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मैं और मेरी कविता

‘न्यूज जंक्शन-18’ के रविवारीय स्तम्भ ‘मैं और मेरी कविता’ में इस बार कुछ बारिश से जुड़ी कविता का समावेश कर रहे है। इसके अलावा भी कुछ रचनाककर की सामाजिक सरोकार से जुड़ी रचनाएं भी पेश की जा रही है। रचनाकरों से हम अगले अंक में सावन मास व वर्षा ऋतु को लेकर कविताएं आमंत्रित कर रहे है। इससे कि पाठकों को इस मास के प्राकृतिक सौंदर्य को कविताओं के माध्यम से आल्हादित किया जा सके।

जलज शर्मा
212, राजबाग़ रतलाम (मध्यप्रदेश)।
मोबाइल नंबर 9827664010

रचनाओं के प्रमुख चयनकर्ता
संजय परसाई ‘सरल’
शक्ति नगर, रतलाम (मध्यप्रदेश)।
मोबाइल नंबर 9827047920
——

बारिश की नन्हीं बूंदें

बारिश की नन्हीं बूंदें
गिरती उछलती
मेरे आंगन में
मेरी बिटिया के
नन्हे कदम-सी
गर्मी से राहत देती
ठंडी-सी लहर
रूह में उतरती
पेड़ों संग झूमती हवा
खिड़कियों के
कान बजाती
रोशनी से टकराते
किट-पतंगें
बिजली की दैत्य
गड़गड़ाहट
शाम को आशियाने
ढुंढते पंछी
पहली बारिश में
भीगने को करता मन।

शिव चौहान शिव
183,राजबाग-2
रतलाम मध्यप्रदेश
—-

धरोहर सौप गये

कांटे उखाड़ लहूलुहान हुए ,वह तुम्हें उपवन सौप गये.
उनके उपकारों को ,कभी याद करके तो देखो.

देश के लिए सूरज बन, तपकर तो देखो
मातृभूमि की अगन में, कभी तपकर तो देखो.
सोचो यूँ ही देश, आजाद नहीं हुआ है
भगत आजाद मंगल, याद करके तो देखो.

मानव जीवन कब मिलता है बार बार
भारत माता का वंदन नित नमस्कार.
सीख जो तुमको दे गई ,आगे की पीढ़ी
तुम अपनी अगली पीढ़ी को दो, वह सीढ़ी.
देश पर मरना सबसे बड़ा धर्म, यह पाठ पढ़ो पढाओ.
भारत माता को देशभक्ति का, बाना चढाओ.
बंसती चोला सजेगा न्यारा, पहनकर तो देखो.

देश के लिए सूरज बन, तपकर तो देखो
मातृभूमि की अगन में, कभी तपकर तो देखो.
सोचो यूँ ही देश, आजाद नहीं हुआ है
भगत आजाद मंगल, याद करके तो देखो।

(नारायणी माया)
माया बदेका
उज्जैन (मप्र)

—–

प्यारी साइकिल

दो पहियों की प्यारी साईकिल
बिना ईधन के रहती गतिशील ।
बच्चे हो या बड़े सबकी शान
चेहरा खिलें सीखते साईकिल ।।

यातायात का साधन साईकिल
प्रदूषण रहित प्यारी साईकिल ।
न डीजल , न पेट्रोल का झंझट
पथ पर सरपट चलें साईकिल ।।

शरीर को देती ऊर्जा साईकिल
तन रहें तंदुरुस्त,स्वस्थ रहें दिल ।
मांसपेशियों को करें मजबूत
स्फूर्ति जगाती प्यारी साईकिल ।।

✍️ गोपाल कौशल
नागदा, जिला धार (मप्र)
मोबा. 99814-67300
——

तब जाना

जब जब चाहा जताऊँ आभार
उनका जिनकी सुधियों ने
बचाये रखा
मुझे मेरी उदासी से..
या लिख पाऊँ माफ़ीनामा,
जिनके वार दिये जाने पर भी अपना सर्वस्व,
पहुँचायी ठेस!

परंतु भाव,
कलम की नोंक से पहले ही सूख गए
या शब्द अटक गए हलक में ही…

और तब जाना
कि व्यक्ति अभिशप्त है
वक़्त निकल जाने पर/
गाड़ी छूट जाने पर/
प्रिय के मर जाने पर,
घुट-घुट मरने और
न कह पाने की टीस से जूझते रहने को..

अनुज पाठक
डोंगरे नगर, रतलाम (मप्र)

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