प्लाजा की प्लानिंग का खेल…., रतलाम-अलवर व्हाया सड़क मार्ग चलाई गई स्पेशल गाड़ी…, रंग वाली सेल्फी दे देकर थक गए बड़े प्रबंधक साहब…, रामजी के नाम पर पैसा खाया, अब होगी उल्टियां….
जलज शर्मा, रतलाम।
रेलवे स्टेशन पर इन दिनों नए प्लाजा के मैजिक गेम को देखकर हर कोई हतप्रभ व चकित है। हालांकि लोग वहां खाने-पीने आने लगे हैं। लेकिन प्लाजा की प्लानिंग की चर्चा मीनाक्षी एक्सप्रेस इंजिन मॉडल के रेलवे स्टेशन से लेकर नैरोगेज रेल इंजिन मॉडल वाले दो बत्ती ऑफिस तक होने लगी है।
इस बात को पहले जगन्नाथ इस तरह समझाना चाहते हैं कि ट्रेनों में यात्रियों की टिकिट चेकिंग सेवा में जुटे तमाम टीटीई बेचारे खाम-खा बदनाम हो रहे हैं। इनसे बड़े-बड़े गेम को अंजाम तो ऑफिस के सेक्शन में बैठे कुछ गैमलर कर्मचारी अपने अफसर की चापलूसी के जरिए दे रहे हैं। टीटीई को तो छोटी-मोटी शिकायतों पर सजा की तर्ज पर ऐसा बर्ताव किया जाता है, जैसे उनके ऊपर कोई लूट का केस दर्ज होने जा रहा है। ड्रेसकोड में घंटों अफसर के केबीन के बाहर इन्हें खड़ा कर दिया जाता है। जबकि ऑफिस की टेबलों पर बैठे असली डकैत तो हर दिन तथा हर माह अपना खेल दिखाकर महंगी गाड़ियों में सैर सपाटे कर रहे हैं।
अब हम आते हैं प्लाजा के गेम पर….। रेलवे स्टेशन पर खान-पीने का एक प्लाजा क्या खूला, इन्होंने वहां भी देव दिवाली मनाने की जुगाड़ जमा ली। अपने बोस को आगे कर लग गए अपने काम पर…। प्लाजा को लेकर मुख्य रूप से कानाफूंसी वहां बनाए गए आऊटलेट तर्ज की पहले छोर की दो शॉप तथा आखरी नंबर की एक शॉप को लेकर हो रही है। चलो, पहली और दूसरी नंबर की शॉप को हम छोड़ देते हैं। क्योंकि वहां तो बड़े बोस के परिवार के अधिकार से जुड़ा मामला है। लेकिन लास्ट नंबर पर लंच-डीनर की शॉप का वैभव तो देखते ही बनता है। शाम 6 बजे बाद छटा घंटों देखने को मिलती है। हालांकि वहां खाने पर बैठने वाले यात्रियों तथा शहरवासियों को आपत्ति होने लगी है।
दरअसल एक कर्मचारी रोज शाम को दो बत्ती वाले ऑफिस से छुट्टी के बाद आखरी छोर वाली आउटलेट शॉप पर प्लानिंग की जमावट करने पहुंच जाता है। इधर, बेचारे लोग पैसा खर्च कर खाना खाने बैठते हैं और वहीं रेलवे का वह कर्मचारी इधर, से उधर घूमकर प्लानिंग जमाता फिरता है। बाद में किसी ने जगन्नाथ को बताया कि यह दुकान तो महासागर है। इसलिए इस कर्मचारी ने खाने-पीने की दुकान में पार्टनरशिप है।
हे प्रभु, दूसरी लूटपाट इनसे कम पड़ रही थी जो इन्होंने प्लाजा पर भी हाथ आजमा लिया। लेकिन एक बात बता देते हैं…। इन सभी गेम की जानकारी अब सीधे चर्चगेट वाले ऑफिस से होते हुए बोर्ड वाले ऑफिस तक पहुंचने लगी है। इसलिए गेम का कभी भांडाफोड़ हो जाए तो बड़ी बात नहीं है।
रतलाम-अलवर व्हाया सड़क मार्ग चलाई गई स्पेशल गाड़ी:- रेलवे ने होली स्पेशल ट्रेनें चलाने की घोषणा की थी। लेकिन रेलवे में ही पिछले दिनों रतलाम से अलवर तक सड़क मार्ग से होती हुई एक स्पेशल गाड़ी (स्कॉर्पियो) भी चलाई थी। यह गाड़ी यात्रियों के लिए नहीं, बल्कि अफसर ने खूद अपने लिए ही चलवा दी। दरअसल ऑफिस आने-जाने या मंडल के शासकीय दौरे के लिए रेल मंत्री ने इन्हें गाड़ियों की सुविधा दी है। लेकिन साहब तो साहब ठहरे…। इन्होंने रेलवे को अपने घर का ट्रेवल बिजनेस समझ लिया। अपनी शासकीय चारपहिया गाड़ी उठाई और इसे लेकर सीधे अपने घर यानी