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‘फील्ड’ के सिपाही बने ‘ऑफिस’ बाबू… रेलवे विभागों की हाजरी में बड़ा गड़बड़झाला, मस्‍टर चेक अभियान में खुली पोल

न्‍यूज जंक्‍शन-18

रतलाम। भारतीय रेल के रतलाम मंडल कार्यालय में इन दिनों एक अनोखा “कर्म विभाजन मॉडल” चर्चा का विषय बना हुआ है। जिन टेक्नीशियनों के कंधों पर रेलवे के फील्ड में जाकर ट्रेनों के विद्युत उपकरणों को दुरुस्त रखने तथा ट्रैक रखरखाव व मरम्‍मत की जिम्मेदारी है। वे मंडल कार्यालय की चारदीवारी में बैठकर फाइलों की धूल झाड़ते नजर आ रहे हैं। बंगलों पर अफसरों के पारिवाकर कामकाज देख रहे हैं। वहीं, फील्ड में काम करने वाले कर्मचारियों को कम संसाधनों और सीमित स्टाफ के साथ डयूटी जिम्मेदारी निर्वहन के लिए जुझना पड़ रहा हैं।  

दरअसल कार्मिक विभाग द्वारा 19 फरवरी से अलग-अलग विभागों के मस्‍टर चेक अभियान चलाया गया। जांच में कुछ विभागों में तो घोर लापरवाही तथा ढेर खामियां निकली। विशेष तौर पर इंजीयिरिंग एवं इलेक्‍ट्रिक पॉवर विभाग इसमें अव्‍वल निकला। चूंकि यह डीआरएम या जोन स्‍तर के निर्देश मिले होंगे। इसलिए सीनियर डीपीओ अविनाश कुमार ने औचक मस्‍टर जांच अभियान को अंजाम दिया। इसके बाद एपीओ तथा डीपीओ को इसकी जिम्‍मेदारी सौंपी गई।

पाठकों को यह भी बता दें कि इन्‍हीं बिंदूओं पर न्‍यूज जंक्‍शन-18 द्वारा समय-समय पर खबरों का प्रकाशन किया गया। जल्‍दी ही फर्जी अवकाश के आवेदन को लेकर भी खुलासा किया जाएगा।

सूत्रों की मानें तो रेलवे के विद्युत विभाग के कई टेक्नीशियन, जिनका असली रणक्षेत्र रेलवे का फील्ड होना चाहिए। वे इन दिनों कार्यालय में बाबूगिरी का हुनर आजमा रहे हैं। खास बात यह है कि इनमें कुछ ऐसे कर्मचारी भी शामिल हैं, जिनकी प्रशिक्षण अवधि चल रही है और जिन्हें अभी फील्ड की बारीकियां सीखनी चाहिए। उन्हें फील्ड की बजाय फाइलों के पन्ने पलटने का अनुभव दिया जा रहा है।

“मेहरबानी” का असर या प्रशासनिक चमत्कार? :- रेलवे के गलियारों में यह चर्चा भी आम है कि कुछ कर्मचारियों को यह “विशेष सुविधा” वरिष्ठ अधिकारियों की कृपा दृष्टि से प्राप्त हुई है। विशेष रूप से लेफ्टिनेंट धर्मेंद्र कुमार प्रजापति, वरिष्ठ मंडल विद्युत इंजीनियर, और पीयूष पांडे, वरिष्ठ मंडल इंजीनियर (समन्वय) के नाम कर्मचारियों की जुबान पर हैं। हालांकि इस पर कर्मचारी खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। “बिना आग के धुआं नहीं उठता” वाली कहावत यहां सटीक चरितार्थ होती नजर आ रही है।

बताया जाता है कि इस “कृपा छाया” का लाभ कुछ महिला टेक्नीशियनों को भी मिला है। ये फील्ड की कठिन ड्यूटी के बजाय ऑफ‍िस में बैठकर अपनी कार्यालयीन सेवाएं दे रही हैं। इधर, फील्ड में कार्यरत कर्मचारी सवाल उठा रहे है कि क्या अब रेलवे में काम का बंटवारा योग्यता से ज्यादा “सुविधा और संपर्क” के आधार पर ही हो रहा है?

