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साहब के कोप, मैडम के ‘तेवर’ और आयुष साहब पर मंतर!….आपको इंजीनियर किसने बना दिया?” बाबा रजनीश का चढ़ा पारा, ली क्लास….महकमें में सफेद नंबर प्लेट का ‘काला’ खेल…, ‘वजनदार’ टेबलों पर शाम 6 बजे बाद ही ‘खेल’….।

न्यूज़ जंक्शन-18
रतलाम। रेलवे के महकमे में इन दिनों एक ही अफ़सर की ‘ग्रह-दशा’ की सबसे ज़्यादा चर्चा है। वो हैं इंजीनियरिंग विभाग के हमारे आयुष जी साहब! बेचारे इन साहब के सितारे आजकल ऐसे गर्दिश में चल रहे हैं कि कहना ही क्या है। एक तरफ रेलवे बोर्ड से खिंचाई है तो दूसरी तरफ सूबे की ‘बड़ी मैडम’ का ‘हाई वोल्टेज एक्शन’।
माजरा महाकाल नगरी उज्जैन से जुड़ा है। सूबे के सरदार यानी जीएम साहब की धर्मपत्नी यानी मुंबई वाली बड़ी मैडम के उज्जैन प्रवास पर आना इनके लिए आफत बना गया। अब नियम तो यही कहता है कि प्रोटोकॉल का पालन उसी अफ़सर को जी-जान से करना होता है, जिसकी मंडल के बड़े साहब ने ड्यूटी लगाई गई हो। मैडम जब उज्जैन पहुंचकर रेलवे अधिकारियों के रेस्ट हाउस पहुँचीं। तो वहाँ का नज़ारा देख उनका पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। न वैसी सफाई मिली, न वैसे इंतज़ाम थे…। फिर क्या था, मैडम का कोपभाजन बने सीधे आयुष साहब। मैडम ने इनकी ऐसी क्लास ली कि साहब सकपका गए। बेचारे ने बड़ी चालाकी से सारा ठीकरा ‘कमर्शियल विभाग’ के सिर फोड़ने की कोशिश की। पर मैडम के तेवरों के आगे ये पैंतरा चला नहीं। आखिरकार मेडम को शहर की ही किसी होटल में शरण लेना पड़ी। आखिर में आयुष साहब ने मुँह फुलाए चुपचाप डांट सुनने में ही भलाई समझी।
वैसे आयुष साहब पर दुखों का यह पहाड़ अचानक नहीं टूटा है। अभी हाल ही में जब बॉलीवुड कलाकार ‘सतीश शाह’ की स्टाइल में रेलवे बोर्ड के चेयरमैन साहब ने रतलाम मंडल का तूफानी दौरा किया था। तभी उन्होंने आयुष साहब की कुर्सी की नींव हिला दी थी। चेयरमैन साहब तो इतने उखड़े कि जाते-जाते उनके लपेटे में मंडल के भोलेभाले बड़े साहब भी आ गए। हुक्म दे गए कि ”जरा आयुष साहब के पिछले 3 साल का रिपोर्ट कार्ड खंगालो! देखें तो सही कि इन्होंने रेलवे के डेवलपमेंट के लिए कौन सा तीर मारा है!”
अब आलम यह है कि मंडल कार्यालय के गलियारे में आयुष साहब मुँह लटकाए घूम रहे हैं। हर किसी के सामने एक ही राग अलाप रहे हैं “भाई, मेरा तो कार्यकाल वैसे भी पूरा हो चुका है। बस अब भगवान दो-चार महीने में यहाँ से कहीं दूर तबादला करवा दे!”
​हे प्रभु, जगन्नाथम। देखना यह दिलचस्प होगा कि आयुष साहब की यह ‘तबादला-प्रार्थना’ भगवान (या बोर्ड) कितनी जल्दी सुनते हैं। या फिर अभी कुछ और ‘प्रोटोकॉल का फटका’ खाना बाकी है!

