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ऑफिस केबिनों में रील फ़साद, बड़े साहब तो विफर गए… नेताओं में दबी-छिपी खींचतान, एक दूसरे को निपटाने की राजनीति….खिड़की दरवाजे टूटे-फूटे, घर ‘हवा-हवाई, ऑफिसर्स क्लब में लगेगी नई मशल्स मशीनें…. राधे-राधे बाबा अब दूर, आसक्ति के बजाय विरक्ति

न्यूज़ जंक्शन-18

रतलाम। इन दिनों मीटिंग व बैठकों में वीडियो बनाने का अच्छा खासा दौर चल रहा है। रेलवे अफ़सर अब केबिनों में बैठे घबराने व कतराने लगे है कि कौन पीछे बैठकर रील न बना लें। इसलिए अब सामान्य बातचीत में कोई कैबिन में मिलने आया। तब अफ़सर इन लीडर्स व नारेबाजों के मोबाइल को टापते रहते है।
इस नए खेल की शुरुआत एक महीने पहले दूसरी मंजिल पर कर्म वाले विभाग के तीसरे नंबर के अफ़सर से शुरू हुआ। नेताओं ने ‘कसेरा के केबिन को बसेरा’ ही समझ लिया था। जब तीन-चार जने उनसे मिलने पहुंचे तो साथ में नन्हा सा जिम वाला शरीर साधक भी था। इसके हाथ के मशल्स व बल्ले देखकर पीछे की कुर्सी बैठने को दे दी। लेकिन साहब को क्या पता था कि पीछे से ही बातचीत के वीडियो बन जाएगा। जब बात मार्केट में आई तो बाद में दूसरी पार्टी के लोग साहब के काम में फूंकने चले गए। कहा कि साहब दूसरे नेताओं ने आपके केबिन से इमरान खान जैसी बॉलिंग कर आपको बोल्ड करने की जुगाड़ लगा ली है। तब से ये साहब अब सामने कुर्सी पर बिठाते है तो पहले मोबाइल का एंगल देखते है कि कैमरा कहीं ऑन तो नहीं कर लिया है।
इसी तरह चार दिन पहले मुंबई से हेल्थ विभाग की बड़ी मैडम आई। तब भी नेताओं से चर्चा के दौरान किसी ने चुपके से उनसे बातचीत का वीडियो बना लिया। इसकी भनक मैडम को लगी तो वह बहु खूब लाल-पीली हो गई थी।
बड़ी बात तो तब हो गई कि बड़े साहब तथा अधिकारियों के साथ स्थाई तौर पर वार्ता जैसी एक बैठक चल थी। इसमें मजदूरों की मांगों को लेकर मुद्दा गरमाया था। तब एक नेता ने धीरे से मोबाइल का स्विच ऑन कर लिया। उस नेता भाई को पता नी क्या सूझी कि उसकी प्रेक्टिस ट्रेन चलाने की थी। लेकिन बैठक में मोबाइल कैमरा चलाने का शौक लग गया। अफसरों की चर्चा को ग्रुपों तक में वायरल कर दिया। बाद में भोले दिखने वाले बड़े साहब की तीसरी आंख खुली तो वे आग बबूला हो गए। उन्होंने 2 मिनट में तेज जलने वाले ‘दीपक’ की लौ बुझा दी। साहब की डाट से इन नेता को बुखार चढ़ गया। तब नेता को सैलाना बस स्टैंड जाकर ‘गुप्ता’ मेडिकल से गोली लाकर खानी पड़ी।
हे प्रभु जगन्नाथम, कुछ लोग कह रहे थे कि साहब लोगों को भी क्या पड़ी थी। बेचारे कैमरे ही तो चला रहे थे। अब साहब ने भी डीआरएम ऑफिस में कैमरे लगाए है। उनमें से आधे भी काम ही नी कर रहे है। उन पर ध्यान नहीं है और साहब की मोबाइल कैमरों पर निगाह चली गई। अगर कैमरे व निगाहें लगाना है तो टेंडर टेबलों पर ठेकेदार की डिलिंग वाले एंगल पर लगाए। ताकि वहां भी लिफाफों पर निगाहें पड़े।

नेताओं में दबी-छिपी खींचतान, एक दूसरे को निपटाने की राजनीति :- रेलवे राजनीति में कर्मचारियों का उद्धार करने वाले एक संगठन में नेताओं के बीच दबी-छिपी खींचतान अब सामने आने लगी है। एक नेता ने दूसरे नेता के छर्रे बिखेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कुछ छर्रे बिखरकर दूसरे पाले में चले गए। अब इंजिन वाले ऑफिस में भी कोई साथ-साथ नहीं दिखता।
पिछले दिनों जोरदार हिट हो गई। दो नेता आपस में बात करते हुए डेपुटेशन यानी प्रतिनियुक्ति के बारे में समझ रहे थे। एक ने दूसरे ने समझाया कि डेपुटेशन का अर्थ होता है कि नेताजी को रेलवे की नौकरी नहीं करना है। अपना पूरा समय संगठन में ही देना है। बल्कि संगठन ही रेलवे को डेपुटेशन के एवज का पैसा जमा करता है। ये आपस में समझ ही रहे थे कि तीसरे एक नेता को इसका लाभ भी मिल गया। इन नेताजी के चेहरे के प्रताप तथा मुस्कान को देखकर लगा कि अब बात चल निकली है। लेकिन खींचतान में थोड़े दिन बाद इसमें भी खेला हो गया। जो लाभ मिला था, वह चार दिन पहले कैंसल हो गया।

