प्रस्ताव की मंजूरी पर मेडम ने लगा दिया अड़ंगा…, सीसीटीसी कैडर के बल्लेबाज अब बैठेंगे पैवेलियन में…?, ऐसे हैं कर्मचारी राजनीति के धुरंधर नेता जमील जमाली, किसके सामने क्या…
जलज शर्मा,
रतलाम। इन दिनों रतलाम रेल मंडल को रतलाम रेल ठेकेदार मंडल भी कहा जा सकता है। क्योंकि जिस तरह से यहां यात्रियों व कर्मचारियों की सुविधा के नाम पर स्टेशन सहित कार्यालयों में अनाप-शनाप डेवलपमेंट के काम खोले जा रहे हैं। इसमें कर्मचारियों तथा यात्रियों का भला तो कम, जबकि इसका सीधा फायदा इन कामों के ऑर्डर देने वालों व निपटाने वाले ठेकेदारों का ज्यादा हो रहा है। इंजीनियरिंग करके यहां पहुंचे एक साहब ‘को’ तो इसके धड़ाधड़ प्रस्ताव तैयार करने की मास्टरी है। ये प्रस्ताव मंजूरी के लिए वित्त वाले विभाग को भेज रहे हैं।
दरअसल साहब की दुकान सिमटने में एक साल भी नी बचा है। यहां से जितना कमाकर सौर सको, उतना सौर लो…..। बाद में कहीं भी ठेकेदारी मंत्रीमंडल जमात के नी तो रतलामी ‘मोदी’ मिलेगा, नहीं इतने ‘रायल’ लोग मिलेंगे। चूना नही पोत पाओगे। “नंदू (बा) सबका बंधु” जैसे तो ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे…।
हालांकि अब पासा उल्टा भी पड़ने लगा है। क्योंकि आयुष जी के बगल छोर में बैठने वाली वित्त वाली बड़ी मेडम को इन प्रस्तावों की भनक व इनके पीछे की मंशा अच्छे से समझ में आने लगी है। इसलिए मेडम ने आटी डालना शुरू कर दी।
हालांकि मेडम के पहले वित्त वाले एक साहब तो आसानी से इन फाइलों को कैरम की गोटी की तरह पटिए के होल में डलवा देते थे। इन फाइलों पर फौरन ही मोहर अंकित कर देते थे। जहां से जो आना है, वो तो बैठे-ठाले बगैर बल्ला धुमाएं ही आ जाता था। सो..मनी सभी के जेब में पहुंच जाता था। छोटे से लेकर बड़े-बड़े सभी खुश थे….। अब इंजीनियरिंग के दिमाग की कमाई से वित्त वाली मेडम को ज्यादा लेना-देना नहीं है। मालवा में कहावत है, थारी सुणु नी म्हारी, कश्मीर हो या कन्या कुमारी…।

सीसीटीसी कैडर के बल्लेबाज अब बैठेंगे पैवेलियन में, 12वें खिलाड़ियों को मिलेगा मौका:- मार्च का महीना तकरीबन लग गया है। इसलिए इंजन वालें ऑफिस से छुकछुक गाड़ी में टिकिट जांचने वालों के तबादलों का दौर भी चलेगा। इसकी आहट से सीसीटीसी कैडर के कुछ टिकिट चेकिंग वाले बल्लेबाजों का टेंशन बढ़ने लगा है। यदि उन्हें ऑफिस में बैठा दिया तो मैच में दूसरी बार कब बल्लेबाजी करने का मौका मिलेगा, यह कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। दरअसल बड़ी मेडम ने मंडल के सभी सीटीआई ऑफिस के सुपरवाइजर्स को ट्रेन ड्यूटी के बल्लेबाजों के नामों की सूचि तलब करवाने के आदेश दिए है। यह जांचने के लिए कि चार साल से अधिक की अवधि तक कौन खिलाड़ी लगातार बल्लेबाजी कर रहा है…। पेसेंजर कम्प्लेन में किसका रन रेट अव्वल है…। बाउंड्री के नजदीक जीएमएच शॉट लगाने पर कितनी बार एंपायर (विजिलेंस) ने ऊंगली उठाई…। आउट किया या वार्निंग दी गई।
तलब की गई ऐसी जानकारियों का मैसेज जब सार्वजनिक हुआ तो धुंआधार बल्लेबाजों में खलबली मच गई। इस बीच इन्होंने अपने ब्रोकर्स के माध्यम से गेम को अपनी झोली में डालने के खूब जतन शुरू कर दिए है। इधर, तबादलों की तैयारियों के बीच हाल ही में एक खिलाड़ी को ट्रेन से उतारकर सीधा टिकिट बुकिंग की विंडो में बिठा दिया। वो अब विडो से बैठकर ट्रेनों के लिए आते-जाते साथी बल्लेबाजों को देखकर हिंजर रहा है।
इसलिए भी टीम के मुख्य बल्लेबाजों का टेंशन और भी बढ़ गया है। संभावना है कि क्रिकेट का यह खेल मिक्की माऊस गेम से आगे बढ़कर क्रिकेट बोर्ड डायरेक्टर यानी बड़ी मेडम तक पहुंच गया होगा….।
ऐसी हलचल देख जो ऑफिस में बैठकर टिकिट चेकिंग की ड्यूटी में पहुंचने के सपने संजो रहे हैं। उन्हें जरुर राहत मिल रही होगी। इन सबके बीच इस कैडर की महिला खिलाड़ियों को भी जरुर संतोष मिलेगा। क्योंकि वे तो अपनी व्यथा किसी को बता भी नहीं सकती है। कोई जेक-जरिया नहीं। उनकी सुनवाई करने वाला अभी तक आगे नहीं आया…। तबादलों के माहौल से खुश ये महिला बल्लेबाज जरुर यह गीत का रही होगी कि ‘मैं हूं खुशरंग हीना…। प्यारी…खुशरंग हीना। जिंदगानी में कोई रंग नहीं मेरे बिना…। मैं खुशरंग हीना’…।