“आपको इंजीनियर किसने बना दिया?” बाबा रजनीश का चढ़ा पारा, छोटे साहब की ले ली क्लास!
रेल मंडल में इन दिनों ‘साहबों’ के दौरे क्या हो रहे हैं, मातहत अफ़सरों की सांसें मानो अटक-अटक कर चल रही हैं। ताज़ा मामला रेल इंजिन सुधारने वाले शेड के टीआरएस विभाग से जुड़ा है। हुआ यूं कि बाबा रजनीश मुंबई से चकलर पिछले दिनों निरीक्षण पर रतलाम पहुंचे थे। साहब की आगवानी में छोटे इंजीनियर साहब जुटे थे। वे इलेक्ट्रिक वाले एरिया के ‘विकास’ से जुड़ी जानकारी साहब को दे रहे थे। तब पूछताछ में छोटे साहब ने बड़े साहब को उल्टा ज्ञान देना चाहा। ऐसे में मुंबई से आए बाबा रजनीश का पारा मिनटों में सातवें आसमान पर पहुँच गया।
दरअसल, पूरे लवाजमे के साथ दौरे पर आए साहब को इंजिन में शॉर्ट सर्किट की जानकारी देने की कोशिश की जा रही थी। अब साहब तो साहब ठहरे, उन्हें तो अच्छे से पता है कि तार के आपस मे टच होने पर शार्ट शर्किट होता है। यदि तार टूट जाए तो वह लाईन कैसे फेल हो जाती है। लेकिन छोटे साहब अपने ज्ञान के मान से उन्हें उल्टा गणित ज्ञान देकर समझा रहे थे। ऐसे में मुंबई से आए बड़े साहब का पारा हाई हो गया। उन्होंने सीधे मुंह लताड़ा कि ”तुम्हे इंजीनियर किसने बना दिया है”….।
बात यहीं खत्म नहीं हुई। जब वे गोदाम (स्टोर) का मुआयना करने पहुँचे। तब वहाँ सामान के रख-रखाव का ‘अजीबो-गरीब’ इंतज़ाम देखकर तो उन्होंने अपना माथा ही पीट लिया।
फिर क्या था… साहब ने बिना लाग-लपेट के सीधे ऐसे विकास की क्लास ही लगा दी। गुस्सा इतना बढ़ गया कि इन्हें भी ‘गुप्ता’ मेडिकल से दवाई लाकर अपनी तबियत सुधारनी पड़ी।
​साहब के इस कड़क सवाल और ‘चमकाने’ के अंदाज़ के सामने छोटे साहब के लिए बगले झांकने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। अब शेड के गलियारों में इसी बात के चटकारे लिए जा रहे हैं कि साहब जिस स्टाइल में छोटे कर्मचारियों को डपटते व लताड़ते है। उसी स्टाइल में मुंबई से इलेक्ट्रिक करंट लेकर आए बाबा रजनीश ने ‘विकास’ के चक्कर में इन छोटे साहब का ‘रिपोर्ट कार्ड’ ही खराब कर दिया।

महकमें में सफेद नंबर प्लेट का ‘काला’ खेल:-दो बत्ती पर इंजिन वाले ऑफिस के पार्किंग में इन दिनों ‘कुल्लू-मनाली या कोई टूरिस्ट पाइंट जैसा नज़ारा दिखाई देने लगा है। चारों तरफ़ चमचमाती गाड़ियों का ऐसा तांता लगा रहता है कि निकलने की जगह तक नहीं बच रही है।
दरअसल इसके पीछे एक और बड़ा झोल सामने आ रहा है। नियमों के मुताबिक, अनुबंध (कांट्रैक्ट) पर चलने वाली हर गाड़ी पर कमर्शियल यानी पीली नंबर प्लेट होनी चाहिए। लेकिन साहब लोगों के रुतबे और सेटिंग की आड़ में यहाँ तो खेल ही उल्टा चल रहा है। कुछेक गाड़ियों को छोड़ दें, तो अधिकांश गाड़ियाँ नियमों को ताक पर रखकर धड़ल्ले से सफेद (प्राइवेट) नंबर प्लेट पर दौड़ रही हैं।
अब इंजिन वाले दफ़्तर के गलियारों में लोग चुटकी ले रहे हैं कि जो गाड़ियाँ कागज़ों में ‘प्राइवेट’ और काम में ‘सरकारी’ बनी फिर रही हैं। उनके इस ‘अनधिकृत अवतार’ का हिसाब कौन माँगेगा? कई बार हादसे भी हुए। क्या साहब लोग किसी और बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है। या फिर सफेद नंबरों का खेल बंद होगा?
हालांकि साहब लोग इन गाड़ियों के साथ जुड़ती जा रही घटनाओं के मामले से सहमने भी लगे है।