भजनलाल सरकार के राजस्थान में अलवर के पास अपने गांव के लिए रवाना हो गए। वहां घरवालों से मिल जुलकर साहब रतलाम आ तो गए। लेकिन यहां लॉक बुक की सेटिंग करने में मैकेनिकली अड़चने आ रही है। वो चाह रहे हैं कि गाड़ी के डीजल का शासकीय बिल लग जाए। बाकी रास्ते में चाय-पानी व खाने के पैसे तो छोटे-मोटे ठेकेदार के हवाले है ही….। हे प्रभु, जब तक बड़े साहब एक्शन में नहीं आएंगे, तब तक उनकी नाक के नीचे सब कुछ ऐसा ही होता रहेगा। क्या करें बड़े साहब बहुत सीधे है..।
रंग वाली सेल्फी दे देकर थक गए बड़े प्रबंधक साहब:-कहते हैं कि होली छोटे-बड़ों का भेद मिटा देती है और पराए सभी अपने हो जाते हैं। इसी होली के रंग के बहाने रेल मंडल के बड़े प्रबंधक साहब से निचले कर्मचारी लोग खूब चिपके रहे। हर बार की तरह साहब ने बंगले पर आने-जाने वालों की शान में रंगारंग पार्टी के इंतजाम किए थे। बस, फिर क्या था…। जिसको इसकी सूचना मिली वो सीधा साहब के बंगले की ओर निकल लिया।कोई रेल नेताओं के पीछे-पीछे तो कुछ अकेले ही अंदर घूस गए। खाया-पीया और बारी फोटो खिंचाने की आई तो इन्होंने साहब को परेशान कर डाला। जो कर्मचारी कभी साहब के चेंबर के अंदर मिलने को तरसते हैं, वे होली के बहाने उनके गले लगने में कामयाब हो गए। किसी ने कांधों पर हाथ रखकर सेल्फी ले डाली तो कोई साहब के साथ डांस भी कर उठा। हालांकि साहब अंदर-अंदर सोचकर कह रहे होंगे कि बेटा अभी जितनी होली खेलना है, खेल लें। ऑफिस के काम में कोई गलती मत कर देना। वरना, मेरे आलम पूछ लेना इंदौर जाकर…।
हे प्रभु जिस तरह से लोगों ने साहब के बंगले में होली खेलने में आतुरता व मग्नता दिखाई। ऐसे ही संगठनों की आड़ में मक्कारी करने के बजाय शासकीय काम को पूरा करने में मन लगाए तो रेलवे खूब फायदें में आ सकती है।
रामजी के नाम पर पैसा खाया अब होगी उल्टियां:- यह तय है कि दो साल पहले अयोध्या यात्रा के लिए जाने वाले यात्रियों के चाय-नाश्ते के नाम पर कमीशन खाने वालों को रामजी माफ नहीं करने वाले हैं। पिछले दिनों इसकी पोल खोली तो ख़बर का मामला सीधे मुंबई नगरी तक पहुंच गया। हालांकि रामजी के नाम का पैसा दो साल बाद भी पच नहीं पाया है। अब लग रहा है कि मुंबई वाले इनसे जल्दी ही नमक का पानी पीला-पीलाकर उल्टियां करवाएंगे।
हे प्रभु, राम मंदिर निर्माण में कई लोगों ने चंदा दिया होगा। लेकिन वहां की यात्रा के लिए कमीशन का धंधा बनाकर पैसा डकारने वाले जल्दी ही सामने आएंगे।
थमने के बजाय बढ़ गया शेरा का घेरा:- पिछले दिनों सोशल मीडिया न्यूज़ चैनल पर खबरें आने के बाद रेलवे के शेराओं से उनके आकाओं ने दूरी बना ली थी। लेकिन इन ‘शेरा का घेरा’ अब दोबारा बढ़ने लगा है। एसएंडटी विभाग का शेरा भी अलग नी मान रहा है। खूद को थामने का नाम भी नहीं ले रहा है। हालांकि करें तो भी क्या करे बेचारा..। शाम होते ही उनके आका यानी एसएंडटी वाले बड़े साहब काम में जुटा देते हैं। बेचारा शेरा पहले तो साहब की स्कॉर्पियो में बैठकर बंगले पर साथ जाता है। फाटक खोलकर साहब और बच्चों को उतारकर जैसे-तैसे दो बत्ती ऑफिस आता है। यहां एक और छोटी मेडम तैयार खड़ी रहती है। बाद में बाइक पर एसएंडटी वाली छोटी मेडम को छोड़ने जाना पड़ता हैं।
हे प्रभु, ऐसे आलम त्रेता युग में राजा-महाराजाओं के भी न रहे होंगे। नहीं तब ऐसे नजारें कभी देखें गए होंगे।
