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आंसभरी, आँखों देखी…धरम जी की शूटिंग के वो चार दिन, झलक पाने सैकड़ों दिल धड़कते रहे, आंखे निहारती, काम के प्रति सिखाया समर्पण

जलज शर्मा,

न्यूज़ जंक्शन-18। वर्ष 1983-84 का वह ठिठुराता सर्द मौसम, सैलाना नगर में सुनहरी यादों के वो चार दिन…। हजारों आंखें केवल धरम जी की एक झलक भर पाने तकिया रही थी। हर दिल का अरमान था, मन में केवल एक ही चाह थी। धरम जी को बस एक बार देख भर लें। हालांकि धरम जी ने प्रशंसकों के अरमान को पूरा किया।
धरम जी की सादगी व काम के प्रति उनकी निष्ठा को क़रीबी से निहारने का मुझे भी मौका मिला था। जब वे फ़िल्म निर्माता राजकुमार कोहली की शूटिंग यूनिट के साथ रतलाम जिले के खूबसूरत नगर सैलाना आए थे। यहां कैक्टस गार्डन सहित कुछ सीन मोहल्ला के फिल्माए जाने थे।
मैं उस वर्ष बालक हायर सेकेंडरी स्कूल बिल्डिंग में मीडिल क्लास का छात्र था। स्कूल में सुबह की शिफ़्ट थी। सुबह हम स्कूल गए, तब नगर पालिका की सफाई गैंग सड़कों की सफाई में मुस्तेदी से सक्रिय थी। नज़ारा देखकर ज्यादा कुछ समझ नहीं आया कि क्या तैयारी चल रही है।
तथापि अखबार में एक दिन पहले खबर आई थी कि फ़िल्म रांका और शाका (‘जीने नहीं दूंगा’ का प्रारंभिक नाम) की मप्र के मांडवगढ़ के बाद सैलाना में भी कुछ सीन की शूटिंग होगी। चूंकि बाल्यकाल में अखबारों की न्यूज़ से वास्ता कम ही था। इसलिए शूटिंग की खबर से अनभिज्ञ थे।
उस दिन स्कूल से दोपहर 12 बजे बाद उछल-कूद करते टोलियों के रूप में घर पहुंचे। कांधे पर लट्ठा कपड़ा से बना स्कूल बस्ता जैसे ही घर आकर पटका। तब हमारे मोहल्ला से ही पता चला कि फ़िल्म एक्टर धर्मेंद्र व शत्रुघ्न सिन्हा सैलाना आए है। किसी फ़िल्म की शूटिंग चल रही है। भागते-भागते पास ही में रंगवाड़ी मोहल्ला गए।
यह देखना भी अचरजभरा था कि फ़िल्म यूनिट के लोग कच्ची मूली खा रहे थे। कुछ अजीब सा लगा। क्योंकि खाने की डाइट में तब सैलेड नहीं हुआ करता था। मूली केवल सब्जी के लिए उपयोग में आती थी। खेर, रंगवाड़ी मोहल्ले की शूटिंग देखी। पहली बार रुपहले पर्दे की चमक के पीछे कलाकारों की मेहनत देखना मिली। कैमरे सहित शूटिंग उपकरण से रूबरू हुए।
अगले दिन विरासतकालीन महल के अंदर शूटिंग होना थी। स्वाभाविक है कि ख़बर पूरे जिले में हवा की तरह फैल गई थी। उस दौरान टीवी का दौर भी ठीक से शुरू नहीं हुआ था। फिल्में एक विशेष ट्रेंड के मुताबिक केवल टॉकीज में देखी जाती थी। ऐसे में फ़िल्मी कलाकारों को देखना स्वप्न व उनसे रूबरू होना आम लोगों के लिए कोसों दूर की बात थी।
खबरें आम हुई तो दूसरे दिन सैलाना नगर में जैसे शूटिंग देखने वालों का मेला लग गया। रतलाम मुख्यालय सहित आसपास एरिया से सैकड़ों युवा अपने हीरो को निहारने साइकिल से सैलाना जा पहुंचे। महल के दोनों बड़े मुख्य गेट बंद कर दिए गए थे। सुरक्षा के लिहाज से पैलेस के अंदर व बाहर भारी पुलिस बल मुस्तेद था।


जैसे-तैसे मैं अपने साथियों के साथ महल के मुख्य द्वार पर लगे छोटे खिड़की गेट से अंदर प्रवेश करने में सफल हुआ। पैलेस के अंदर ग्राउंड में आऊट डोर शूटिंग चल रही थी। देखा तो आंखें जैसे ठहर गई। फ़िल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा घोड़े पर सवार थे। गेट से महल की प्रथम बिल्डिंग 500 मीटर दूरी तक उनका घोड़ा दौड़ाकर पहुंचने का सीन था। इसके बाद धरम जी को देखने हम कैक्टस गार्डन की ओर चल दिए। कड़ी सुरक्षा होने से गार्डन तक पहुंचना बेहद मुश्किल था। तब गार्डन से महल के बीच वाले द्वार पर घंटों खड़े रहना पड़ा। तभी खबर आई कि धरम जी फ़िल्म की मुख्य नायिका अनिता राज के साथ लंच के लिए गार्डन से निकलने वाले है। कुछ मिनटों में धरम जी पैदल चलकर पास से निकले। धीर मुद्रा व काम के प्रति उनके गंभीर स्वभाव के भी दीदार हुए। कौतूहलवश हम उन्हें देखते ही रह गए। हाथ हिलाते चलते हुए महल की बिल्डिंग में वे प्रवेश कर गए।
इसके अगले दिन गुलाब गार्डन में फिल्माए गीत की शूटिंग भी देखी। लेकिन बाहर से आए लोगों का हुजूम पैसेज के बाहर सड़कों पर जमा था। उन्हें विश्वास था कि भी धरम जी की झलक उन्हें भी दिखाई देगी।
हालांकि भीड़ की परेशानी को देखते लंच टाइम में तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष व पुलिस अधिकारियों द्वारा धरम जी से विनती की गई कि वे पैलेस के मुख्य द्वार के ऊपर की गैलरी में 10 मिनिट के लिए सार्वजनिक खड़े हो जाए। पब्लिक यहां से चली जायेगी पुलिस प्रशासन की परेशानी दूर हो जाएगी। बाद में धरम जी व अनिता राज गैलेरी में आए तथा हज़ारों प्रशंसकों का अभिवादन किया। इसके बाद अंदर चले गए। उनकी एक झलक का जादुई असर हुआ। भीड़ का पूरा दृश्य ही सन्नाटे में बदल गया। अपनी उम्मीद पूरी होने पर मिनटों में लोग वहां से बिखरते चले गए। इन चार दिनों की जद्दोजहद में कई लोग भीड़ में दबे, कुचलाये। कुछ ने पुलिस के डंडे खाए तो कई भूखे प्यासे दिनभर खड़े रहे। धरम जी की आभा का कुछ ऐसा ही जादू ताउम्र रहा। वर्तमान में स्वस्थ होने के लिए खुद ही संघर्ष कर रहे है। उन्हें पुनः पूर्व स्थिति में लौटने में हजारों प्रशंसकों की प्रार्थना को स्वीकारने में विधाता बखूबी सहायता कर रहे है।

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