क्योंकि कई बार इन गाड़ियों से हिट एंड रन जैसे वाक़िए भी हुए है। सरकारी सिस्टम से जुड़ी ये गाड़ियाँ अब ‘जान की आफत’ भी बनती जा रही हैं। कुछ ही दिन पहले एक तेज़ रफ़्तार गाड़ी ने सड़क पर एक वाहन चालक की बलि ले ली थी। अभी इस हादसे की सिहरन थमी भी नहीं थी कि बुधवार सुबह गाड़ी के अंदर ड्राइवर की मौत की खबर सामने आ गई। हे प्रभु जगन्नाथम, लगातार हो रही इन घटनाओं के बाद अब तो दफ़्तर के ‘साहब’ लोग व ठेकेदार भी इन गाड़ियों के सफेद नंबर प्लेट को लेकर घबराने जरूर लगे है।

घर जाने की जल्दी क्या है? ‘वजनदार’ टेबलों पर शाम 6 बजे बाद ही ‘खेल’:- शाम के ठीक 6 बजते ही जब आम मुलाज़िम (कर्मचारी) झोला उठाकर घर की तरफ़ भागने की जल्दी में होते हैं। ठीक उसी वक्त रेल इंजिन वाले दफ्तर के कुछ खास कमरों में ‘असली खेल’ की बिसात बिछना शुरू होती है। दफ़्तर का आधिकारिक समय भले ही खत्म हो जाए। लेकिन कई बड़े साहब और चुनिंदा बाबू वाले कर्मचारी शाम 7 से रात 8 बजे तक अपनी कुर्सियों पर पूरी निष्ठा के साथ डटे रहते हैं। खुद को ”मैं बेचारा, काम के बोझ का मारा” कहते फिरते है।
​अब आप सोच रहे होंगे कि हमारे अफ़सर और बाबू ‘देश सेवा’ और ‘रेल के मेल’ में इतने लीन हैं कि रात-रात भर दफ़्तर में पसीना बहा रहे हैं? जी नहीं…। सारा गणित ‘टेबल के वजन’ का है!
दफ़्तर के गलियारों में चर्चा गरम है कि जिनकी टेबलों में अच्छा-खासा ‘वजन’ है। वे साहब और उनके खास प्यादे शाम 6 बजे के बाद बड़े आराम से जमे रहते हैं। वहीं दूसरी तरफ, बेचारे ‘हल्की टेबल’ वाले सीधे-सादे कर्मचारी, जिनकी पाती (हिस्से) में केवल दिनभर की फाइलें और जी-तोड़ मेहनत लिखी है। वे 6 बजते ही चुपचाप घर की राह पकड़ लेते हैं। सिंग्नल वाले विभाग के बड़े साहब का सिंग्नल तो घर जाने के लिए 8 बजे ही ग्रीन होता है।
दफ़्तर की इस अनोखी कार्यशैली की दास्तान यहीं खत्म नहीं होती। इनकी कार्यकुशलता का आलम यह है कि दोपहर डेढ़ बजे वाले लंच का आनंद 1 बजे से ही लेना शुरू हो जाता है। दिनभर साहब ‘बिजी’ रहते हैं, फाइलें सरकती नहीं। लेकिन जैसे ही दफ़्तर खाली होता है और 6 बजते है। अचानक ‘खास काम’ की फाइलें बाहर निकल आती हैं।
​चर्चा यह भी है कि शांति के इस माहौल में बंद कमरों में ‘सेटिंग-गेटिंग’ के वो सारे गणित सुलझाए जाते हैं। जो दिन के उजाले में मुमकिन नहीं होते। अब ऐसे में जब ढलती शाम के साथ ‘वजनी टेबल’ का काम चमचमाने लगे। तब भला किसी को घर जाने की जल्दी क्यों होगी?
हे प्रभु, जगन्नाथम। फिलहाल, दफ़्तर के बाकी ‘कम वजन’ वाले बाबू यही चुटकी ले रहे हैं कि ‘दिन में दिखावा और शाम के बाद ख़ास काम’… वाकई ऐसी मेहनत का स्वाद ही कुछ अलग है।

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