शासकीय धन के दुरुपयोग का नज़ारा….रतलाम में रेलवे ट्रैफिक वर्कशॉप का बड़ा खेल, चवन्नी के सामान का 10 रुपए बिल
न्यूज़ जंक्शन-18
रतलाम। रतलाम रेलवे सिस्टम में इन दिनों ठेकेदारी प्रथा और घटिया सामग्री की सप्लाई दीमक की तरह जनता के टैक्स के पैसे को खोखला कर रही है। इस सिस्टम का मुख्य केंद्र है कमर्शियल व इंजीनियरिंग विभाग के अधीन ट्रैफिक वर्कशॉप।
वर्कशॉप का आलम यह है कि बाजार में जो चीज चवन्नी की मिलती है। रेलवे में उसके सीधे 10 रुपये (कई गुना अधिक) चुकाए जा रहे हैं। वह भी एकदम रद्दी क्वालिटी के लिए। भ्रष्टाचार का यह पूरा खेल चुनिंदा रसूखदार फर्मों के इर्द-गिर्द घूम रहा है। बाकी एजेंसियों को तो टेंडर प्रक्रिया से दूध में से मक्खी की तरह बाहर फेंक दिया जाता है।
यात्री सुविधाओं के नाम पर करोड़ों रुपए डकारने का यह केंद्र बना हुआ है ट्रैफिक वर्कशॉप। हालांकि पहले मुंबई विजिलेंस की टीम ने यहां औचक छापा भी मारा था। लेकिन रेलवे सिस्टम में हावी होती अफसरशाही के चलते कार्रवाई ज्यादा असरदायक साबित नहीं हुई। इस अफसरशाही में कुछ अफसरों को कमीशन का लाभ मिल रहा। लेकिन इनके साथ कुछ अर्दली या ख़ास सिपेसलार कर्मचारी भी भरपूर चांदी काट रहे है। शिकायतों के आधार पर पूर्व डीआरएम रजनीश कुमार ने जांच के निर्देश भी दिए थे।
घर तक पहुंचे समान, कई तो साथ भी ले गए:- ट्रैफिक वर्कशॉप को कमाई के अलावा अपनी सुविधाएं जुटाने का जरिया बना लिया गया है। हालात यह है कि कमीशनबाजी के अलावा खरीदी दबाव में कई अफ़सर सोफा, पलंग, गद्दे, आलमारी खुद के बंगले पर रखवाते है। बल्कि कुछ तो पूर्व अधिकारी ये समान अपने साथ तक ले गए। दूसरी ओर कमर्शियल विभाग में खरीदी से जुड़े क्लास थ्री कर्मचारी ने खुद इन सुविधाओं का दोहन किया। जानकारी मिली है कि पूर्व में वर्कशॉप की तिजोरिनुमा आलमारी पर शहर की पॉश कॉलोनी में रहने वाले एक कर्मचारी की निगाहें पड़ी।।इसे अपने घर तक पहुंचाया गया। लेकिन भारी भरकम आलमारी क्लास थ्री कर्मचारी के मकान की पहली मंजिल तक नहीं ले जाई जा सकी। इसलिए इसे वर्कशॉप लौटा दी। हालांकि कर्मचारी के यहां एंटीक श्रेणी का कैंडिल अभी भी घर की शोभा बढ़ा रहा है। यदि विजिलेंस घर के सामान को खंगाले तो रेलवे खरीदी के कई सामान घर से जब्त हो सकते है।
सिस्टम में ‘दीमक’: ऐसे चल रहा है टेंडर और खरीदी का झोल
– 15 हजार का सोफा 75 हजार में: बाजार में जो सोफा सेट 15,000 रुपए का आता है। रेलवे में उसकी खरीदी सीधे 75,000 रुपए में दिखाई जा रही है। 10-15 हजार की स्टील चेयर 48,000 रुपए में खरीदी गई।
– डिजिटल ढोंग: कहने को टेंडर प्रक्रिया ऑनलाइन है। लेकिन रसूखदार ठेकेदार खुद अफसरों के कंप्यूटर पर बैठकर टेंडर फार्मेट भरते हैं।
– चहेतों को सपोर्ट, बाकी आउट: अपनी पसंदीदा फर्मों की कमियों को अफसर खुद दूर करवाते हैं। जबकि कम रेट डालने वाली अन्य कंपनियों को मामूली तकनीकी कमी बताकर चुपचाप रिजेक्ट कर दिया जाता है।
– उपहार और कमिशन का बंटवारा: कंप्यूटर, प्रिंटर, गद्दे, अलमारी से लेकर हर छोटी चीज बाजार भाव से कई गुना ज्यादा रेट पर खरीदी जाती है। टेंडर पास करने से लेकर बिल क्लीयर करने तक, नीचे से ऊपर तक मोटा कमीशन और दीपावली ‘गिफ्ट्स’ बांटे जाते हैं।
– बिना जरूरत की शॉपिंग: इसी नापाक गठजोड़ की वजह से वर्कशॉप में हर महीने लाखों रुपये का सामान बिना किसी वास्तविक जरूरत के खरीदा और डंप किया जा रहा है।
