिन अब वे दोबारा अपनी आदतों से बाज नहीं आ रहे है। उस वक्त फेसबुक वीडियो रील वाले छोटे साहब को रहम आया। इनके बीच-बचाव से नटवारीलाल बच गए। अब सुनने में आ रहा कि नटवारीलाल ने छुकछुक रेल में फिर से खेल दिखाना शुरू कर दिया है।
हे प्रभु, जिसे गरम जेब की पतलून पहनने की आदत हो गई तो आखिर कब तक जेब ठड़ी रखे। वह भले ही खाटूश्यामजी का नाम जपे, लेकिन जगन्नाथ जी आगे माफ नहीं करेंगे।

रेलवे स्टेशन के असली हाट बाजार, में नकली छाछ-दही, महंगी पूड़ी-सब्जी

रेलवे स्टेशन पर इन दिनों खाने-पीने का सामान बेचने वाले वेंडर सरेंडर होने का नाम नहीं ले रहे है। गाड़ी आते ही प्लेटफॉर्म पर हाट बाजार भर जाता है। बेचारे मुसाफिर इनके चंगुल में आकर महंगे दाम पर नकली छाछ-दही व लस्सी आंख मीचकर पी जाते है। स्वाद खराब होने पर मुसाफिर इन्हें कोसते तब तक गाड़ी का हॉर्न बजने लगता है। हे प्रभु, जंक्शन पर ये सभी काले धंधे की रोकथाम के जिम्मेदार आंखें मूंदकर फंक्शन में मस्त है। इन्हें रोकना केटरिंग वाली छोटी मेडम के बस में नहीं है। दरबारी मूंछों वाले कमर्शियल वाले एक और जिम्मेदार डिप्टी सर आए दिन बीमार रहते है। ऐसे में नकली छाछ-दही, लस्सी-आइसक्रीम, पूड़ी सब्जी, सहित अन्य समान धड़ल्ले से बिक रहा है। अवैध कारोबार अच्छे से फल-फूल रहा है।

सबको है नए छोटे साहब का इंतजार

रेल इंजिन वाले ऑफिस में बैठने वाले छोटे साहब के तबादले से कुछ नेताओं की ट्यूनिंग गड़बड़ा गई। क्योंकि साहब सहज, सरल व मृदुभाषी थे। अब सभी नए साहब के आने का इंतजार में है। तांकि नए साहब से मेलमिलाप शुरू हो सके। कई कर्मचारी उनकी आवभगत के लिए अक्षद (पीले चावल) लिए बैठे है। तांकि आते ही उनकी घेराबंदी शुरू की जा सके। और कोई नहीं तो ऑपरेटिंग का शेरा नए साहब का पीछा छोड़ने वाला नहीं है।
हे प्रभु, जगन्नाथम… ये सब क्या हो गया।

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