न्यूज जंक्शन-18 में इस रविवार को हम चार रचनाकारों की रचनाएं आपके सम्मुख पेश कटने जा रहे है। हर बार की तरह हमारे काव्य स्तम्भ को ये ही रचनाकार अपनी उम्दा रचनाओं के माध्यम से मजबूत प्रदान कर रहे है। हमारा दायित्व है कि इस विधा को क्रमशः आगे बढ़ाया जाए।
जलज शर्मा
संपादक, न्यूज जंक्शन-18
212, राजबाग रतलाम मप्र।
मोबाइल नंबर 9827664010
रचनाओं के प्रमुख चयनकर्ता
संजय परसाई ‘सरल’
118 शक्ति नगर, गली नंबर 2, रतलाम
मोबाइल नंबर 9827082998
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आशियाना
घर अपना हो, जहाँ तन्हाई नहीं! बल्कि महफ़िलों का गुलदस्ता हो, आंगन अपने घर में हो,
फ्लेट बन रहे हैं अच्छे ख़ासे…
मन नहीं चाहता वो, हो
आशियाना मेरा कुछ खास हो,
उसमें होती चार दीवार, नहीं कोई खास बात
बालकनी भी चाहिए जहाँ चार दोस्तों का साथ रहे,
रोने के लिए एक कोना चाहिए!
जहाँ कोई चुप करा सके, “प्यार से बैठाकर समझा सके”
ठंड की महकती फिजाओं में यादों की करवटें बदल सके।
पुरानी यादों से धूल झटका सके। किताबों के गुलाब को पढ़ सके। महकती आशिकी सजा सके,
ऐसा एक आशियाना चाहिए।
चार दिवारों में घूमते हुए घूटन होती हैं, अकेले तन्हाई में सहम जाता है! दिल इस घरोंदे में एक खुबसूरत झरोखा चाहिए।
बनते-बिगड़ते रिश्तों को पड़ोसी का अपनापन चाहिए।
फ्लेट, नहीं सपनों का घर आंगना
चाहिए।
तन्हाइयों में घर का अपने एक एहसास चाहिए।
चार दिवारी नहीं खुशियों का आशियाना चाहिए।
आंगन चाहिए…
-सौ.निशा बुधे झा “निशामन”
जयपुर 9950796609
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हार
फसलों को निहारते
मुस्कुराते किसान की
खुशियां हो जाती रफूचक्कर
जब हो अतिवृष्टि कहर
प्राकृतिक आपदाओं का
सामना करता किसान
इनके आगे हार जाता
उसके सपने और उम्मीदों की
बोनी उड़ान से
सपने बिखर जाते
उड़ान भरता
मरती फसलों को बचाने की
मगर उसकी बोनी उड़ान
हार से नहीं बचा सकती
आपदाओं के आगे
उसकी उड़ान से
आर्थिकता के सूरज से
पंख जल जो जाते
कर्ज की तेज आंधी
उसके जीवन की उड़ान को
बोनी कर
संघर्ष से हार कर
आपदाएं विपदा बढ़ा जाती।
-संजय वर्मा ‘दॄष्टि ‘
मनावर,धार (मप्र)
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मैं नहीं जानता
मै नही जानता था
कि अन्धेरा क्या होता है
बचपन मे कहां पहचान पाते हैं अन्धेरे को
तब तो जिन्दगी रोशनी से भरी होती है
मां से अक्सर अनजाने में कहा करता था कि
तुम्हे दिखाई नही देता क्या
मां होैले से मुस्कुराती तब मुझे लगता
कि मां कि पलकें भीगी होतीं थीं
क्योंकि पिता जो नही थे ………..शायद ……..
तब लगता कि शायद आसुओं के
पीछे अन्धेरा होता होगा..
तब से आज भी अपने शब्दों के अपराध बोझ से दबा हुआ हूं मैं…
तभी भैया ने भी अलविदा कह दिया…
तब मुझे अहसास हुआ कि पिता का साया
कैसे उठ्ता है
और मैं रुबरु हुआ अँधेरो से
नही समझ पाया आसुँ ही अन्धेरे का सबब हैं
या
अन्धेरा आसुओं का सबब है….
मां को दिन ब दिन बिखरता देखता और
अपनी पलकों पर पता नहीं कहाँ से
आसुओं को खड़ा पाता
फिर कुछ एैसा हुआ कि
बाबुजी …भैया… की तरह मां ने भी
जिन्दगी से नाता तोड लिया..
आज जब मां नहीं है तो अब रोज़
महसूस होता है कि अन्धेरा क्या होता है
सच मां तुम हम सबके जीवन की रोशनी थीं …….
हम सबको आज भी डर लगता है अन्धेरों से….
बहुत डर लगता है…….
एक श्रद्धान्जलि माँ को….
-मयूर व्यास
142,अपनाघर
इंद्रलोक नगर रतलाम
87180-72729
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तालाब का पानी
बहुत दिनों से,
शांत था,
तालाब का पानी।
तभी,
तभी समय अचानक,
उछाल देता है एक कंकर,
या आ जाता एक हवा का झोंका।
तब कर देता है स्थिरता भंग,
और उठ जाती है,
सहसा,असंख्य लहरें तालाब में ।
वैसे ही,
बहुत दिनों के बाद,
मिलने पर कोई शख्स,
उठा देता है,
असंख्य यादों की लहरें।
या झंझोड़ देता है
जमी हुई पर्तों को।
तब बैचेनी उठ आती है वैसे ही,
जैसे सिहर उठता है,
तालाब का पानी।
-नरेन्द्र सिंह पंवार
डोंगरे नगर,रतलाम (मप्र)।