फिर पहले नेता ने दूसरे को कहा कि पगलें, तू समझता नही है। डेपूटेशन का लाभ तो बाहरी नेताओं को ही दिया जाता है। जो बेचारे सप्ताह में एक बार घर जा पाते है। मजबूरी में होटल की तंदूरी रोटी और स्पाइसी सेव-टमाटर की सब्जी खाते है। कभी-कभार भले ही किसी घर से देशी घी के पराठे का टिफिन आ जाए तो अलग बात है। लोकल लोगों को संगठन की डेपुटेशन जैसी सुविधा देने से क्या फायदा भाई…।
हे प्रभु, नेताओं की ऐसी खींचतान पहले कभी नहीं देखी। पहले कमल के फूल वाले आडवाणी जैसे एक बड़े नेताजी को घर बैठा दिया। अब किसी दूसरे की बारी लगती दिख रही है।

कुंजी साहब की नी चली, अब दिवाली के पहले खुद का बनवा रहे चैंबर:- कुछ महीने पहले कमाई वाले विभाग की बड़ी मेडम का लक्झरी ऑफिस चैंबर क्या बना, सबकी निगाहें पड़ने लग गई थी। मंडल के दूसरे नंबर के कुंजी साहब ने तो मैडम का चैंबर तक हथियाने की पूरी जुगाड़ जमा ली थी। कुंजी साहब पहली मंजिल उस लक्झरी ऑफिस के सामने से जब भी निकलते थे। तब डर के मारे कमाई वाले विभाग के सिपेसलार चैंबर का दरवाजा बंद कर देते थे।
अब कुंजी साहब ने जिद करके खुद के ही चैंबर को लक्झरी बनाने का जुगाड़ लगा लिया। हालांकि कुछ दिनों पहले ही साहब के चैंबर में “नेचर कॉल” के लिए वॉशरूम तैयार किया था। अब शायद इसे फिर से तोड़कर पूरे ही चैंबर को नया करने की तैयारी कर ली। इसकी मंजूरी देने वाले साहब ने सोचा कि चलों कुंजी साहब किसी लेने-देने में नहीं है। दूसरे किसी मामले में टांग भी नहीं अड़ाते है। इसलिए चैंबर बना दो तो खुश हो जाएंगे।
लेकिन हे प्रभु, इस तरह तो सरकारी धन का दुरुपयोग ही हो रहा है। साहब लोग भी होड़-होड़ में चल रहे है। कोई इनोवा मॉडल की कार लाए तो दूसरे को भी ऐसी ही चाहिए। कोई Xuv 700 कार लाया तो दूसरे को भी चाहिए। कोई स्कार्पियो में बैठा तो पहले को ऐसी ही होना। इनके देखदेख छोटे-मोटे साहब भी फार्म में चल रहे है। वे भी घर से ऑफिस आने-जाने में कार का उपयोग करने लगे। स्टाइल भी वो ही बड़े साहब जैसी। कार में बैठने के बाद किसी को  देखना नहीं। सीधे मोबाइल खोलकर नीचे गर्दन कर बैठ जाना…।

खिड़की दरवाजे टूटे-फूटे, घर ‘हवा-हवाई, ऑफिसर्स क्लब में लगेगी नई मशल्स मशीनें:- रेलवे का अनोखा ‘विकास model’ देखने को मिल रहा है। जहाँ कर्मचारी आने घरों में टूटे-फूटी खिड़कियों की मार झेल रहे है। वहीं अफ़सरों की सेहत चमकाने के लिए ऑफीसर्स क्लब परिसर में नया जिम तैयार किया जा रहा है।
दरअसल रेलवे कॉलोनी के आशियाने में आजकल सुरक्षा नहीं, बल्कि कुदरती हवा का नया ज़रिया बन गए हैं। रेलवे क्वाटर्स की हालत ऐसी है कि खिड़कियों के नाम पर पल्ले गायब हैं। दरवाजों को रोकने के लिए जुगाड़ की दरकार है। लेकिन दूसरी तरफ, रेलवे के ‘सिस्टम’ को अपनी फिटनेस की चिंता है। तभी तो ऑफिसर्स क्लब में एक आलीशान, हाई-टेक नया जिम तैयार किया जा रहा है। दो दिन की वार्ता वाली बैठक में कर्मचारियों के नेताओं ने ‘आयुष जी’ को खूब आड़े हाथ लिया।
नेता लोग बोले कि आम रेलवे कर्मचारी टूटते पलस्तर, टपकती छतों और बिना-कुंडी वाले दरवाजों को संभलते-संभालते परेशान हो गए है। वे सुधार करवाने के लिए आईओडब्ल्यू ऑफिस जाने का ‘वर्कआउट’ कर रहे हैं। वहीं नई जिम में लेटेस्ट वेट-लिफ्टिंग और ट्रेडमिल मशीनें सजाने की तैयारियां चल रही है।

राधे-राधे बाबा अब दूर, आसक्ति के बजाय विरक्ति:- राधे-राधे बाबा की आदतें देखकर अब इनके साहब लोगों ने इन्हें दूर करना शुरू कर दिया। हालात यह है कि बाबा आजकल अकेले ही आते-जाते है। जबकि पहले कभी अफसरों को घर लेने और छोड़ने तक की जिम्मेदारी इन्होंने अपने कांधे पर ले रखी थी। साहब लोगों ने सोचा कि बाबा तो हमारे काम ही लगवा देंगे। इसलिए बाबा की पूछपरख कम हो चली है।
हे प्रभु जगन्नाथम, ये सब क्या हो गया

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