ट्रैकमैन भी पहुंचे ‘आरामगाह’ व्‍यवस्‍था  में:- यह व्यवस्था केवल विद्युत विभाग तक सीमित नहीं है। इंजीनियरिंग विभाग के कुछ ट्रैकमैन, जिनका कार्य रेलवे ट्रैक की निगरानी करना है, वे भी कार्यालय में कार्य करते हुए देखे गए हैं। जहां एक ओर कुछ ट्रैकमैन धूप, ठंड और बारिश में रेलवे की सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ कर्मचारी कार्यालय में आरामदायक कार्यकर बेहतर समय बीता रहे है। ऑफ‍िस के अलावा लगभग एक दर्जन से अधिक तो विभाग के बंगलों पर पारिवारिक सेवाओं में तैनात है।

स्थापना विभाग की नजर पड़ी, तो खुलने लगे राज:- सूत्रों के अनुसार, स्थापना विभाग द्वारा मंडल कार्यालय में उपस्थिति और कार्यस्थल का सत्यापन किया गया। जांच के दौरान कई ऐसे कर्मचारी पाए गए, जिनकी तैनाती फील्ड में होनी चाहिए थी, लेकिन वे कार्यालय में कार्यरत थे। कुछ मामलों में उपस्थिति पत्रक में भी ऐसे समय दर्ज पाए गए, जो विभागीय सांठगांठ की ओर इशारा करते नजर आए।

बताया जाता है कि कुछ कर्मचारियों द्वारा नियमित रूप से शनिवार का अवकाश भी लिया जा रहा था। जबकि उनकी कार्यप्रणाली और तैनाती इस व्यवस्था से मेल नहीं खाती थी। इससे प्रशासन के कान खड़े हो गए हैं और अब मामले को गंभीरता से लिया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर इलेक्ट्रिक पावर विभाग के मस्‍टर की और इसकी तैयार की गई। जांच रिपोर्ट को देखा जा सकता है। रिपोर्ट में सीनियर टीसीएन नरेंद्र शर्मा (अवकाश एलएपी), टीसीएन प्रभाजोत कौर (अवकाश एलएपी), टीसीएन वीरेंद्र सिसोदिया, टीसीएन दीपक बौरासी, एपीपी उमा पाटीदार, उज्‍ज्‍वल दुबे के नाम अंकित किए गए। इनके बारे में रिपोर्ट में दर्शाकर पूछा गया कि इन कर्मचारियों से कितने सालों से क्‍या काम लिया जा रहा है। इसमें से दो कर्मचारी ग्रुप डी के है। सवाल खड़े किए गए कि इनसे कार्यालय में काम कराने का क्‍या औचित्‍य है। इनके बारे में जांच के दौरान कोई भी ड्यूटी लिस्‍ट जारी नहीं की गई। जो टेक्निकल स्‍टॉफ है, उनके कार्यालय में सुबह 8.30 बजे ड्यूटी करते है। इसके बाद अपनी ड्यूटी बजाने मंडल कार्यालय में लिपिकीय सहित विभागों में दिए गए काम करने चले आते हैं।

रेलवे संचालन पर पड़ सकता है असर:- विशेषज्ञों का मानना है कि यदि टेक्नीशियन और ट्रैकमैन जैसे महत्वपूर्ण कर्मचारी फील्ड से हटकर कार्यालय में कार्य करेंगे, तो इसका सीधा असर रेलवे के रखरखाव और सुरक्षा पर पड़ सकता है। फील्ड में अनुभव और समय पर मरम्मत रेलवे की रीढ़ मानी जाती है। इसमें किसी भी प्रकार की कमी भविष्य में गंभीर परिणाम ला सकती है।

जांच की आहट से बढ़ी बेचैनी:- फिलहाल स्थापना विभाग द्वारा मामले की प्रारंभिक जांच की जा चुकी है और आगे की कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। रेलवे प्रशासन की चुप्पी फिलहाल “तूफान से पहले की शांति” जैसी प्रतीत हो रही है। कर्मचारियों के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि आने वाले दिनों में इस मामले में कोई बड़ा फैसला सामने आ सकता है।

अब देखना यह है कि यह मामला “नौ दिन चले अढ़ाई कोस” साबित होता है या फिर प्रशासन वास्तव में सख्त कदम उठाकर व्यवस्था में पारदर्शिता लाता है। फिलहाल मंडल कार्यालय के गलियारों में यही चर्चा है कि रेलवे में काम से ज्यादा “किसकी छत्रछाया में कौन है”, यह ज्यादा मायने रखता नजर आ रहा है।

विजिलेंस एंट्री की संभावना:- प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, यदि प्रारंभिक जांच में अनियमितताओं की पुष्टि होती है, तो मामले को विजिलेंस विभाग को सौंपा जा सकता है। रेलवे में कार्य आवंटन और उपस्थिति से संबंधित नियमों का सख्ती से पालन किया जाना आवश्यक है, क्योंकि इसका सीधा संबंध रेल संचालन की सुरक्षा और दक्षता से होता है।

रेलवे प्रशासन द्वारा मामले की विस्तृत जांच किए जाने की संभावना है। अधिकारियों का कहना है कि यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

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