कर्मचारी राजनीति के धुरंधर नेता जमील जमाली, किसके सामने कैसा, किसके सामने क्या:- रेल इंजन वाले विभाग में कर्मचारी राजनीति के नेता सेम टू सेम प्योर धुरंधर फिल्म के नेता जमीन जमाली की तरह ही पेश आ रहे है। लगता है कि धुरंधर फिल्म के डायरेक्टर ने इन नेताओं को सर्च कर ही जमाली का रोल रचा होगा। अपने नंबर बढ़ाने के लिए किसके सामने क्या बोले, किसके सामने क्या पट्टी पढा दें..। इनका कोई भरोसा नही। इतना ही नहीं, पब्लिक के सामने तेवर दिखाने वाले इन नेताओं की साहब के चेंबर में तूती अलग हो जाती है। हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर खड़े रहते तो जगन्नाथ ने भी इन्हें कई बार देखा है। एक समय था जब नेता गर्ग सॉरी गर्व (शाब्दिक त्रूटि है, कृपया गर्ग को गर्व पढ़ा जाए) के साथ अफसर के चेंबर में जाते थे। ताल ठोककर कर्मचारियों के काम करवाकर लौटते थे। कोई गुरु गोविंद की तर्ज पर अपने स्टेशन वाले ऑफिस के लेंडलाइन फोन से सीधे बड़े साहब को फोन लगाकर चमका देता था। अब तो नेताओं की अनोखी तीसरी दुनिया है। किसी के काम हो न हो…। हांहांहां, हांहांहां कहते हुए सभी हो हरी झंडी दिखाते चलते आगे बढ़ जाते हैं। कुर्सी घेरकर बैठे एक नेता तो कमाल ही है। पहले तो वे अकेले इंजिन वाले ऑफिस आते नहीं है। इन्हें डर रहता है कि साहब के केबीन में दूसरे नेता कहीं अकेले झांकी न जमाकर आ जाए। गलती से अकेले ऑफिस आ भी गए तो केवल इसलिए कोना पकड़कर खड़े रहते हैं कि कोई उन्हें देख लेगा तो जबरन काम थोप देगा।
हे प्रभु, बेचारे भोले-भाले कर्मचारी जाए तो किसके पास जाए…। ये समझते हैं कि चंदा लेने वाला बंदा कम से कम हमारा तो होगा ही…। लेकिन राजनीति के खेल में यह मतिभ्रम है। कोई किसी का नहीं है। सभी स्वार्थ से एक-दूसरे से या किसी संगठन से जुड़े है। किसी को नौकरी बचानी है तो किसी को अपने ठेकेदारी चलानी है।

वाट्सएप पर ब्लॉक व ब्लू लाइन की कहानी…रेल महकमें में अधिकारियों को फोन व सरकारी सीम इसलिए दी गई है कि कोई सार्वजनिक तौर पर इनसे संपर्क कर अपनी समस्या को हल करवा सकें। लेकिन अफसरों ने इसे अपनी झंझट व अपनी बेहतर गुजारी में बाधा मान लिया है। वाट्सऐप पर किसी ने ग्रीन लाइन का ऑप्शन ही गायब कर दिया तो किसी ने सिंगल राइट के सिंबोल की सेटिंग कर ली। ताकिं मैसेज भेजने वालों को पता भी नहीं चले कि उन्होंने उनके मैसेज को पढ़ा या नहीं….। यात्री सहित आम व्यक्ति इन्हें गलती से फोन लगा भी दें, तो रिसिव करना दूर, कॉल बैक भी नहीं किया जाता। कोड ऑफ कंडक्ट की आड़ में अपनी बेहतर गुजारी के खेल की जानकारी अब मुंबई वाले बड़े साहब तक पहुंच गई है। जगन्नाथ को ऐसी ही जानकारी मिली है कि अब अफसरों को हर कॉल उठाना अनिवार्य होगा। सोशल मीडिया रिलेशनशिप को मजबूत बनाने वाट्सएप को ग्रीन लाइन ऑप्शन में रखना भी जरूरी रहेगा। सरकारी सीम है तो आप किसी का नंबर ब्लॉक भी नहीं कर सकते हैं।
हे, प्रभु सार्वजनिक लोक सेवक का पद लेकर बैठे हैं तो समस्याओं का हल करना भी जिम्मेदारी है। फोन लगाने पर ठेकेदारों के अलावा आम लोगों को रिस्पोंस देकर जवाब भी देना पड़ेगा।
